लघुसिद्धान्तकौमुदी

Wikibooks इत्यस्मात्

कूर्दयतु अत्र : सुचलनम्, अन्वेषणम्


लघुसिद्धान्तकौमुदी

अथ संज्ञाप्रकरणम्

हलन्त्यम् // लसक_१ = पा_१,३.३ //
उपदेशे ऽन्त्यं हलित्स्यात् / उपदेश आद्योच्चारणम् / सूत्रेष्वदृष्टं पदं सूत्रान्तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र //

अदर्शनं लोपः // लसक_२ = पा_१,१.६० //
प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसंज्ञं स्यात् /

तस्य लोपः // लसक_३ = पा_१,३.९ //
तस्येतो लोपः स्यात् / णादयो ऽणाद्यर्थाः /

आदिरन्त्येन सहेता // लसक_४ = पा_१,१.७१ //
अन्त्येनेता सहति आदिर्मध्यगानां स्वस्य च संज्ञा स्यात् यथाणिति अ इ उ वर्णानां संज्ञा / एवमच् हल् अलित्यादयः //

ऊकालो ऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः // लसक_५ = पा_१,२.२७ //
उश्च ऊश्च ऊ३श्च वः॑ वां कालो यस्य सो ऽच् क्रमाद् ह्रस्वदीर्घप्लुतसंज्ञः स्यात् / स प्रत्येकमुदात्तादि भेदेन त्रिधा /

उच्चैरुदात्तः // लसक_६ = पा_१,२.२९ //

नीचैरनुदात्तः // लसक_७ = पा_१,२.३० //

समाहारः स्वरतिः // लसक_८ = पा_१,२.३१ //
स नवविधो ऽपि प्रत्येकमनुनासिकत्वाननुनासिकत्वाभ्यां द्विधा //

मुखनासिकावचनो ऽनुनासिकः // लसक_९ = पा_१,२.८ //
मुखसहतिनासिकयोच्चार्यमाणो वर्णो ऽनुनासिकसंज्ञः स्यात् / तदित्थम् - अ इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकमष्टादश भेदाः / ऌवर्णस्य द्वादश, तस्य दीर्घाभावात् / एचामपि द्वादश, तेषां ह्रस्वाभावात् //

तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् // लसक_१० = पा_१,१.८ //
ताल्वादिस्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चेत्येतद्द्वयं यस्य येन तुल्यं तन्मिथः सवर्णसंज्ञं स्यात् / (ऋऌवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्) / अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः / इचुयशानां तालु / ऋटुरषाणां मूर्धा / ऌतुलसानां दन्ताः / उपूपध्मानीयानामोष्ठौ / ञमङणनानां नासिका च / एदैतोः कण्ठ तालु / ओदौतोः कण्ठोष्टम् / वकारस्य दन्तोष्ठम् / जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् / नासिकानुस्वारस्य / यत्नो द्विधा - आभ्यन्तरो बाह्यश्च / आद्यः पञ्चधा - स्पृष्टेषत्स्पृष्टेषद्विवृतविवृतसंवृत भेदात् / तत्र स्पृष्टं प्रयतनं स्पर्शानाम् / ईषत्स्पृष्टमन्तःस्थानाम् / ईषद्विवृतमूष्मणाम् / विवृतं स्वराणाम् / ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृतम् / प्रक्रियादशायां तु विवृतमेव / बाह्यप्रयत्नस्त्वेकादशधा - विवारः संवारः श्वासो नादो घोषो ऽघोषो ऽल्पप्राणोमहाप्राण उदात्तो ऽनुदात्तः स्वरतिश्चेति / खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च / हशः संवारा नादा घोषाश्च / वर्गाणां प्रथमतृतीयपञ्चमा यणश्चाल्पप्राणाः / वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः / कादयो मावसानाः स्पर्शाः / यणो ऽन्तःस्थाः / शल ऊष्माणः / अचः स्वराः / -क-ख इति कखाभ्यां प्रगर्धविसर्गसदृशो जिह्वामूलीयः / -प-फ इति पफाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृश उपध्मानीयः / अं अः इत्यचः परावनुस्वारविसर्गौ //

अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः // लसक_११ = पा_१,१.६९ //
प्रतीयते विधीयत इति प्रत्ययः / अविधीयमानो ऽणुदिच्च सवर्णस्य संज्ञा स्यात् / अत्रैवाण् परेण णकारेण / कु चु टु तु पु एते उदितः / तदेवम् - अ इत्यष्टादशानां संज्ञा / तथेकारोकारौ / ऋकारस्त्रिंशतः / एवं ऌकारो ऽपि / एचो द्वादशानाम् / अनुनासिकाननुनासिकभेदेन यवला द्विधा॑ तेनाननुनासिकास्ते द्वयोर्द्वयोस्संज्ञा /

परः संनिकर्षः संहता // लसक_१२ = पा_१,१.१०९ //
विर्णानामतिशयितः संनिधिः संहतासिंज्ञः स्यात् //

हलो ऽनन्तराः संयोगः // लसक_१३ = पा_१,१.७ //
अज्भिरव्यवहता हलिः संयोगसंज्ञाः स्युः //

सुप्तिङन्तं पदम् // लसक_१४ = पा_१,४.१४ //
सुबन्तं तिङन्तं च पदसंज्ञं स्यात् //

इति संज्ञाप्रकरणम्

अथाच्सन्धिः

इको यणचि // लसक_१५ = पा_६,१.७७ //
इकः स्थाने यण् स्यादचि संहितायां विषये / सुधी उपास्य इति स्थिते //

तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य // लसक_१६ = पा_१,१.६६ //
सप्तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्यं वर्णान्तरेणाव्यवहतिस्य पूर्वस्य बोध्यम् //

स्थाने ऽन्तरतमः // लसक_१७ = पा_१,१.५० //
प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्यात् / सुध्य् उपास्य इति जाते //

अनचि च // लसक_१८ = पा_८,४.४७ //
अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि / इति धकारस्य द्वित्वेन सुध्ध्य् उपास्य इति जाते //

झलां जश् झशि // लसक_१९ = पा_८,४.५३ //
स्पष्टम् / इति पूर्वधकारस्य दकारः //

संयोगान्तस्य लोपः // लसक_२० = पा_८,२.२३ //
संयोगान्तं यत्पदं तदन्तस्य लोपः स्यात् //

अलो ऽन्त्यस्य // लसक_२१ = पा_१,१.५२ //
षष्ठीनिर्दिष्टाऽन्त्यस्याल आदेशः स्यात् / इति यलोपे प्राप्ते - (यणः प्रतिषेधो वाच्यः) / सुद्ध्युपास्यः / मद्धरिः / धात्रशः / लाकृतिः //

एचो ऽयवायावः // लसक_२२ = पा_६,१.७८ //

एचः क्रमादय् अव् आय् आव् एते स्युरचि //

यथासंख्यमनुदेशः समानाम् // लसक_२३ = पा_१,३.१० //
समसंबन्धी विधिर्यथासंख्यं स्यात् / हरये / विष्णवे / नायकः / पावकः //

वान्तो यि प्रत्यये // लसक_२४ = पा_६,१.७९ //
यकारादौ प्रत्यये परे ओदौतोरव् आव् एतौ स्तः / गव्यम् / नाव्यम् / (अध्वपरमाणे चि) / गव्यूतिः //

अदेङ् गुणः // लसक_२५ = पा_१,१.२ //
अत् एङ् च गुणसंज्ञः स्यात् //

तपरस्तत्कालस्य // लसक_२६ = पा_१,१.७० //
तः परो यस्मात्स च तात्परश्चोच्चार्यमाणसमकालस्यैव संज्ञा स्यात् //

आद्गुणः // लसक_२७ = पा_६,१.८७ //
अवर्णादचि परे पूर्वपरयोरेको गुण आदेशः स्यात् / उपेन्द्रः / गङ्गोदकम् //

उपदेशे ऽजनुनासिक इत् // लसक_२८ = पा_१,३.२ //
उपदेशे ऽनुनासिको ऽजित्संज्ञः स्यात् / प्रतिज्ञानुनासिक्याः पाणिनीयाः / लण्सूत्रस्थावर्णेन सहोच्चार्यमाणो रेफो रलयोः संज्ञा //

उरण् रपरः // लसक_२९ = पा_१,१.५१ //
ऋ इति त्रिंशतः संज्ञेत्युक्तम् / तत्स्थाने यो ऽण् स रपरः सन्नेव प्रवर्तते / कृष्णर्द्धिः / तवल्कारः //

लोपः शाकल्यस्य // लसक_३० = पा_८,३.१९ //
अवर्णपूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोर्लोपो वाशि परे //

पूर्वत्रासिद्धम् // लसक_३१ = पा_८,२.१ //
सपादसप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्त्रमसिद्धम् / हर इह, हरयिह / विष्ण इह, विष्णविह //

वृद्धिरादैच् // लसक_३२ = पा_१,१.१ //
आदैच्च वृद्धिसंज्ञः स्यात् //

वृद्धिरेचि // लसक_३३ = पा_६,१.८८ //
आदेचि परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् / गुणापवादः / कृष्णैकत्वम् / गङ्गौघः / देवैश्वर्यम् / कृष्णौत्कण्ठ्यम् //

एत्येधत्यूठ्सु // लसक_३४ = पा_६,१.८९ //
अवर्णादेजाद्योरेत्येधत्योरूठि च परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् / उपैति / उपैधते / प्रष्ठौहः / एजाद्योः किम् ? उपेतः / मा भवान्प्रेदिधत् / (अक्षादूहन्यामुपिसंख्यानम्) / अक्षौहणी सेना / (प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु) / प्रौहः / प्रौढः / प्रौढिः / प्रैषः / प्रैष्यः / (ऋते च तृतीयासमासे) / सुखेन ऋतः सुखार्तः / तृतीयेति किम् ? परमर्तः / (प्रवत्सतरकम्बलवसनार्णदशानामृणे) / प्रार्णम्, वत्सतर्राणम्, इत्यादि //

उपसर्गाः क्रियायोगे // लसक_३५ = पा_१,४.५९ //
प्रादयः क्रियायोगे उपसर्गसंज्ञाः स्युः / प्र परा अप सम् अनु अव निस् निर दुस् दुर वि आङ् नि अधि अपि अति सु उत् अभि प्रति पर उपि - एते प्रादयः //

भूवादयो धातवः // लसक_३६ = पा_१,३.१ //
क्रियावाचिनो भ्वादयो धातुसंज्ञाः स्युः //

उपसर्गादृति धातौ // लसक_३७ = पा_६,१.९१ //
अवर्णान्तादुपसर्गाद्दकारादौ धातौ परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् / प्रार्च्छति //

एङि पररूपम् // लसक_३८ = पा_६,१.९४ //
आदुपसर्गादेङादौ धातौ पररूपमेकादेशः स्यात् / प्रेजते / उपोषति //

अचो ऽन्त्यादि टि // लसक_३९ = पा_१,१.६४ //
अचां मध्ये यो ऽन्त्यः स आदिर्यस्य तट् टिसंज्ञं स्यात् / (शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्) / तच्च टेः / शकन्धुः / कर्कन्धुः मनीषा / आकृतिगणो ऽयम् / मार्त्तण्डः //

ओमाङोश्च // लसक_४० = पा_६,१.९५ //
ओमि आङि चात्परे पररूपमेकादेशः स्यात् / शिवायोंं नमः / शिव एहि //

अन्तादिवच्च // लसक_४१ = पा_६,१.८५ //
यो ऽयमेकादेशः स पूर्वस्यान्तवत्परस्यादिवत् / शिवेहि //

अकः सवर्णे दीर्घः // लसक_४२ = पा_६,१.१०१ //
अकः सवर्णे ऽचि परे पूर्वपरयोर्दीर्घ एकादेशः स्यात् / दैत्यारः / श्रीशिः / विष्णूदयः / होतॄकारः //

एङः पदान्तादति // लसक_४३ = पा_६,१.१०९ //
पदान्तादेङोऽति परे पूर्वरूपमेकादेशः स्यात् / हरेऽव / विष्णो ऽव //

सर्वत्र विभाषाः गोः // लसक_४४ = पा_६,१.१२२ //
लोके वेदे चैङन्तस्य गोरति वा प्रकृतिभावः पदान्ते / गोअग्रम्, गो ऽग्रम् / एङन्तस्य किम् ? चित्रग्वग्रम् / पदान्ते किम्? गोः //

अनेकाल् शित्सर्वस्य // लसक_४५ = पा_१,१.५५ //
इति प्राप्ते //

ङिच्च // लसक_४६ = पा_१,१.५३ //
ङिदनेकालप्यन्त्यस्ययैव स्यात् //

अवङ् स्फोटायनस्य // लसक_४७ = पा_६,१.१३३ //
पदान्ते एङन्तस्य गोरवङ् वाचि / गवाग्रम्, गो ऽग्रम् / पदान्ते किम् ? गवि //

इन्द्रे च // लसक_४८ = पा_६,१.१२४ //
गोरवङ् स्यादिन्द्रे / गवेन्द्रः //

दूराद्धूते च // लसक_४९ = पा_८,२.८४ //
दूरात्सम्बोधने वाक्यस्य टेः प्लुतो वा //

प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् // लसक_५० = पा_६,१.१२५ //
एते ऽचि प्रकृत्या स्युः / आगच्छ कृष्ण ३ अत्र गौश्चरति //

ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् // लसक_५१ = पा_१,१.११ //
ईदूदेदन्तं द्विवचनं प्रगृह्यं स्यात् / हरी एतौ / विष्णू इमौ / गङ्गे अमू //

अदसो मात् // लसक_५२ = पा_१,१.१२ //
अस्मात्परावीदूतौ प्रगृह्यौ स्तः / अमी ईशाः / रामकृष्णावमू आसाते / मात्किम् ? अमुके ऽत्र //

चादयो ऽसत्वे // लसक_५३ = पा_१,४.५७ //
अद्रव्यार्थाश्चादयो निपाताः स्युः //

प्रादयः // लसक_५४ = पा_१,४.५८ //
एते ऽपि तथा //

निपात एकाजनाङ् // लसक_५५ = पा_१,१.१४ //
एको ऽज् निपात आङ्वर्जः प्रगृह्यः स्यात् / इ इन्द्रः / उ उमेशः / ऽवाक्यस्मरणयोरङित्॑ आ एवं नु मन्यसे / आ एवं किल तत् / अन्यत्र ङित् ॑ आ ईषदुष्णम् ओष्णम् //

ओत् // लसक_५६ = पा_१,१.१५ //
ओदन्तो निपातः प्रगृह्यः स्यात् / अहो ईशाः //

सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे // लसक_५७ = पा_१,१.१६ //
सम्बुद्धिनिमित्तक ओकारो वा प्रगृह्यो ऽवैदिके इतौ परे / विष्णो इति, विष्ण इति, विष्णविति //

मय उञो वो वा // लसक_५८ = पा_८,३.३३ //
मयः परस्य उञो वो वाचि / किम्वुक्तम्, किमु उक्तम् //

इको ऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च // लसक_५९ = पा_६,१.१२७ //
पदान्ता इको ह्रस्वा वा स्युरसवर्णे ऽचि / ह्रस्वविधिसामर्थ्यान्न स्वरसन्धिः / चक्रि अत्र, चक्रय्त्र / पदान्ता इति किम् ? गौर्यौ -.

अचो रहाभ्यां द्वे // लसक_६० = पा_८,४.४६ //
अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः / गौर्य्यौ / (न समासे) / वाप्यश्वः //

ऋत्यकः // लसक_६१ = पा_६,१.१२८ //
ऋति परे पदान्ता अकः प्राग्वद्वा / ब्रह्म ऋषिः, ब्रह्मर्षिः / पदान्ताः किम् ? आर्छत् //

इत्यच्सन्धिः

अथ हल् सन्धिः

स्तोः श्चुना श्चुः // लसक_६२ = पा_८,४.४० //
सकारतवर्गयोः शकारचवर्गाभ्यां योगे शकारचवर्गौ स्तः / रामश्शेते / रामश्चिनोति / सच्चित् / शार्ङ्गिञ्जय //

शात् // लसक_६३ = पा_८,४.४४ //
शात्परस्य तवर्गस्य चुत्वं न स्यात् / विश्नः / प्रश्नः //

ष्टुना ष्टुः // लसक_६४ = पा_८,४.४१ //
स्तोः ष्टुना योगे ष्टुः स्यात् / रामष्षष्ठः / रामष्टीकते / पेष्टा / तट्टीका / चक्रिण्ढौकसे //

न पदान्ताट्टोरनाम् // लसक_६५ = पा_८,४.४२ //
पदान्ताट्टवर्गात्परस्यानामः स्तोः ष्टुर्न स्यात् / षट् सन्तः / षट् ते / पदान्तात्किम् ? ईट्टे / टोः किम् ? सर्पिष्टमम् / (अनाम्नवतिनगरीणामिति वाच्यम्) / षण्णवतिः / षण्णगर्य्यः //

तोः षि // लसक_६६ = पा_८,४.४३ //
न ष्टुत्वम् / सन्षष्ठः //

झलां जशो ऽन्ते // लसक_६७ = पा_८,२.३९ //
पदान्ते झलां जशः स्युः / वागीशः //


यरो ऽनुनासिके ऽनुनासिको वा // लसक_६८ = पा_८,४.४५ //
यरः पदान्तस्यानुनासिके परे ऽनुनासिको वा स्यात् / एतन्मुरारिः, एतद् मुरारिः / (प्रत्यये भाषायां नित्यम्) / तन्मात्रम् /
चिन्मयम् //

तोर्लि // लसक_६९ = पा_८,४.६० //
तवर्गस्य लकारे परे परसवर्णः / तवर्गस्य लकारे परे परसवर्णः / तल्लयः / विद्वांल्लिखति / नस्यानुनासिको लः /

उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य // लसक_७० = पा_८,४.४१ //
उदः परयोः स्थास्तम्भोः पूर्वसवर्णः //

तस्मादित्युत्तरस्य // लसक_७१ = पा_१,१.६७ //
पञ्चमीनिर्देशेन क्रियमाणं कार्यं वर्णान्तरेणाव्यवहितस्य परस्य ज्ञेयम् //

आदेः परस्य // लसक_७२ = पा_१,१.५४ //
परस्य यद्विहितं तत्तस्यादेर्बोध्यम् / इति सस्य थः //

झरो झरि सवर्णे // लसक_७३ = पा_८,४.६५ //
हलः परस्य झरो वा लोपः सवर्णे झरि //

खरि च // लसक_७४ = पा_८,४.५५ //
खरि झलां चरः / इत्युदो दस्य तः / उत्थानम् / उत्तम्भनम् //

झयो हो ऽन्यतरस्याम् // लसक_७५ = पा_८,४.६२ //
झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः / नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य तादृशो वर्गचतुर्थः / वाग्घरिः, वाघरिः //

शश्छो ऽटि // लसक_७६ = पा_८,४.६३ //
झयः परस्य शस्य छो वाटि / तद् शिव इत्यत्र दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते खरि चेति जकारस्य चकारः / तच्छिवः, तच्शिवः / (छत्वममीति वाच्यम्) तच्छ्लोकेन //

मो ऽनुस्वारः // लसक_७७ = पा_८,३.२३ //
मान्तस्य पदस्यानुस्वारो हलि / हरिं वन्दे //

नश्चापदान्तस्य झलि // लसक_७८ = पा_८,३.२४ //
नस्य मस्य चापदान्तस्य झल्यनुस्वारः / यशांसि / आक्रंस्यते / झलि किम् ? मन्यते //

अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः // लसक_७९ = पा_८,४.५८ //
स्पष्टम् / शान्तः //

वा पदान्तस्य // लसक_८० = पा_८,४.५९ //
त्वङ्करोषि, त्वं करोषि //

मो राजि समः क्वौ // लसक_८१ = पा_८,३.२५ //
क्विबन्ते राजतौ परे समो मस्य म एव स्यात् / सम्राट् //

हे मपरे वा // लसक_८२ = पा_८,३.२६ //
मपरे हकारे परे मस्य मो वा / किम् ह्मलयति, किं ह्मलयति / (यवलपरे यवला वा)/ किंय्ह्यः, किं ह्यः / किंव्ह्वलयति, किं ह्वलयति / किंल् ह्लादयति, किं ह्लादयति //

नपरे नः // लसक_८३ = पा_८,३.२७ //
नपरे हकारे मस्य नो वा / किन् ह्नुते, किं ह्नुते //

आद्यन्तौ टकितौ // लसक_८४ = पा_१,१.४६ //
टित्कितौ यस्योक्तौ तस्य क्रमादाद्यन्तावयवौ स्तः //

ङ्णोः कुक्टुक् शरि // लसक_८५ = पा_८,३.२८ //
वा स्तः / (चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम्) / प्राङ्ख् षष्ठः, प्राङ्क्षष्ठः, प्राङ् षष्ठः / सुगण्ठ् षष्ठः सुगण्ट् षष्ठः, सुगण् षष्ठः //

डः सि धुट् // लसक_८६ = पा_८,३.२९ //
डात्परस्य सस्य धुड्वा / षट्त्सन्तः, षट् सन्तः //

नस्च // लसक_८७ = पा_८,३.३० //
नान्तात्परस्य सस्य धुड्वा / सन्त्सः, सन्सः //

शि तुक् // लसक_८८ = पा_८,३.३१ //
पदान्तस्य नस्य शे परे तुग्वा / सञ्छम्भुः, सञ्च्छम्भुः, सञ्च्शम्भुः, सञ्शम्भुः //

ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम् // लसक_८९ = पा_८,३.३२ //
ह्रस्वात्परे यो ङम् तदन्तं यत्पदं तस्मात्परस्याचो ङमुट् / प्रत्यङ्ङात्मा / सुगण्णीशः / सन्नच्युतः //

समः सुटि // लसक_९० = पा_८,३.५ //
समो रुः सुटि //

अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तुवा // लसक_९१ = पा_८,३.२ //
अत्र रुप्रकरणे रोः पूर्वस्यानुनासिको वा //

अनुनासिकात्परो ऽनुस्वारः // लसक_९२ = पा_८,३.४ //
अनुनासिकं विहाय रोः पूर्वस्मात्परो ऽनुस्वारागमः //

खरवसानयोर्विसर्जनीयः // लसक_९३ = पा_८,३.१५ //
खरि अवसाने च पदान्तसाय रेफस्य विसर्गः / (संपुंकानां सो वक्तव्यः) / संस्स्कर्ता, संस्स्कर्ता //

पुमः खय्यम्परे // लसक_९४ = पा_८,३.६ //
अम्परे खयि पुमो रुः / पुंस्कोकिलः, पुंस्कोकिलः //

नश्छव्यप्रशान् // लसक_९५ = पा_८,३.७ //
अम्परे छवि नान्तस्य पदस्यरुः॑ न तु प्रशान्शब्दस्य //

विसर्जनीयस्य सः // लसक_९६ = पा_८,३.३४ //
खरि / चक्रिंस्त्रायस्व, चक्रिंस्त्रायस्व / अप्रशान् किम् ? प्रशान्तनोति / पदस्येति किम् ? हन्ति //

नॄन् पे // लसक_९७ = पा_८,३.१० //
नॄनित्यस्य रुर्वा पे //

कुप्वोः एक एपौ च // लसक_९८ = पा_८,३.३७ //
कवर्गे पवर्गे च विसर्गस्य एक एपौ स्तः, चाद्विसर्गः / नॄं पाहि, नॄंः पाहि, नॄंः पाहि / नॄन् पाहि //

तस्य परमाम्रेडितम् // लसक_९९ = पा_८,१.२ //
द्विरुक्तस्य परमाम्रेडितम् स्यात् //

कानाम्रेडिते // लसक_१०० = पा_८,३.१२ //
कान्नकारस्य रुः स्यादाम्रेडिते / कांस्कान्, कांस्कान् //

छे च // लसक_१०१ = पा_६,१.७३ //
ह्रस्वस्य छे तुक् / शिवच्छाया //

पदान्ताद्वा // लसक_१०२ = पा_६,१.७९ //
दीर्घात् पदान्तात् छे तुग्वा / लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मी छाया //

इति हल्सन्धिः /

अथ विसर्गसन्धिः

विसर्जनीयस्य सः // लसक_१०३ = पा_८,३.३४ //
खरि / विष्णुस्त्राता //

वा शरि // लसक_१०४ = पा_८,३.३६ //
शरि विसर्गस्य विसर्गो वा / हरिः शेते, हरिश्शेते //

समजुषो रुः // लसक_१०५ = पा_८,२.६६ //
पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुः स्यात् //

अतो रोरप्लुतादप्लुतादप्लुते // लसक_१०६ = पा_६,१.११३ //
अप्लुतादतः परस्य रोरुः स्यादप्लुते ऽति / शिवोर्ऽच्यः //

हशि च // लसक_१०७ = पा_६,१.११४ //
तथा / शिवो वन्द्यः //

भो भगो अघो अपूर्वस्य यो ऽशि // लसक_१०८ = पा_८,३.१७ //
एतत्पूर्वस्य रोर्यादेशो ऽशि / देवा इह, देवायिह / भोस् भगोस् अघोस् इति सान्ता निपाताः / तेषां रोर्यत्वे कृते //

हलि सर्वेषाम् // लसक_१०९ = पा_८,३.२२ //
भोभगोअघोअपूर्वस्य यस्य लोपः स्याद्धलि / भो देवाः / भगो नमस्ते / अघो याहि //

रो ऽसुपि // लसक_११० = पा_८,२.६९ //
अह्नो रेफादेशो न तु सुपि / अहरहः / अहर्गणः //

रो रि // लसक_१११ = पा_८,३.१४ //
रेफस्य रेफे परे लोपः //

ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घो ऽणः // लसक_११२ = पा_६,३.१११ //
ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्याणो दीर्घः / पुना रमते / हरी रम्यः / शम्भू राजते / अणः किम् ? तृढः / वृढः / मनस् रथ इत्यत्र रुत्वे कृते हशि चेत्युत्वे रोरीति लोपे च प्राप्ते //

विप्रतिषेधे परं कार्यम् // लसक_११३ = पा_१,४.२ //
तुल्यबलविरोधे परं कार्यं स्यात् / इति लोपे प्राप्ते / पूर्वत्रासिद्धमिति रोरीत्यस्यासिद्धत्वादुत्वमेव / मनोरथः //

एतत्तदोः सुलोपो ऽकोरनञ्समासे हलि // लसक_११४ = पा_६,१.१३२ //
अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्तस्य लोपो हलि न तु नञ्समासे / एष विष्णुः / स शम्भुः / अकोः किम् ? एषको रुद्रः / अनञ्समासे किम् ? असः शिवः / हलि किम् ? एषो ऽत्र //

सो ऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् // लसक_११५ = पा_६,१.१३४ //
स इत्यस्य सोर्लोपः स्यादचि पादश्चेल्लोपे सत्येव पूर्य्येत / सेमामविड्ढि प्रभृतिम् / सैष दाशरथी रामः //

इति विसर्गसन्धिः //
इति पञ्चसन्धिप्रकरणम् /

अथ षड्लिङ्गेषु अजन्तपुंल्लिङ्गाः

अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् // लसक_११६ = पा_१,२.४५ //
धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तं च वर्जयित्वा अर्थवच्छब्दस्वरूपं प्रातिपदिकसंज्ञं स्यात् //

कृत्तद्धितसमासाश्च // लसक_११७ = पा_१,२.४६ //
कृत्तद्धितान्तौ समासाश्च तथा स्युः //

स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् लसक_११८ = पा_४,१.२ //
सु औ जस् इति प्रथमा / अम् औट् शस् इति द्वितीया / टा भ्याम् भिस् इति तृतीया / ङे भ्याम् भ्यस् इति चतुर्थी / ङसि भ्याम् भ्यस् इति पञ्चमी / ङस् ओस् आम् इति षष्ठी / ङि ओस् सुप् इति सप्तमी //

ङ्याप्प्रातिपदिकात् // लसक_११९ = पा_४,१.१ //

प्रत्ययः // लसक_१२० = पा_३,१.१ //

परश्च // लसक_१२१ = पा_३,१.२ //
इत्यधिकृत्य / ङ्यन्तादाबन्तात्प्रातिपदिकाच्च परे स्वादयः प्रत्ययाः स्युः //

सुपः // लसक_१२२ = पा_१,४.१०३ //
सुपस्त्रीणि त्रीणि वचनान्येकश एकवचनद्विवचनबहुवचनसंज्ञानि स्युः //

द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने // लसक_१२३ = पा_१,४.२२ //
द्वित्वैकत्वयोरेते स्तः //

विरामो ऽवसानम् // लसक_१२४ = पा_१,४.११० //
वर्णानामभावो ऽवसानसंज्ञः स्यात् / रुत्वविसर्गौ / रामः //

सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ // लसक_१२५ = पा_१,२.६४ //
एकविभक्तौ यानि सरूपाण्येव दृष्टानि तेषामेक एव शिष्यते //

प्रथमयोः पूर्वसवर्णः // लसक_१२६ = पा_६,१.१०२ //
अकः प्रथमाद्वितीययोरचि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्यात् / इति प्राप्ते //

नादिचि // लसक_१२७ = पा_६,१.१०४ //
आदिचि न पूर्वसवर्णदीर्घः / वृद्धिरेचि / रामौ //

बहुषु बहुवचनम् // लसक_१२८ = पा_१,४.२१ //
बहुत्वविवक्षायां बहुवचनं स्यात् //

चुटू // लसक_१२९ = पा_१,३.७ //
प्रत्ययाद्यौ चुटू इतौ स्तः //

विभक्तिश्च // लसक_१३० = पा_१,४.१०४ //
सुप्तिङौ विभक्तिसंज्ञौ स्तः //

न विभक्तौ तुस्माः // लसक_१३१ = पा_१,३.४ //
विभक्तिस्थास्तवर्गसमा नेतः / इति सस्य नेत्त्वम् / रामाः //

एकवचनं सम्बुद्धिः // लसक_१३२ = पा_२,३.४९ //
सम्बोधने प्रथमाया एकवचनं सम्बुद्धिसंज्ञं स्यात् //

यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्यये ऽङ्गम् // लसक_१३३ = पा_१,४.१३ //
यः प्रत्ययो यस्मात् क्रियते तदादिशब्दस्वरूपं तस्मिन्नङ्गं स्यात् //

एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धेः // लसक_१३४ = पा_६,१.६९ //
एङन्ताद्ध्रस्वान्ताच्चाङ्गाद्धल्लुप्यते सम्बुद्धेश्चेत् / हे राम / हे रामौ / हे रामाः //

अमि पूर्वः // लसक_१३५ = पा_६,१.१०७ //
अको ऽम्यचि पूर्वरूपमेकादेशः / रामम् / रामौ //

लशक्वतद्धिते // लसक_१३६ = पा_१,३.८ //
तद्धितवर्जप्रत्ययाद्या लशकवर्गा इतः स्युः //

तस्माच्छसो नः पुंसि // लसक_१३७ = पा_६,१.१०३ //
पूर्वसवर्णदीर्घात्परो यः शसः सस्तस्य नः स्यात्पुंसि //

अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवाये ऽपि // लसक_१३८ = पा_८,४.२ //
अट् कवर्गः पवर्गः आङ् नुम् एतैर्व्यस्तैर्यथासंभवं मिलितैश्च व्यवधाने ऽपि रषाभ्यां परस्य नस्य णः समानपदे / इति प्राप्ते //

पदान्तस्य // लसक_१३९ = पा_८,४.३७ //
नस्य णो न / रामान् //

टाङसिङसामिनात्स्याः // लसक_१४० = पा_७,१.१२ //
अदन्ताट्टादीनामिनादयः स्युः / णत्वम् / रामेण //

सुपि च // लसक_१४१ = पा_७,३.१०२ //
यञादौ सुपि अतो ऽङ्गस्य दीर्घः / रामाभ्याम् //

अतो भिस ऐस् // लसक_१४२ = पा_७,१.९ //
अनेकाल्शित्सर्वस्य / रामैर्ः //

ङेयः // लसक_१४३ = पा_७,१.१३ //
अतो ऽङ्गात्परस्य ङेयदिशः //

स्थानिवदादेशो ऽनल्विधौ // लसक_१४४ = पा_१,१.५६ //
आदेशः स्थानिवत्स्यान्न तु स्थान्यलाश्रयविधौ / इति स्थानिवत्त्वात् सुपि चेति दीर्घः / रामाय / रामाभ्याम् //

बहुवचने झल्येत् // लसक_१४५ = पा_७,३.१०३ //
झलादौ बहुवचने सुप्यतो ऽङ्गस्यैकारः / रामेभ्यः / सुपि किम् ? पचध्वम् //

वावसाने // लसक_१४६ = पा_८,४.५६ //
अवसाने झलां चरो वा / रामात्, रामाद् / रामाभ्याम् / रामेभ्यः / रामस्य //

ओसि च // लसक_१४७ = पा_७,३.१०४ //
अतो ऽङ्गस्यैकारः / रामयोः //

ह्रस्वनद्यापो नुट् // लसक_१४८ = पा_७,१.५४ //
ह्रस्वान्तान्नद्यन्तादाबन्ताच्चाङ्गात्परस्यामो नुडागमः //

नामि // लसक_१४९ = पा_६,४.३ //
अजन्ताङ्गस्य दीर्घः / रामाणाम् / रामे / रामयोः / सुपि - एत्त्वे कृते //

आदेशप्रत्यययोः // लसक_१५० = पा_८,३.५९ //
इण्कुभ्यां परस्यापदान्तस्यादेशस्य प्रत्ययावयवस्य यः सस्तस्य मूर्धन्यादेशः / ईषद्विवृतस्य सस्य तादृश एव षः / रामेषु / एवं कृष्णादयो ऽप्यदन्ताः //

सर्वादीनि सर्वनामानि // लसक_१५१ = पा_१,१.२७ //
सर्व विश्व उभ उभय डतर डतम अन्य अन्यतर इतर त्वत् त्व नेम सम सिम / पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम् / स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् / अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः / त्यद् तद् यद् एतद् इदम् अदस् एक द्वि युष्मद् अस्मद् भवतु किम् //

जसः शी // लसक_१५२ = पा_७,१.१७ //
अदन्तात्सर्वनाम्नो जसः शी स्यात् / अनेकाल्त्वात्सर्वादेशः / सर्वे //

सर्वनाम्नः स्मै // लसक_१५३ = पा_७,१.१४ //
अतः सर्वनाम्नो डेः स्मै / सर्वस्मै //

ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ // लसक_१५४ = पा_७,१.१५ //
अतः सर्वनाम्न एतयोरेतौ स्तः / सर्वस्मात् //

आमि सर्वनाम्नः सुट् // लसक_१५५ = पा_७,१.५२ //
अवर्णान्तात्परस्य सर्वनाम्नो विहितस्यामः सुडागमः / एत्वषत्वे / सर्वेषाम् / सर्वस्मिन् / शेषं रामवत् / एवं विश्वादयो ऽप्यदन्ताः // उभशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः / उभौ २ / उभाभ्याम् ३ / उभयोः २ / तस्येह पाठो ऽकजर्थः / उभयशब्दस्य द्विवचनं नास्ति / उभयः / उभये / उभयम् / उभयान् / उभयेन / उभयैः / उभयस्मै / उभयेभ्यः / उभयस्मात् / उभयेभ्यः / उभयस्य / उभयेषाम् / उभयस्मिन् / उभयेषु // डतरडतमौ प्रत्ययौ, प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणमिति तदन्ता ग्राह्याः // नेम इत्यर्धे // समः सर्वपर्याय स्तुल्यपर्यायस्तु न, यथासंख्यमनुदेशः समानामिति ज्ञापकात् //

पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम् // लसक_१५६ = पा_१,१.३४ //
एतेषां व्यवस्थायामसंज्ञायां च सर्वनामसंज्ञा गणसूत्रात्सर्वत्र या प्राप्ता सा जसि वा स्यात् / पूर्वे, पूर्वाः / असंज्ञायां किम् ? उत्तराः कुरवः / स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था / व्यवस्थायां किम् ? दक्षिणा गाथकाः, कुशला इत्यर्थः //

स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् // लसक_१५७ = पा_१,१.३५ //
ज्ञातिधनान्यवाचिनः स्वशब्दस्य प्राप्ता संज्ञा जसि वा / स्वे, स्वाः॑ आत्मीयाः, आत्मान इति वा / ज्ञातिधनवाचिनस्तु, स्वाः॑ ज्ञातयोर्ऽथा वा //

अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः // लसक_१५८ = पा_१,४.३६ //
बाह्ये परिधानीये चार्थे ऽन्तरशब्दस्य प्राप्ता संज्ञा जसि वा / अन्तरे, अन्तरा वा गृहाः॑ बाह्या इत्यर्थः / अन्तरे, अन्तरा वा शाटकाः॑ परिधानीया इत्यर्थः //

पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा // लसक_१५९ = पा_७,१.१६ //
एभ्यो ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ वा स्तः / पूर्वस्मात्, पूर्वात् / पूर्वस्मिन्, पूर्वे / एवं परादीनाम् / शेषं सर्ववत् //

प्रथमचरमतयाल्पार्द्धकतिपयनेमाश्च // लसक_१६० = पा_१,१.३३ //
एते जसि उक्तसंज्ञा वा स्युः / प्रथमे, प्रथमाः // तयः प्रत्ययः / द्वितये, द्वितयाः / शेषं रामवत् // नेमे, नेमाः / शेषं सर्ववत् // (तीयस्य ङित्सु वा) / द्वितीयस्मै, द्वितीयायेत्यादि / एवं तृतीयः // निर्जरः //

जराया जरसन्यतरस्याम् // लसक_१६१ = पा_७,२.१०१ //
अजादौ विभक्तौ / (प.) पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च / (प.) निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति / (प.) एकदेशविकृतमनन्यवत्, इति जरशब्दस्य जरस् / निर्जरसौ / निर्जरस इत्यादि / पक्षे हलादौ च रामवत् // विश्वपाः //

दीर्घाज्जसि च // लसक_१६२ = पा_६,१.१०५ //
दीर्घाज्जसि इचि च परे पूर्वसवर्णदीर्घो न स्यात् / विश्वपौ / विश्वपाः / हे विश्वपाः / विश्वपाम् / विश्वपौ //

सुडनपुंसकस्य // लसक_१६३ = पा_१,१.४३ //
स्वादिपञ्चवचनानि सर्वनामस्थानसंज्ञानि स्युरक्लीबस्य //

स्वादिष्वसर्वनामस्थाने // लसक_१६४ = पा_१,४.१७ //
कप्प्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं पदं स्यात् //

यचि भम् // लसक_१६५ = पा_१,४.१८ //
यादिष्वजादिषु च कप्प्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं भसंज्ञं स्यात् //

आकडारादेका संज्ञा // लसक_१६६ = पा_१,४.१ //
इत ऊर्ध्वं कडाराः कर्मधारय इत्यतः प्रागेकस्यैकैव संज्ञा ज्ञेया / या परानवकाशा च //

आतो धातोः // लसक_१६७ = पा_६,४.१४० //
आकारान्तो यो धातुस्तदन्तस्य भस्याङ्गस्य लोपः / अलो ऽन्त्यस्य / विश्वपः / विश्वपा / विश्वपाभ्यामित्यादि / एवं शङ्खध्मादयः / धातोः किम् ? हाहान् // हरिः / हरी //

जसि च // लसक_१६८ = पा_७,३.१०९ //
ह्रस्वान्तस्याङ्गस्य गुणः / हरयः //

ह्रस्वस्य गुणः // लसक_१६९ = पा_७,३.१०८ //
सम्बुद्धौ / हे हरे / हरिम् / हरी / हरीन् //

शेषो घ्यसखि // लसक_१७० = पा_१,४.७ //
शेष इति स्पष्टार्थम् / ह्रस्वौ याविदुतौ तदन्तं सखिवर्जं घिसंज्ञम् //

आङो नास्त्रियाम् // लसक_१७१ = पा_७,३.१२० //
घेः परस्याङो ना स्यादस्त्रियाम् / आङिति टासंज्ञा / हरिणा / हरिभ्याम् / हरिभिः //

घेर्ङिति // लसक_१७२ = पा_७,३.१११ //
घिसंज्ञस्य ङिति सुपि गुणः / हरये / हरिभ्याम् / हरिभ्यः //

ङसिङसोश्च // लसक_१७३ = पा_६,१.११० //
एङो ङसिङसोरति पूर्वरूपमेकादेशः / हरेः २ / हर्योः २ / हरीणाम् //

अच्च घेः // लसक_१७४ = पा_७,३.११९ //
इदुद्भ्यामुत्तरस्य ङेरौत्, घेरच्च / हरौ / हरिषु / एवं कव्यादयः //

अनङ् सौ // लसक_१७५ = पा_७,१.९३ //
सख्युरङ्गस्यानङादेशो ऽसम्बुद्धौ सौ //

अलो ऽन्त्यात्पूर्व उपधा // लसक_१७६ = पा_१,१.६५ //
अन्त्यादलः पूर्वो वर्ण उपधासंज्ञः //

सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ // लसक_१७७ = पा_६,४.८ //
नान्तस्योपधाया दीर्घो ऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने //

अपृक्त एकाल् प्रत्ययः // लसक_१७८ = पा_१,२.४१ //
एकाल् प्रत्ययो यः सो ऽपृक्तसंज्ञः स्यात् //

हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् // लसक_१७९ = पा_६,१.६८ //
हलन्तात्परं दीर्घौ यौ ङ्यापौ तदन्ताच्च परं सुतिसीत्येतदपृक्तं हल् लुप्यते //

नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य // लसक_१८० = पा_८,२.७ //
प्रातिपदिकसंज्ञकं यत्पदं तदन्तस्य नस्य लोपः / सखा //

सख्युरसंबुद्धौ // लसक_१८१ = पा_७,१.९२ //
सख्युरङ्गात्परं संबुद्धिवर्जं सर्वनामस्थानं णिद्वत्स्यात् //

अचो ञ्णिति // लसक_१८२ = पा_७,२.११५ //
अजन्ताङ्गस्य वृद्धिर्ञिति णिति च परे / सखायौ / सखायः / हे सखे / सखायम् / सखायौ / सखीन् / सख्या / सख्ये //

ख्यत्यात्परस्य // लसक_१८३ = पा_६,१.११२ //
खितिशब्दाभ्यां खीतीशब्दाभ्यां कृतयणादेशाभ्यां परस्य ङसिङसोरत उः / सख्युः //

औत् // लसक_१८४ = पा_७,३.११८ //
इतः परस्य ङेरौत् / सख्यौ / शेषं हरिवत् //

पतिः समास एव // लसक_१८५ = पा_१,४.८ //
घिसंज्ञः / पत्युः २ / पत्यौ / शेषं हरिवत् / समासे तु भूपतये / कतिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः //

बहुगणवतुडति संख्या // लसक_१८६ = पा_१,१.२३ //

डति च // लसक_१८७ = पा_१,१.२५ //
डत्यन्ता संख्या षट्संज्ञा स्यात् //

षड्भ्यो लुक् // लसक_१८८ = पा_७,१.२२ //
जश्शसोः //

प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः // लसक_१८९ = पा_१,१.६१ //
लुक्श्लुलुप्शब्दैः कृतं प्रत्ययादर्शनं क्रमात्तत्तत्संज्ञं स्यात् //

प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् // लसक_१९० = पा_१,१.६२ //
प्रत्यये लुप्ते तदाश्रितं कार्यं स्यात् / इति जसि चेति गुणे प्राप्ते //

न लुमताङ्गस्य // लसक_१९१ = पा_१,१.६३ //
लुमता शब्देन लुप्ते तन्निमित्तमङ्गकार्यं न स्यात् / कति २ / कतिभिः / कतिभ्यः २ / कतीनाम् / कतिषु / युष्मदस्मत्षट्संज्ञकास्त्रिषु सरूपाः // त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः / त्रयः / त्रीन् / त्रिभिः / त्रिभ्यः २ //

त्रेस्त्रयः // लसक_१९२ = पा_७,१.५३ //
त्रिशब्दस्य त्रयादेशः स्यादामि / त्रयाणाम् / त्रिषु / गौणत्वे ऽपि प्रियत्रयाणाम् //

त्यदादीनामः // लसक_१९३ = पा_७,२.१०२ //
एषामकारो विभक्तौ / (द्विपर्य्यन्तानामेवेष्टिः) / द्वौ २ / द्वाभ्याम् ३ / द्वयोः २ // पाति लोकमिति पपीः सूर्यः //

दीर्घाज्जसि च // लसक_१९४ = पा_६,१.१०५ //
पप्यौ २ / पप्यः / हे पपीः / पपीम् / पपीन् / पप्या / पपीभ्याम् ३ / पपीभिः / पप्ये / पपीभ्यः २ / पप्यः २ / पप्योः / दीर्घत्वान्न नुट्, पप्याम् / ङौ तु सवर्णदीर्घः, पपी / पप्योः / पपीषु / एवं वातप्रम्यादयः // बह्व्यः श्रेयस्यो यस्य स बहुश्रेयसी //

यू स्त्र्याख्यौ नदी // लसक_१९५ = पा_१,४.३ //
ईदूदन्तौ नित्यस्त्रीलिङ्गौ नदीसंज्ञौ स्तः / (प्रथमलिङ्गग्रहणं च) / पूर्वं स्त्र्याख्यस्योपसर्जनत्वे ऽपि नदीत्वं वक्तव्यमित्यर्थः //

अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः // लसक_१९६ = पा_७,३.१०७ //
सम्बुद्धौ / हे बहुश्रेयसि //

आण्नद्याः // लसक_१९७ = पा_७,३.११२ //
नद्यन्तात्परेषां ङितामाडागमः //

आटश्च // लसक_१९८ = पा_६,१.९० //
आटो ऽचि परे वृद्धिरेकादेशः / बहुश्रेयस्यै / बहुश्रेयस्याः / बहुश्रेयसीनाम् //

ङेराम्नद्याम्नीभ्यः // लसक_१९९ = पा_७,३.११७ //
नद्यन्तादाबन्तान्नीशब्दाच्च परस्य ङेराम् / बहुश्रेयस्याम् / शेषं पपीवत् // अङ्यन्तत्वान्न सुलोपः / अतिलक्ष्मीः / शेषं बहुश्रेयसीवत् // प्रधीः //

अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ // लसक_२०० = पा_६,४.७७ //
श्नु प्रत्ययान्तस्येवर्णोवर्णान्तस्य धातोर्भ्रू इत्यस्य चाङ्गस्य चेयङुवङौ स्तो ऽजादौ प्रत्यये परे / इति प्राप्ते //

एरनेकाचो ऽसंयोगपूर्वस्य // लसक_२०१ = पा_६,४.८२ //
धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचो ऽङ्गस्य यणजादौ प्रत्यये / प्रध्यौ / प्रध्यः / प्रध्यम् / प्रध्यौ / प्रध्यः / प्रध्यि / शेषं पपीवत् / एवं ग्रामणीः / ङौ तु ग्रामण्याम् // अनेकाचः किम् ? नीः / नियौ / नियः / अमि शसि च परत्वादियङ्, नियम् / ङेराम्॑ नियाम् // असंयोगपूर्वस्य किम् ? सुश्रियौ / यवक्रियौ //

गतिश्च // लसक_२०२ = पा_१,४.६० //
प्रादयः क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः / (गतिकारकेतरपूर्वपदस्य यण् नेष्यते) / शुद्धधियौ //

न भूसुधियोः // लसक_२०३ = पा_६,४.८५ //
एतयोरचि सुपि यण्न / सुधियौ / सुधिय इत्यादि // सुखमिच्छतीति सुखीः / सुतीः / सुख्यौ / सुत्यौ / सुख्युः / सुत्युः / शेषं प्रधीवत् / शम्भुर्हरिवत् / एवं भान्वादयः //

तृज्वत्क्रोष्टुः // लसक_२०४ = पा_६,१.९५ //
असम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने परे / क्रोष्टुशब्दस्य स्थाने क्रोष्टृशब्दः प्रयोक्तव्य इत्यर्थः //

ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः // लसक_२०५ = पा_७,१.११० //
ऋतो ऽङ्गस्य गुणो ङौ सर्वनामस्थाने च / इति प्राप्ते -- .

ऋदुशनस्पुरुदंसो ऽनेहसां च // लसक_२०६ = पा_७,१.९४ //
ऋदन्तानाम् उशनसादीनाम् च अनङ् स्यात् असंबुद्धौ सौ //

अप्तृन्तृच्स्वसृनप्तृनेष्टृत्वष्टृक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्तॄणाम् // लसक_२०७ = पा_६,४.११ //
अबादीनाम् उपधाया दीर्घः असंबुद्धौ सर्वनामस्थाने / क्रोष्टा / क्रोष्टारौ / क्रोष्टारः / क्रोष्टून् //

विभाषा तृतीयादिष्वचि // लसक_२०८ = पा_७,१.९७ //
अजादिषु तृतीयादिषु क्रोष्टुर्वा तृज्वत् / क्रोष्ट्रा / क्रोष्ट्रे //

ऋत उत् // लसक_२०९ = पा_६,१.१११ //
ऋतो ङसिङसोरति उदेकादेशः / रपरः //

रात्सस्य // लसक_२१० = पा_८,२.२४ //
रेफात्संयोगान्तस्य सस्यैव लोपो नान्यस्य / रस्य विसर्गः / क्रोष्टुः २ / क्रोष्ट्रोः २ / (नुमचिरतृज्वद्भावेभ्यो नुट् पूर्वविप्रतिषेधेन) / क्रोष्टूनाम् / क्रोष्टरि / पक्षे हलादौ च शम्भुवत् // हूहूः / हूह्वौ / हूह्वः / हूहूम् इत्यादि // अतिचमूशब्दे तु नदीकार्य्यं विशेषः / हे अतिचमु / अतिचम्वै / अतिचम्वाः / अतिचमूनाम् // खलपूः //

ओः सुपि // लसक_२११ = पा_६,४.८३ //
धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचो ऽङ्गस्य यण् स्यादचि सुपि / खलप्वौ / खलप्वः / एवं सुल्वादयः // स्वभूः / स्वभुवौ / स्वभुवः // वर्षाभूः //

वर्षाभ्वश्च // लसक_२१२ = पा_६,४.८४ //
अस्य यण् स्यादचि सुपि / वर्षाभ्वावित्यादि // दृन्भूः / (दृन्करपुनः पूर्वस्य भुवो यण् वक्तव्यः) / दृन्भ्वौ / एवं करभूः // धाता / हे धातः / धातारौ / धातारः / (ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्) / धातॄणाम् / एवं नप्त्रादयः // नप्त्रादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम् / तेनेह न / पिता / पितरौ / पितरः / पितरम् / शेषं धातृवत् / एवं जामात्रादयः // ना / नरौ //

नृ च // लसक_२१३ = पा_६,४.६ //
अस्य नामि वा धीर्घः / नृणाम् / नॄणाम् //

गोतो णित् // लसक_२१४ = पा_७,१.९० //
ओकाराद्विहितं सर्वनामस्थानं णिद्वत् / गौः / गावौ / गावः //

औतो ऽम्शसोः // लसक_२१५ = पा_६,१.९३ //
ओतो ऽम्शसोरचि आकार एकादेशः / गाम् / गावौ / गाः / गवा / गवे / गोः / इत्यादि //

रायो हलि // लसक_२१६ = पा_७,२.८५ //
अस्याकारादेशो हलि विभक्तौ / राः / रायौ / रायः / राम्यामित्यादि // ग्लौः / ग्लावौ / ग्लावः / ग्लौभ्यामित्यादि //

इत्यजन्तपुंल्लिङ्गाः /

अथाजन्तस्त्रीलिङ्गाः

रमा /

औङ आपः // लसक_२१७ = पा_७,१.१८ //
आबन्तादङ्गात्परस्ययौङः शी स्यात् / औङित्यौकारविभक्तेः संज्ञा / रमे / रमाः //

सम्बुद्धौ च // लसक_२१८ = पा_७,३.१०६ //
आप एकारः स्यात्सम्बुद्धौ / एङ्ह्रस्वादिति संबुद्धिलोपः / हे रमे / हे रमे / हे रमाः / रमाम् / रमे / रमाः //

आङि चापः // लसक_२१९ = पा_७,३.१०५ //
आङि ओसि चाप एकारः / रमया / रमाभ्याम् / रमाभिः //

याडापः // लसक_२२० = पा_७,३.११३ //
आपो ङितो याट् / वृद्धिः / रमायै / रमाभ्याम् / रमाभ्यः / रमायाः / रमयोः / रमाणाम् / रमायाम् / रमासु / एवं दुर्गाम्बिकादयः //

सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च // लसक_२२१ = पा_७,३.११४ //
आबन्तात्सर्वनाम्नो ङितः स्याट् स्यादापश्च ह्रस्वः / सर्वस्यै / सर्वस्याः / सर्वासाम् / सर्वस्याम् / शेषं रमावत् // एवं विश्वादय आबन्ताः //

विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ // लसक_२२२ = पा_१,१.२८ //
सर्वनामता वा / उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै / तीयस्येति वा सर्वनामसंज्ञा / द्वितीयस्यै, द्वितीयायै // एवं तृतीया // अम्बार्थेति ह्रस्वः / हे अम्ब / हे अक्क / हे अल्ल // जरा / जरसौ इत्यादि / पक्षे रमावत् // गोपाः, विश्वपावत् // मतीः / मत्या //

ङिति ह्रस्वश्च // लसक_२२३ = पा_१,४.६ //
इयङुवङ्स्थानौ स्त्रीशब्दभिन्नौ नित्यस्त्रीलिङ्गावीदूतौ, ह्रस्वौ चेवर्णोवर्णौ, स्त्रियां वा नदीसंज्ञौ स्तो ङिति / मत्यै, मतये / मत्याः २ / मतेः २ //

इदुद्भ्याम् // लसक_२२४ = पा_७,३.११७ //
इदुद्भ्यां नदीसंज्ञकाभ्यां परस्य ङेराम् / मत्याम्, मतौ / शेषं हरिवत् // एवं बुद्ध्यादयः //

त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ // लसक_२२५ = पा_७,२.९९ //
स्त्रीलिङ्गयोरेतौ स्तो विभक्तौ //

अचि र ऋतः // लसक_२२६ = पा_७,२.१०० //
तिसृ चतसृ एतयोरृकारस्य रेफादेशः स्यादचि / गुणदीर्घोत्वानामपवादः / तिस्रः / तिसृभ्यः / तिसृभ्यः / आमि नुट् //

न तिसृचतसृ // लसक_२२७ = पा_६,४.४ //
एतयोर्नामि दीर्घो न / तिसृणाम् / तिसृषु // द्वे / द्वे / द्वाभ्याम् / द्वाभ्याम् / द्वाभ्याम् / द्वयोः / द्वयोः // गौरी / गौर्य्यौ / गौर्य्यः / हे गौरि / गौर्य्यै इत्यादि / एवं नद्यादयः // लक्ष्मीः / शेषं गौरीवत् // एवं तरीतन्त्र्यादयः // स्त्री / हे स्त्रि //

स्त्रियाः // लसक_२२८ = पा_६,४.७९ //
अस्येयङ् स्यादजादौ प्रत्यये परे / स्त्रियौ / स्त्रियः //

वाम्शसोः // लसक_२२९ = पा_६,४.८० //
अमि शसि च स्त्रिया इयङ् वा स्यात् / स्त्रियम्, स्त्रीम् / स्त्रियः, स्त्रीः / स्त्रिया / स्त्रियै / स्त्रियाः / परत्वान्नुट् / स्त्रीणाम् / स्त्रीषु // श्रीः / श्रियौ / श्रियाः //

नेयङुवङ्स्थानावस्त्री // लसक_२३० = पा_१,४.४ //
इयङुवङोः स्थितिर्ययोस्तावीदूतौ नदीसंज्ञौ न स्तो न तु स्त्री / हे श्रीः / श्रियै, श्रिये / श्रियाः, श्रियः //

वामि // लसक_२३१ = पा_१,४.५ //
इयङुवङ्स्थानौ स्त्र्याख्यौ यू आमि वा नदीसंज्ञौ स्तो न तु स्त्री / श्रीणाम्, श्रियाम् / श्रियि, श्रियाम् // धेनुर्मतिवत् //

स्त्रियां च // लसक_२३२ = पा_७,१.९६ //
स्त्रीवाची क्रोष्टुशब्दस्तृजन्तवद्रूपं लभते //

ऋन्नेभ्यो ङीप् // लसक_२३३ = पा_४,१.५ //
ऋदन्तेभ्यो नान्तेभ्यश्च स्त्रियां ङीप् / क्रोष्ट्री गौरीवत् // भ्रूः श्रीवत् // स्वयम्भूः पुंवत् //

न षट्स्वस्रादिभ्यः // लसक_२३४ = पा_४,१.१० //
ङीप्टापौ न स्तः //
स्वसा तिस्रश्चतस्रश्च ननान्दा दुहिता तथा /
याता मातेति सप्तैते स्वस्रादय उदाहृताः //
स्वसा / स्वसारौ // माता पितृवत् / शसि मातॄः // द्यौर्गोवत् // राः पुंवत् // नौर्ग्लौवत् //

इत्यजन्तस्त्रीलिङ्गाः

अथाजन्तनपुंसकलिङ्गाः

अतो ऽम् // लसक_२३५ = पा_७,१.२४ //
अतो ऽङ्गात् क्लीबात्स्वमोरम् / अमि पूर्वः / ज्ञानम् / एङ्ह्रस्वादिति हल्लोपः / हे ज्ञान//

नपुंसकाच्च // लसक_२३६ = पा_७,१.१९ //
क्लीबादौङः शी स्यात् / भसंज्ञायाम् //

यस्येति च // लसक_२३७ = पा_६,४.१४८ //
कडारे तद्धिते च परे भस्येवर्णावर्णयोर्लोपः / इत्यल्लोपे प्राप्ते (औङः श्यां प्रतिषेधो वाच्यः) / ज्ञाने //

जश्शसोः शिः // लसक_२३८ = पा_७,१.२० //
क्लीबादनयोः शिः स्यात् //

शि सर्वनामस्थानम् // लसक_२३९ = पा_१,१.४२ //
शि इत्येतदुक्तसंज्ञं स्यात् //

नपुंसकस्य झलचः // लसक_२४० = पा_७,१.७२ //
झलन्तस्याजन्तस्य च क्लीबस्य नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने //

मिदचो ऽन्त्यात्परः // लसक_२४१ = पा_१,१.४७ //
अचां मध्ये यो ऽन्त्यस्तस्मात्परस्तस्यैवान्तावयवो मित्स्यात् / उपधादीर्घः / ज्ञानानि / पुनस्तद्वत् / शेषं पुंवत् // एवं धन वन फलादयः //

अद्ड्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः // लसक_२४२ = पा_७,१.२५ //
एभ्यः क्लीबेभ्यः स्वमोः अद्डादेशः स्यात् //

टेः // लसक_२४३ = पा_६,४.१४३ //
डिति भस्य टेर्लोपः / कतरत्, कतरद् / कतरे / कतराणि / हे कतरत् / शेषं पुंवत् // एवं कतमत् / इतरत् / अन्यत् / अन्यतरत् / अन्यतमस्य त्वन्यतममित्येव / (एकतरात्प्रतिषेधो वक्तव्यः)/ एकतरम् //

ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य // लसक_२४४ = पा_१,३.४७ //
अजन्तस्येत्येव / श्रीपं ज्ञानवत् //

स्वमोर्नपुंसकात् // लसक_२४५ = पा_७,१.२३ //
लुक् स्यात् / वारि //

इको ऽचि विभक्तौ // लसक_२४६ = पा_७,१.७३ //
इगन्तस्य क्लीबस्य नुमचि विभक्तौ / वारिणी / वारीणि / न लुमतेत्यस्यानित्यत्वात्पक्षे संबुद्धिनिमित्तो गुणः / हे वारे, हे वारि / घेर्ङितीति गुणे प्राप्ते (वृद्ध्यौत्त्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषेधेन) / वारिणे / वारिणः / वारिणोः / नुमचिरेति नुट् / वारीणाम् / वारिणि / हलादौ हरिवत् //

अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनङुदात्तः // लसक_२४७ = पा_७,१.७५ //
एषामनङ् स्याट्टादावचि //

अल्लोपो ऽनः // लसक_२४८ = पा_६,४.१३४ //
अङ्गावयवो ऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो यो ऽन् तस्याकारस्य लोपः / दध्ना / दध्ने / दध्नः / दध्नः / दध्नोः / दध्नोः //

विभाषा ङिश्योः // लसक_२४९ = पा_६,४.१३६ //
अङ्गावयवो ऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो यो ऽन् तस्याकारस्य लोपो वा स्याङत् ङिश्योः परयोः / दध्नि, दधनि / शेषं वारिवत् // एवमस्थिसक्थ्यक्षि // सुधि / सुधिनी / सुधीनि / हे सुधे, हे सुधि //

तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद्गालवस्य // लसक_२५० = पा_७,१.७४ //
प्रवृत्तिनिमित्तैक्ये भाषितपुंस्कमिगन्तं क्लीबं पुंवद्वा टादावचि / सुधिया, सुधिनेत्यादि // मधु / मधुनी / मधूनि / हे मधो, हे मधु // सुलु / सुलुनी / सुलूनि / सुलुनेत्यादि // धातृ / धातृणी / धातॄणि / हे धातः, हे धातृ / धातॄणाम् // एवं ज्ञात्रादयः //

एच इग्घ्रस्वादेशे // लसक_२५१ = पा_१,१.४८ //
आदिश्यमानेषु ह्रस्वेषु एच इगेव स्यात् / प्रद्यु / प्रद्युनी / प्रद्यूनि / प्रद्युनेत्यादि // प्ररि / प्ररिणी / प्ररीणि / प्ररिणा / एकदेशविकृतमनन्यवत् / प्रराभ्याम् / प्ररीणाम् // सुनु / सुनुनी / सुनूनि / सुनुनेत्यादि //

इत्यजन्तनपुंसकलिङ्गाः /

अथ हलन्त पुंल्लिङ्गाः

हो ढः // लसक_२५२ = पा_८,२.३१ //
हस्य ढः स्याज्झलि पदान्ते च / लिट्, लिड् / लिहौ / लिहः / लिड्भ्याम् / लिट्त्सु, लिट्सु //

दादेर्धातोर्घः // लसक_२५३ = पा_८,२.३२ //
झलि पदान्ते चोपदेशे दादेर्धातेर्हस्य घः //

एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः // लसक_२५४ = पा_८,२.३७ //
धात्ववयवस्यैकाचो झषन्तस्य बशो भष् से ध्वे पदान्ते च / धुक्, धुग् / दुहौ / दुहः / धुग्भ्याम् / धुक्षु //

वा द्रुहमुहष्णुहष्णिहाम् // लसक_२५५ = पा_८,२.३३ //
एषां हस्य वा घो झलि पदान्ते च / ध्रुक्, ध्रुग्, ध्रुट्, ध्रुड् / द्रुहौ / द्रुहः / ध्रुग्भ्याम्, ध्रुड्भ्याम् / ध्रुक्षु, ध्रुट्त्सु, ध्रुट्सु // एवं मुक्, मुग् इत्यादि //

धात्वादेः षः सः // लसक_२५६ = पा_६,१.६४ //
स्नुक्, स्नुग्, स्नुट्, स्नुड् / एवं स्निक्, स्निग्, स्निट्, स्निड् // विश्ववाट्, विश्ववाड् / विश्ववाहौ / विश्ववाहः / विश्ववाहम् / विश्ववाहौ //

इग्यणः संप्रसारणम् // लसक_२५७ = पा_१,१.४५ //
यणः स्थाने प्रयुज्यमानो य इक् स संप्रसारणसंज्ञः स्यात् //

वाह ऊठ् // लसक_२५८ = पा_६,४.१३२ //
भस्य वाहः संप्रसारणमूठ् //

संप्रसारणाच्च // लसक_२५९ = पा_६,१.१०८ //
संप्रसारणादचि पूर्वरूपमेकादेशः / एत्येधत्यूठ्स्विति वृद्धिः / विश्वौहः, इत्यादि //

चतुरनडुहोरामुदात्तः // लसक_२६० = पा_७,१.९८ //
अनयोराम् स्यात्सर्वनामस्थाने परे //

सावनडुहः // लसक_२६१ = पा_७,१.८२ //
अस्य नुम् स्यात् सौ परे / अनड्वान् //

अम् संबुद्धौ // लसक_२६२ = पा_७,१.९९ //
हे अनड्वन् / हे अनड्वाहौ / हे अनड्वाहः / अनडुहः / अनडुहा //

वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः // लसक_२६३ = पा_८,२.७२ //
सान्तवस्वन्तस्य स्रंसादेश्च दः स्यात्पदान्ते / अनडुद्भ्यामित्यादि // सान्तेति किम् ? विद्वान् / पदान्ते किम् ? स्रस्तम् /
ध्वस्तम् //

सहेः साडः सः // लसक_२६४ = पा_८,३.५६ //
साडरूपस्य सहेः सस्य मूर्धन्यादेशः / तुराषाट्, तुराषाड् / तुरासाहौ / तुरासाहः / तुराषाड्भ्यामित्यादि //

दिव औत् // लसक_२६५ = पा_७,१.८४ //
दिविति प्रातिपदिकस्यौत्स्यात्सौ / सुद्यौः / सुदिवौ //

दिव उत् // लसक_२६६ = पा_६,१.१३१ //
दिवो ऽन्तादेश उकारः स्यात् पदान्ते / सुद्युभ्यामित्यादि // चत्वारः / चतुरः / चतुर्भिः / चतुर्भ्यः //

षट्चतुर्भ्यश्च // लसक_२६७ = पा_७,१.५५ //
एभ्य आमो नुडागमः //

रषाभ्यां नो णः समानपदे // लसक_२६८ = पा_८,४.१ //

अचो रहाभ्यां द्वे // लसक_२६९ = पा_८,४.४६ //
अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः / चतुर्ण्णाम्, चतुर्णाम् //

रोः सुपि // लसक_२७० = पा_८,३.१६ //
रोरेव विसर्गः सुपि / षत्वम् / षस्य द्वित्वे प्राप्ते //

शरो ऽचि // लसक_२७१ = पा_८,४.४९ //
अचि परे शरो न द्वे स्तः / चतुर्षु //

मो नो धातोः // लसक_२७२ = पा_८,२.६४ //
धातोर्मस्य नः पदान्ते / प्रशान् //

किमः कः // लसक_२७३ = पा_७,२.१०३ //
किमः कः स्याद्विभक्तौ / कः / कौ / के इत्यादि / शेषं सर्ववत् //

इदमो मः // लसक_२७४ = पा_७,२.१०८ //
सौ / त्यदाद्यत्वापवादः //

इदो ऽय् पुंसि // लसक_२७५ = पा_७,२.१११ //
इदम इदो ऽय् सौ पुंसि / अयम् / त्यदाद्यत्वे //

अतो गुणे // लसक_२७६ = पा_६,१.९७ //
अपदान्तादतो गुणे पररूपमेकादेशः //

दश्च // लसक_२७७ = पा_७,२.१०९ //
इदमो दस्य मः स्याद्विभक्तौ / इमौ / इमे / त्यदादेः सम्बोधनं नास्तीत्युत्सर्गः //

अनाप्यकः // लसक_२७८ = पा_७,२.११२ //
अककारस्येदम इदो ऽनापि विभक्तौ / आबिति प्रत्याहारः / अनेन //

हलि लोपः // लसक_२७९ = पा_७,२.११३ //
अककारस्येदम इदो लोप आपि हलादौ / नानर्थके ऽलो ऽन्त्यविधिरनभ्यासविकारे //

आद्यन्तवदेकस्मिन् // लसक_२८० = पा_१,१.२१ //
एकस्मिन्क्रियमाणं कार्यमादाविवान्त इव स्यात् / सुपि चेति दीर्घः / आभ्याम् //

नेदमदसोरकोः // लसक_२८१ = पा_७,१.११ //
अककारयोरिदमदसोर्भिस ऐस् न / एभिः / अस्मै / एभ्यः / अस्मात् / अस्य / अनयोः / एषाम् / अस्मिन् / अनयोः / एषु //

द्वितीयाटौस्स्वेनः // लसक_२८२ = पा_२,४.३४ //
इदमेतदोरन्वादेशे / किञ्चित्कार्यं विधातुमुपात्तस्य कार्यान्तरं विधातुं पुनरुपादानमन्वादेशः / यथा - अनेन व्याकरणमधीत मेनं छन्दो ऽध्यापयेति / अनयोः पवित्रं कुलमेनयोः प्रभूतं स्वामिति // एनम् / एनौ / एनान् / एनेन / एनयोः / एनयोः // राजा //

न ङिसम्बुद्ध्योः // लसक_२८३ = पा_८,२.८ //
नस्य लोपो न ङौ सम्बुद्धौ च / हे राजन् / (ङावुत्तरपदे प्रतिषेधो वक्तव्यः) / ब्रह्मनिष्ठः / राजानौ / राजानः / राज्ञः //

नलोपः सुप्स्वरसंज्ञातुग्विधिषु कृति // लसक_२८४ = पा_८,२.२ //
सुब्विधौ स्वरविधौ संज्ञाविधौ कृति तुग्विधौ च नलोपो ऽसिद्धो नान्यत्र - राजाश्व इत्यादौ / इत्यसिद्धत्वादात्वमेत्त्वमैस्त्वं च न / राजभ्याम् / राजभिः / राज्ञि, राजनि / राजसु // यज्वा / यज्वानौ / यज्वानः //

न संयोगाद्वमन्तात् // लसक_२८५ = पा_६,४.१३७ //
वमन्तसंयोगादनो ऽकारस्य लोपो न / यज्वनः / यज्वा / यज्वभ्याम् // ब्रह्मणः / ब्रह्मणा //

इन्हन्पूषार्यम्णां शौ // लसक_२८६ = पा_६,४.१२ //
एषां शावेवोपधाया दीर्घो नान्यत्र / इति निषेधे प्राप्ते - .

सौ च // लसक_२८७ = पा_६,४.१३ //
इन्नादीनामुपधाया दीर्घो ऽसंबुद्धौ सौ / वृत्रहा / हे वृत्रहन् //

एकाजुत्तरपदे णः // लसक_२८८ = पा_८,४.१२ //
एकाजुत्तपरदं यस्य तस्मिन्समासे पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य प्रतिपदिकान्तनुम्विभक्तिस्थस्य नस्य णः / वृत्रहणौ //

हो हन्तेर्ञ्णिन्नेषु // लसक_२८९ = पा_७,३.५४ //
ञिति णिति प्रत्यये नकारे च परे हन्तेर्हकारस्य कुत्वम् / वृत्रघ्नः इत्यादि / एवं शार्ङ्गिन्, यशस्विन्, अर्यमन्, पूषन् //

मघवा बहुलम् // लसक_२९० = पा_६,४.१२८ //
मघवन्शब्दस्य वा तृ इत्यन्तादेशः / ऋ इत् //

उगिदचां सर्वनामस्थाने ऽधातोः // लसक_२९१ = पा_७,१.७० //
अधातोरुगितो नलोपिनो ऽञ्चतेश्च नुम् स्यात्सर्वनामस्थाने परे / मघवान् / मघवन्तौ / मघवन्तः / हे मघवन् / मघवद्भ्याम् / तृत्वाभावे मघवा / सुटि राजवत् //

श्वयुवमघोनामतद्धिते // लसक_२९२ = पा_६,४.१३३ //
अन्नन्तानां भानामेषामतद्धिते संप्रसारणम् / मघोनः / मघवभ्याम् / एवं श्वन्, युवन् //

न संप्रसारणे संप्रसारणम् // लसक_२९३ = पा_६,१.३७ //
संप्रसारणे परतः पूर्वस्य यणः संप्रसारणं न स्यात् / इति यकारस्य नेत्वम् / अत एव ज्ञापकादन्त्यस्य यणः पूर्वं संप्रसारणम् / यूनः / यूना / युवभ्याम् इत्यादि // अर्वा / हे अर्वन् //

अर्वणस्त्रसावनञः // लसक_२९४ = पा_६,४.१२७ //
नञा रहितस्यार्वन्नित्यस्याङ्गस्य तृ इत्यन्तादेशो न तु सौ / अर्वन्तौ / अर्वन्तः / अर्वद्भ्यामित्यादि //

पथिमथ्यृभुक्षामात् // लसक_२९५ = पा_७,१.८५ //
एषामाकारो ऽन्तादेशः स्यात् सौ परे //

इतो ऽत्सर्वनामस्थाने // लसक_२९६ = पा_७,१.८६ //
पथ्यादेरिकारस्याकारः स्यात्सर्वनामस्थाने परे //

थो न्थः // लसक_२९७ = पा_७,१.८७ //
पथिमथोस्थस्य न्थादेशः सर्वनामस्थाने / पन्थाः / पन्थानौ / पन्थानः //

भस्य टेर्लोपः // लसक_२९८ = पा_७,१.८८ //
भस्य पथ्यादेष्टेर्लोपः / पथः / पथा / पथिभ्याम् // एवं मथिन्, ऋभुक्षिन् //

ष्णान्ता षट् // लसक_२९९ = पा_१,१.२४ //
षान्ता नान्ता च संख्या षट्संज्ञा स्यात् / पञ्चन्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः / पञ्च / पञ्च / पञ्चभिः / पञ्चभ्यः / पञ्चभ्यः /
नुट् //

नोपधायाः // लसक_३०० = पा_६,४.७ //
नान्तस्योपधाया दीर्घो नामि / पञ्चानाम् / पञ्चसु //

अष्टन आ विभक्तौ // लसक_३०१ = पा_७,२.८४ //
हलादौ वा स्यात् //

अष्टाभ्य औश् // लसक_३०२ = पा_७,१.२१ //
कृताकारादष्टनो जश्शसोरौश् / अष्टभ्य इति वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो जश्शसोर्विषये आत्वं ज्ञापयति / अष्टौ / अष्टौ / अष्टाभिः / अष्टाभ्यः / अष्टाभ्यः / अष्टानाम् / अष्टासु / आत्वाभावे अष्ट, पञ्चवत् //

ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक्रुञ्चां च // लसक_३०३ = पा_३,२.५९ //
एभ्यः क्विन्, अञ्चेः सुप्युपपदे, युजिक्रुञ्चोः, केवलयोः, क्रुञ्चेर्नलोपाभावश्च निपात्यते / कनावितौ //

कृदतिङ् // लसक_३०४ = पा_३,१.९३ //
अत्र धात्वधिकारे तिङ्भिन्नः प्रत्ययः कृत्संज्ञः स्यात् //

वेरपृक्तस्य // लसक_३०५ = पा_६,१.६७ //
अपृक्तस्य वस्य लोपः //

क्विन्प्रत्ययस्य कुः // लसक_३०६ = पा_८,२.६२ //
क्विन्प्रत्ययो यस्मात्तस्य कवर्गो ऽन्तादेशः पदान्ते / अस्यासिद्धत्वाच्चोः कुरिति कुत्वम् / ऋत्विक्, ऋत्विग् / ऋत्विजौ /
ऋत्विग्भ्याम् //

युजेरसमासे // लसक_३०७ = पा_७,३.७१ //
युजेः सर्वनामस्थाने नुम् स्यादसमासे / सुलोपः / संयोगान्तलोपः / कुत्वेन नस्य ङः / युङ् / अनुस्वारपरसवर्णौ / युञ्जौ / युञ्जः / युग्भ्याम् //

चोः कुः // लसक_३०८ = पा_८,२.३० //
चवर्गस्य कवर्गः स्याज्झलि पदान्ते च / सुयुक्, सुयुग् / सुयुजौ / सुयुग्भ्याम् // खन् / खञ्जौ / खन्भ्याम् //

व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः // लसक_३०९ = पा_८,२.३६ //
झलि पदान्ते च / जश्त्वचर्त्वे / राट्, राड् / राजौ / राजः / राड्भ्याम् // एवं विभ्राट्, देवेट्, विश्वसृट् // (परौ व्रजेः षः पदान्ते) / परावुपपदे व्रजेः क्विप् स्याद्दीर्घश्च पदान्ते षत्वमपि / परिव्राट् / परिव्राजौ //

विश्वस्य वसुराटोः // लसक_३१० = पा_६,३.१२८ //
विश्वशब्दस्य दीर्घो ऽन्तादेशः स्याद्सौ राट्शब्दे च परे / विश्वराट्, विश्वराड् / विश्वराजौ / विश्वराड्भ्याम् //

स्कोः संयोगाद्योरन्ते च // लसक_३११ = पा_८,२.२९ //
पदान्ते झलि च यः संयोगस्तदाद्योः स्कोर्लोपः / भृट् / सस्य श्चुत्वेन सः / झलां जश् झशि इति शस्य जः / भृज्जौ / भृड्भ्याम् // त्यदाद्यत्वं पररूपत्वं च //

तदोः सः सावनन्त्ययोः // लसक_३१२ = पा_७,२.१०६ //
त्यदादीनां तकारदकारयोरनन्त्ययोः सः स्यात्सौ / स्यः / त्यौ / त्ये // सः / तौ / ते // यः / यौ / ये // एषः / एतौ / एते //

ङेप्रथमयोरम् // लसक_३१३ = पा_७,१.२८ //
युष्मदस्मद्भ्यां परस्य ङे इत्येतस्य प्रथमाद्वितीययोश्चामादेशः //

त्वाहौ सौ // लसक_३१४ = पा_७,२.९४ //
अनयोर्मपर्यन्तस्य त्वाहौ आदेशौ स्तः //

शेषे लोपः // लसक_३१५ = पा_७,२.९० //
एतयोष्टिलोपः / त्वम् / अहम् //

युवावौ द्विवचने // लसक_३१६ = पा_७,२.८२ //
द्वयोरुक्तावनयोर्मपर्यन्तस्य युवावौ स्तो विभक्तौ //

प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् // लसक_३१७ = पा_७,२.८८ //
औङ्येतयोरात्वं लोके / युवाम् / आवाम् //

यूयवयौ जसि // लसक_३१८ = पा_७,२.९३ //
अनयोर्मपर्यन्तस्य / यूयम् / वयम् //

त्वमावेकवचने // लसक_३१९ = पा_७,२.९७ //
एकस्योक्तावनयोर्मपर्यन्तस्य त्वमौ स्तो विभक्तौ //

द्वितीयायाञ्च // लसक_३२० = पा_७,२.८७ //
अनयोरात्स्यात् / त्वाम् / माम् //

शसो न // लसक_३२१ = पा_७,१.२९ //
आभ्यां शसो नः स्यात् / अमो ऽपवादः / आदेः परस्य / संयोगान्तलोपः / युष्मान् / अस्मान् //

यो ऽचि // लसक_३२२ = पा_७,२.८९ //
अनयोर्यकारादेशः स्यादनादेशे ऽजादौ परतः / त्वया / मया //

युष्मदस्मदोरनादेशे // लसक_३२३ = पा_७,२.८६ //
अनयोरात्स्यादनादेशे हलादौ विभक्तौ / युवाभ्याम् / आवाभ्याम् / युष्माभिः / अस्माभिः //

तुभ्यमह्यौ ङयि // लसक_३२४ = पा_७,२.९५ //
अनयोर्मपर्यन्तस्य / टिलोपः / तुभ्यम् / मह्यम् //

भ्यसो ऽभ्यम् // लसक_३२५ = पा_७,१.३० //
आभ्यां परस्य / युष्मभ्यम् / अस्मभ्यम् //

एकवचनस्य च // लसक_३२६ = पा_७,१.३२ //
आभ्यां ङसेरत् / त्वत् / मत् //

पञ्चम्या अत् // लसक_३२७ = पा_७,१.३१ //
आभ्यां पञ्चम्यां भ्यसो ऽत्स्यात् / युष्मत् / अस्मत् //

तवममौ ङसि // लसक_३२८ = पा_७,२.९६ //
अनयोर्मपर्यन्तस्य तवममौ स्तो ङसि //

युष्मदस्मद्भ्यां ङसो ऽश् // लसक_३२९ = पा_७,१.२७ //
तव / मम / युवयोः / आवयोः //

साम आकम् // लसक_३३० = पा_७,१.३३ //
आभ्यां परस्य साम आकं स्यात् / युष्माकम् / अस्माकम् / त्वयि / मयि / युवयोः / आवयोः / युष्मासु / अस्मासु //
युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वांनावौ // लसक_३३१ = पा_८,१.२० //
पदात्परयोरपादादौ स्थितयोः षष्ठ्यादिविशिष्टयोर्वां नौ इत्यादेशौ स्तः //

बहुवचनस्य वस्नसौ // लसक_३३२ = पा_८,१.२१ //
उक्तविधयोरनयोः षष्ठ्यादिबहुवचनान्तयोर्वस्नसौ स्तः //

तेमयावेकवचनस्य // लसक_३३३ = पा_८,१.२२ //
उक्तविधयोरनयोष्षष्ठीचतुर्थ्येकवचनान्तयोस्ते मे एतौ स्तः //

त्वामौ द्वितीयायाः // लसक_३३४ = पा_८,१.२३ //
द्वितीयैकवचनान्तयोस्त्वा मा इत्यादेशौ स्तः //
श्रीशस्तवावतु मापीह दत्तात्ते मे ऽपि शर्म सः / स्वामी ते मे ऽपि स हरिः पातु वामपि नौ विभुः //
सुखं वां नौ ददात्वीशः पतिर्वामपि नौ हरिः / सो ऽव्याद्वो नः शिवं वो नो दद्यात् सेव्यो ऽत्र वः स नः //
(एकवाक्ये युष्मदस्मदादेशा वक्तव्याः) / एकतिङ् वाक्यम् / ओदनं पच तव भविष्यति / (एते वान्नावादयो ऽनन्वादेशे वा वक्तव्याः) / अन्वादेशे तु नित्यं स्युः / धाता ते भक्तो ऽस्ति, धाता तव भक्तो ऽस्ति वा / तस्मै ते नम इत्येव // सुपात्, सुपाद् // सुपदौ //

पादः पत् // लसक_३३५ = पा_६,४.१३० //
पाच्छब्दान्तं यदङ्गं भं तदवयवस्य पाच्छब्दस्य पदादेशः // सुपदः / सुपदा / सुपाद्भ्याम् // अग्निमत्, अग्निमद् / अग्निमथौ / अग्निमथः //

अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति // लसक_३३६ = पा_६,४.२४ //
हलन्तानामनिदितामङ्गानामुपधाया नस्य लोपः किति ङिति / नुम् / संयोगान्तस्य लोपः / नस्य कुत्वेन ङः / प्राङ् / प्राञ्चौ / प्राञ्चः //

अचः // लसक_३३७ = पा_६,४.१३८ //
लुप्तनकारस्याञ्चतेर्भस्याकारस्य लोपः //

चौ // लसक_३३८ = पा_६,३.१३८ //
लुप्ताकारनकारे ऽञ्चतौ परे पूर्वस्याणो दीर्गः / प्राचः / प्राचा / प्राग्भ्याम् // प्रत्यङ् / प्रत्यञ्चौ / प्रतीचः / प्रत्यग्भ्याम् // उदङ् / उदञ्चौ //

उद ईत् // लसक_३३९ = पा_६,४.१३९ //
उच्छब्दात्परस्य लुप्तनकारस्याञ्चतेर्भस्याकारस्य ईत् / उदीचः / उदीचा / उदग्भ्याम् / ,

समः समि // लसक_३४० = पा_६,३.९३ //
वप्रत्ययान्ते ऽञ्चतौ / सम्यङ् / सम्यञ्चौ / समीचः / सम्यग्भ्याम् // ,

सहस्य सध्रिः // लसक_३४१ = पा_६,३.९५ //
तथा / सध्र्यङ् // ,

तिरसस्तिर्यलोपे // लसक_३४२ = पा_६,३.९४ //
अलुप्ताकारे ऽञ्चतौ वप्रत्ययान्ते तिरसस्तिर्यादेशः / तिर्यङ् / तिर्यञ्चौ / तिरश्चः / तिर्यग्भ्याम् // ,

नाञ्चेः पूजायाम् // लसक_३४३ = पा_६,४.३० //
पूजार्थस्याञ्चतेरुपधाया नस्य लोपो न / प्राङ् / प्राञ्चौ / नलोपाभावादलोपो न / प्राञ्चः / प्राङ्भ्याम् / प्राङ्क्षु // एवं पूजार्थे प्रत्यङ्ङादयः // क्रुङ् / क्रुञ्चौ / क्रुङ्भ्याम् // पयोमुक्, पयोमुग् / पयोमुचौ / पयोमुग्भ्याम् // उगित्त्वान्नुमि - ,

सान्तमहतः संयोगस्य // लसक_३४४ = पा_६,४.१० //
सान्तसंयोगस्य महतश्च यो नकारस्तस्योपधाया दीर्घो ऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने / महान् / महान्तौ / महान्तः / हे महन् / महद्भ्याम् // ,

अत्वसन्तस्य चाधातोः // लसक_३४५ = पा_६,४.१४ //
अत्वन्तस्योपधाया दीर्घो धातुभिन्नासन्तस्य चासम्बुद्धौ सौ परे / उगित्तवान्नुम् / धीमान् / धीमन्तौ / धीमन्तः / हे धीमन् शसादौ महद्वत् // भातेर्डवतुः / डित्त्वसामर्थ्यादभस्यापि टेर्लोपः / भवान् / भवान्तौ / भवन्तः / शत्रन्तस्य भवन् // ,

उभे अभ्यस्तम् // लसक_३४६ = पा_६,१.५ //
षाष्ठद्वित्वप्रकरणे ये द्वे विहिते ते उभे समुदिते अभ्यस्तसंज्ञे स्तः // ,

नाभ्यस्ताच्छतुः // लसक_३४७ = पा_७,१.७८ //
अभ्यस्तात्परस्य शतुर्नुम् न / ददत्, ददद् / ददतौ / ददतः // ,

जक्षित्यादयः षट् // लसक_३४८ = पा_६,१.६ //
षड्धातवो ऽन्ये जक्षितिश्च सप्तम एते अभ्यस्तसंज्ञाः स्युः / जक्षत्, जक्षद् / जक्षतौ / जक्षतः // एवं जाग्रत् / दरिद्रत् / शासत् / चकासत् // गुप्, गुब् / गुपौ / गुपः / गुब्भ्याम् // ,

त्यदादिषु दृशो ऽनालोचने कञ्च // लसक_३४९ = पा_३,२.६० //
त्यदादिषूपपदेष्वज्ञानार्थाद्दृशेः कञ् स्यात् / चात् क्विन् // ,

आ सर्वनाम्नः // लसक_३५० = पा_६,३.९१ //
सर्वनाम्न आकारो ऽन्तादेशः स्याद्दृग्दृशवतुषु / तादृक्, तादृग् / तादृशौ / तादृशः / तादृग्भ्याम् // व्रश्चेति षः / जश्त्वचर्त्वे / विट्, विड् / विशौ / विशः / विड्भ्याम् // ,

नशेर्वा // लसक_३५१ = पा_८,२.६३ //
नशेः कवर्गो ऽन्तादेशो वा पदान्ते / नक्, नग्॑ नट्, नड् / नशौ / नशः / नग्भ्याम्, नड्भ्याम् // ,

स्पृशो ऽनुदके क्विन् // लसक_३५२ = पा_३,२.५८ //
अनुदके सुप्युपपदे स्पृशेः क्विन् / घृतस्पृक्, घृतस्पृग् / घृतस्पृशौ / घृतस्पृशः // दधृक्, दधृग् / दधृषौ / दधृग्भ्याम् // रत्नमुषौ / रत्नमुड्भ्याम् // षट्, षड् / षड्भिः / षङ्भ्यः / षण्णाम् / षट्सु // रुत्वं प्रति षत्वस्यासिद्धत्वससजुषो रुरिति रुत्वर्म् // ,

वोरुपधाया दीर्घ इकः // लसक_३५३ = पा_८,२.७६ //
रेफवान्तयोर्धात्वोरुपधाया इको दीर्घः पदान्ते / पिपठीः / पिपठिषौ / पिपठीर्भ्याम् // ,

नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाये ऽपि // लसक_३५४ = पा_८,३.५८ //
एतैः प्रत्येकं व्यवधाने ऽपि इण्कुभ्यां परस्य सस्य मूर्धन्यादेशः / ष्टुत्वेन पूर्वस्य षः / पिपठीष्षु, पिपठीःषु // चिकीः / चिकीर्षौ / चिकीर्भ्याम् / चिकीर्षु // विद्वान् / विद्वांसौ / हे विद्वन् // ,

वसोः सम्प्रसारणम् // लसक_३५५ = पा_६,४.१३१ //
वस्वन्तस्य भस्य सम्प्रसारणं स्यात् / विदुषः / वसुस्रंस्विति दः / विद्वद्भ्याम् //

पुंसो ऽसुङ् // लसक_३५६ = पा_७,१.८९ //
सर्वनामस्थाने विवक्षिते पुंसो ऽसुङ् स्यात् / पुमान् / हे पुमन् / पुमांसौ / पुंसः / पुम्भ्याम् / पुंसु // ऋदुशनेत्यनङ् / उशना / उशनसौ / (अस्य संबुद्धौ वानङ्, नलोपश्च वा वाच्यः) / हे उशन, हेउशनन्, हेउशनः / हे उशनसौ / उशनोभ्याम् / उशनस्सु // अनेहा / अनेहसौ / हे अनेहः // वेधाः / वेधसौ / हे वेधः / वेधोभ्याम् //

अदस औ सुलोपश्च // लसक_३५७ = पा_७,२.१०७ //
अदस औकारो ऽन्तादेशः स्यात्सौ परे सुलोपश्च / तदोरिति सः / असौ / त्यदाद्यत्वम् / वृद्धिः //

अदसो ऽसेर्दादु दो मः // लसक_३५८ = पा_८,२.८० //
अदसो ऽसान्तस्य दात्परस्य उदूतौ स्तो दस्य मश्च / आन्तरतम्याद्ध्स्वस्य उः, दीर्घस्य ऊः / अमू / जसः शी / गुणः //

एत ईद्बहुवचने // लसक_३५९ = पा_८,२.८१ //
अदसो दात्परस्यैत ईद्दस्य च मो बह्वर्थोक्तौ / अमी / पूर्वत्रासिद्धमिति विभक्तिकार्यं प्राक् पश्चादुत्वमत्वे / अमुम् / अमू / अमून् / मुत्वे कृते घिसंज्ञायां नाभावः //

न मु ने // लसक_३६० = पा_८,२.३ //
नाभावे कर्तव्ये कृते च मुभावो नासिद्धः / अमुना / अमूभ्याम् ३ / अमीभिः / अमुष्मै / अमीभ्यः २ / अमुष्मात् / अमुष्य / अमुयोः २ / अमीषाम् / अमुष्मिन् / अमीषु //

इति हलन्त पुंल्लिङ्गाः //

अथ हलन्तस्त्रीलिङ्गाः

नहो धः // लसक_३६१ = पा_८,२.३४ //
नहो हस्य धः स्याज्झलि पदान्ते च //

नहिवृतिवृषिव्यधिरुचिसहितनिषु क्वौ // लसक_३६२ = पा_६,३.११६ //
क्विबन्तेषु पूर्वपदस्य दीर्घः / उपानत्, उपानद् / उपानहौ / उपानत्सु // क्विन्नन्तत्वात् कुत्वेन घः / उष्णिक्, उष्णिग् / उष्णिहौ / उष्णिग्भ्याम् // द्यौः / दिवौ / दिवः / द्युभ्याम् // गीः / गिरौ / गिरः // एवं पूः // चतस्रः / चतसृणाम् // का / के / काः / सर्वावत् //

यः सौ // लसक_३६३ = पा_७,२.११० //
इदमो दस्य यः इयम् / त्यदाद्यत्वम् / पररूपत्वम् / टाप् / दश्चेति मः / इमे / इमाः / इमाम् / अनया / हलि लोपः / आभ्याम् / आभिः / अस्यै / अस्याः / अनयोः / आसाम् / अस्याम् / आसु // त्यदाद्यत्वम् / टाप् / स्या / त्ये / त्याः // एवं तद्, एतद् // वाक्, वाग् / वाचौ / वाग्भ्याम् / वाक्षु // अप्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः / अप्तृन्निति दीर्घः / आपः / अपः //

अपो भि // लसक_३६४ = पा_७,४.४८ //
अपस्तकारो भादौ प्रत्यये / अद्भिः / अद्भ्यः / अद्भ्यः / अपाम् / अप्सु // दिक्, दिश् / दिशौ / दिशः / दिग्भ्याम् // त्यदादिष्विति दृशेः क्विन्विधानादन्यत्रापि कुत्वम् / दृक्, दृग् / दृशौ / दृग्भ्याम् // त्विट्, त्विड् / त्विषौ / त्विड्भ्याम् // ससजुषो रुरिति रुत्वम् / सजूः / सजुषौ / सजूर्भ्याम् // आशीः / आशिषौ / आशीर्भ्याम् // असौ / उत्वमत्वे / अमू / अमूः / अमुया / अमूभ्याम् ३ / अमूभिः / अमुष्यै / अमूभ्यः २ / अमुष्याः / अमुयोः २ / अमूषाम् / अमुष्याम् / अमूषु //

इति हलन्तस्त्रीलिङ्गाः /

अथ हलन्तनपुंसकलिङ्गाः

स्वमोर्लुक् / दत्वम् / स्वनडुत्, स्वनडुद् / स्वनडुही / चतुरनडुहोरित्याम् / स्वनड्वांहि / पुनस्तद्वत् / शेषं पुंवत् // वाः / वारी / वारि / वार्भ्याम् // चत्वारि // किम् / के / कानि // इदम् / इमे / इमानि // (अन्वादेशे नपुंसके वा एनद्वक्तव्यः) / एनत् / एने / एनानि / एनेन / एनयोः // अहः / विभाषा ङिश्योः / अह्नी, अहनी / अहानि //

अहन् // लसक_३६५ = पा_८,२.८६ //
अहन्नित्यस्य रुः पदान्ते / अहोभ्याम् // दण्डि / दण्डिनी / दण्डीनि / दण्डिना / दण्डिभ्याम् // सुपथि / टेर्लोपः / सुपथी / सुपन्थानि // ऊर्क, ऊर्ग / ऊर्जी / ऊन्र्जि / नरजानां संयोगः / तत् / ते / तानि // यत् / ये / यानि // एतत् / एते / एतानि // गवाक्, गवाग् / गोची / गवाञ्चि / पुनस्तद्वत् / गोचा / गवाग्भ्याम् // शकृत् / शकृती / शकृन्ति // ददत् //

वा नपुंसकस्य // लसक_३६६ = पा_७,१.७९ //
अभ्यस्तात्परो यः शता तदन्तस्य क्लीबस्य वा नुम् सर्वनामस्थाने / ददन्ति, ददति // तुदत् //

आच्छीनद्ययोर्नुम् // लसक_३६७ = पा_७,१.८० //
अवर्णान्तादङ्गात्परो यः शतुरवयस्तदन्तस्य नुम् वा शीनद्योः / तुदन्ती, तुदती / तुदन्ति //

शप्श्यनोर्नित्यम् // लसक_३६८ = पा_७,१.८१ //
शप्श्यनोरात्परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नित्यं नुम् शीनद्योः / पचन्ती / पचन्ति / दीव्यत् / दीव्यन्ती / दीव्यन्ति // धनुः / धनुषी / सान्तेति दीर्घः / नुम्विसर्जनीयेति षः / धनुषि / धनुषा / धनुर्भ्याम् / एवं चक्षुर्हविरादयः // पयः / पयसी / पयांसि / पयसा / पयाभ्याम् // सुपुम् / सुपुंसी / सुपुमांसि // अदः / विभक्तिकार्यम् / उत्वमत्वे / अमू / अमूनि / शेषं पुंवत् // ,

इति हलन्तनपुंसकलिङ्गाः /

इति षड्लिङ्गप्रकरणम् /

अथाव्ययानि

स्वरादिनिपातमव्ययम् // लसक_३६९ = पा_१,१.३७ //
स्वरादयो निपाताश्चाव्ययसंज्ञाः स्युः / स्वर् / अन्तर् / प्रातर् / पुनर् / सनुतर् / उच्चैस् / नीचैस् / शनैस् / ऋधक् / ऋते / युगपत् / आरात् / पृथक् / ह्यस् / श्वस् / दिवा / रात्रौ / सायम् / चिरम् / मनाक् / ईषत् / जोषम् / तूष्णीम् / बहिस् / अवस् / समया / निकषा / स्वयम् / वृथा / नक्तम् / नञ् / हेतौ / इद्धा / अद्धा / सामि / वत् / ब्राह्मणवत् / क्षत्रियवत् // सना / सनत् / सनात् / उपधा / तिरस् / अन्तरा / अन्तरेण / ज्योक् / कम् / षम् / सहसा / विना / नाना / स्वस्ति / स्वधा / अलम् / वषट् / श्रौषट् / वौषट् / अन्यत् / अस्ति / उपांशु / क्षमा / विहायसा / दोषा / मृषा / मिथ्या / मुधा / पुरा / मिथो / मिथस् / प्रायस् / मुहुस् / प्रवाहुकम्, प्रवाहिका / आर्यहलम् / अभीक्ष्णम् / साकम् / सार्धम् / नमस् / हिरुक् / धिक् / अथ / अम् / आम् / प्रताम् / प्रशान् / प्रतान् / मा / माङ् / आकृतिगणो ऽयम् //
च / वा / ह / अह / एव / एवम् / नूनम् / शश्वत् / युगपत् / भूयस् / कूपत् / कुवित् / नेत् / चेत् / चण् / कच्चित् / यत्र / नह / हन्त / माकिः / माकिम् / नकिः / नकिम् / माङ् / नञ् / यावत् / तावत् / त्वे / द्वै / त्वै / रै / श्रौषट् / वौषट् / स्वाहा / स्वधा / वषट् / तुम् / तथाहि / खलु / किल / अथो / अथ / सुष्ठु / स्म / आदह / (उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च)/ अवदत्तम् / अहंयुः / अस्तिक्षीरा / अ / आ / इ / ई / उ / ऊ / ए / ऐ / ओ / औ / पशु / शुकम् / यथाकथाच / पाट् / प्याट् / अङ्ग / है / हे / भोः / अये / द्य / विषु / एकपदे / युत् / आतः / चादिरप्याकृतिगणः //
तसिलादयः प्राक् पाशपः / शस्प्रभृतयः प्राक् समासान्तेभ्यः / अम् / आम् / कृत्वोर्थाः / तसिवती / नानाञौ / एतदन्तमप्यव्ययम् //

कृन्मेजन्तः // लसक_३७० = पा_१,१.३९ //
कृद्यो मान्त एजन्तश्च तदन्तमव्ययं स्यात् / स्मारं स्मारम् / जीवसे / पिबध्यै //

क्त्वातोसुन्कसुनः // लसक_३७१ = पा_१,१.४० //
एतदन्तमव्ययम् / कृत्वा / उदेतोः / विसृपः //

अव्ययीभावश्च // लसक_३७२ = पा_१,१.४१ //
अधिहरि //

अव्ययादाप्सुपः // लसक_३७३ = पा_२,४.८२ //
अव्ययाद्विहितस्यापः सुपश्च लुक् / तत्र शालायाम् //
सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु /&न्ब्स्प्॑वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् //
वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः / आपं चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा //
वगाहः, अवगाहः / पिधानम्, अपिधानम् //

इत्यव्ययानि //

अथ तिङन्ते भ्वादयः

लट्, लिट्, लुट्, ऌट्, लेट्, लोट्, लङ्, लिङ्, लुङ्, ऌङ् / एषु पञ्चमो लकारश्छन्दोमात्रगोचरः //

लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः // लसक_३७५ = पा_३,४.६९ //
लकाराः सकर्मकेभ्यः कर्मणि कर्तरि च स्युरकर्मकेभ्यो भावे कर्तरि च //

वर्तमाने लट् // लसक_३७६ = पा_३,२.१२३ //
वर्तमान क्रिया वृत्तेर्धातोर्लट् स्यात् / अटावितौ / उच्चारण सामर्थ्याल्लस्य नेत्वम् / भू सत्तायाम् // १ // कर्तृ विवक्षायां भू ल् इति स्थिते --- .

तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस्ताताञ्झथासाथाम्ध्वमिड्वहिमहिङ् // लसक_३७७ = पा_३,४.७८ //
एते ऽष्टादश लादेशाः स्युः //

लः परस्मैपदम् // लसक_३७८ = पा_१,४.९९ //
लादेशाः परस्मैपद संज्ञाः स्युः //

तङानावात्मनेपदम् // लसक_३७९ = पा_१,४.१०० //
तङ् प्रत्याहारः शानच्कानचौ चैतत्संज्ञाः स्युः / पूर्व संज्ञापवादः //

अनुदात्तङित आत्मनेपदम् // लसक_३८० = पा_१,३.१२ //
अनुदात्तेतो ङितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात् //

स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले // लसक_३८१ = पा_१,३.७२ //
स्वरितेतो ञितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात्कर्तृगामिनि क्रियाफले //

शेषात्कर्तरि परस्मैपदम् // लसक_३८२ = पा_१,३.७८ //
आत्मनेपद निमित्त हीनाद्धातोः कर्तरि परस्मैपदं स्यात् //

तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः // लसक_३८३ = पा_१,४.१०१ //
तिङ उभयोः पदयोस्त्रिकाः क्रमादेतत्संज्ञाः स्युः //

तान्येकवचनद्विवचनबहुवचनान्येकशः // लसक_३८४ = पा_१,४.१०२ //
लब्ध प्रथमादि संज्ञानि तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रत्येकमेकवचनादि संज्ञानि स्युः //

युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः // लसक_३८५ = पा_१,४.१०५ //
तिङ्वाच्यकारकवाचिनि युष्मदि प्रयुज्यमाने ऽप्रयुज्यमाने च मध्यमः //

अस्मद्युत्तमः // लसक_३८६ = पा_१,४.१०७ //
तथाभूते ऽस्मद्युत्तमः //

शेषे प्रथमः // लसक_३८७ = पा_१,४.१०८ //
मध्यमोत्तमयोरविषये प्रथमः स्यात् / भू ति इति जाते //

तिङ् शित्सार्वधातुकम् // लसक_३८८ = पा_३,४.११३ //
तिङः शितश्च धात्वधिकारोक्ता एतत्संज्ञाः स्युः //

कर्तरि शप् // लसक_३८९ = पा_३,१.६८ //
कर्त्रर्थे सार्वधातुके परे धातोः शप् //

सार्वधातुकार्धधातुकयोः // लसक_३९० = पा_७,३.८४ //
अनयोः परयोरिगन्ताङ्गस्य गुणः / अवादेशः / भवति / भवतः //

झो ऽन्तः // लसक_३९१ = पा_७,१.३ //
प्रत्ययावयवस्य झस्यान्तादेशः / अतो गुणे / भवन्ति / भवसि / भवथः / भवथ //

अतो दीर्घो यञि // लसक_३९२ = पा_७,३.१०१ //
अतो ऽङ्गस्य दीर्घो यञादौ सार्वधातुके / भवामि / भवावः / भवामः / स भवति / तौ भवतः / ते भवन्ति / त्वं भवसि / युवां भवथः / यूयं भवथ / अहं भवामि / आवां भवावः / वयं भवामः //

परोक्षे लिट् // लसक_३९३ = पा_३,२.११५ //
भूतानद्यतन परोक्षार्थवृत्तेर् धातोर्लिट् स्यात् / लस्य तिबादयः /

परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः // लसक_३९४ = पा_३,४.८२ //
लिटस्तिबादीनां नवानां णलादयः स्युः / भू अ इति स्थिते -- .

भुवो वुग्लुङ्लिटोः // लसक_३९५ = पा_६,४.८८ //
भुवो वुगागमः स्यात् लुङ्लिटोरचि //

लिटि धातोरनभ्यासस्य // लसक_३९६ = पा_६,१.८ //
लिटि परे ऽनभ्यासधात्ववयस्यैकाचः प्रथमस्य द्वे स्त आदिभूतादचः परस्य तु द्वितीयस्य / भूव् भूव् अ इति स्थिते -- .

पूर्वो ऽभ्यासः // लसक_३९७ = पा_६,१.४ //
अत्र ये द्वे विहिते तयोः पूर्वो ऽभ्याससंज्ञः स्यात् //

हलादिः शेषः // लसक_३९८ = पा_७,४.६० //
अभ्यासस्यादिर्हल् शिष्यते अन्ये हलो लुप्यन्ते / इति वलोपः //

ह्रस्वः // लसक_३९९ = पा_७,४.५९ //
अभ्यासत्याचो ह्रस्वः स्यात् //

भवतेरः // लसक_४०० = पा_७,४.७३ //
भवतेरभ्यासोकारस्य अः स्याल्लिटि //

अभ्यासे चर्च // लसक_४०१ = पा_८,४.५४ //
अभ्यासे झलां चरः स्युर्जशश्च / झशां जशः खयां चर इति विवेकः / बभूव / बभुवतुः / बभूवुः //

लिट् च // लसक_४०२ = पा_३,४.११५ //
लिडादेशस्तिङ्ङार्धधातुकसंज्ञः //

आर्धधातुकस्येड्वलादेः // लसक_४०३ = पा_७,२.३५ //
वलादेरार्धधातुरस्येडागमः स्यात् / बभूविथ / बभूवथुः / बभूव / बभूव / बभूविव / बभूविम /

अनद्यतने लुट् // लसक_४०४ = पा_३,३.१५ //
भविष्यत्यनद्यतनेर्ऽथे धातोर्लुट् स्यात् //

स्यतासी ऌलुटोः // लसक_४०५ = पा_३,१.३३ //
धातोः स्य तासि एतौ प्रत्ययौ स्तो ऌलुटोः परतः / शबाद्यपवादः / इति ऌङॢटोर्ग्रहणम् /

आर्धधातुकं शेषः // लसक_४०६ = पा_२,४.११४ //
तिङ्शिद्भ्यो ऽन्यो धातोरिति विहितः प्रत्यय एतत्संज्ञः स्यात् / इट् //

लुटः प्रथमस्य डारौरसः // लसक_४०७ = पा_२,४.८५ //
डा रौ रस् एते क्रमात्स्युः / डित्वसामर्थ्यादभस्यापि टेर्लोपः / भविता //

तासस्त्योर्लोपः // लसक_४०८ = पा_७,४.५० //
तासेरस्तेश्च सस्य लोपस्स्यात् सादौ प्रत्यये परे /

रि च // लसक_४०९ = पा_७,४.५१ //
रादौ प्रत्यये तथा / भवितारौ / भवितारः / भवितासि / भवितास्थः / भवितास्थ / भवितास्मि / भवितास्वः / भवितास्मः/

ऌट् शेषे च // लसक_४१० = पा_३,३.१३ //
भविष्यदर्थाद्धातोरॢट् क्रियार्थायां क्रियायां सत्यामसत्यां वा / स् य इट् / भविष्यति / भविष्यतः / भविष्यन्ति / भविष्यसि / भविष्यथः / भविष्यथ / भविष्यामि / भविष्यावः / भविष्यामः/
लोट् च // लसक_४११ = पा_३,३.१६२ //
विध्याद्यर्थेषु धातोर्लोट् //

आशिषि लिङ्लोटौ // लसक_४१२ = पा_३,३.१७३ //

एरुः // लसक_४१३ = पा_३,४.८६ //
लोट इकारस्य उः / भवतु //

तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् // लसक_४१४ = पा_७,१.३५ //
आशिषि तुह्योस्तातङ् वा / परत्वात्सर्वादेशः / भवतात् //

लोटो लङ्वत् // लसक_४१५ = पा_३,४.८५ //
लोटस्तामादयस्सलोपश्च //

तस्थस्थमिपां तांतंतामः // लसक_४१६ = पा_३,४.१०१ //
ङितश्चतुर्णां तामादयः क्रमात्स्युः / भवताम् / भवन्तु //

सेर्ह्यपिच्च // लसक_४१७ = पा_३,४.८७ //
लोटः सेर्हिः सो ऽपिच्च //

अतो हेः // लसक_४१८ = पा_६,४.१०५ //
अतः परस्य हेर्लुक् / भव / भवतात् / भवतम् / भवत /

मेर्निः // लसक_४१९ = पा_३,४.८९ //
लोटो मेर्निः स्यात् //

आडुत्तमस्य पिच्च // लसक_४२० = पा_३,४.९२ //
लोडुत्तमस्याट् स्यात् पिच्च / हिन्योरुत्वं न, इकारोच्चारण सामर्थ्यात् //

ते प्राग्धातोः // लसक_४२१ = पा_१,४.८० //
ते गत्युपसर्गसंज्ञा धातोः प्रागेव प्रयोक्तव्याः //

आनि लोट् // लसक_४२२ = पा_८,४.१६ //
उपसर्गसिथान्निमित्तात्परस्य लोडादेशस्यानीत्यस्य नस्य णः स्यात् / प्रभवाणि / (दुरः षत्वणत्वयोरुपसर्गत्वप्रतिषेधो वक्तव्यः)/ दुःस्थितिः / दुर्भवानि/ (अन्तश्शब्दस्याङ्कि विधिणत्वेषूपसर्गत्वं वाच्यम्)/ अन्तर्भवाणि //

नित्यं ङितः // लसक_४२३ = पा_३,४.९९ //
सकारान्तस्य ङिदुत्तमस्य नित्यं लोपः / अलो ऽन्त्यस्येति सलोपः / भवाव / भवाम /

अनद्यतने लङ् // लसक_४२४ = पा_३,२.१११ //
अनद्यतन भूतार्थ वृत्तेर् धातोर् लङ् स्यात् //

लुङ्लङॢङ्क्ष्वडुदात्तः // लसक_४२५ = पा_६,४.७१ //
एष्वङ्गस्याट् //

इतश्च // लसक_४२६ = पा_३,४.१०० //
ङितो लस्य परस्मैपदमिकारान्तं यत्तदन्तस्य लोपः / अभवत् / अभवताम् / अभवन् / अभवः / अभवतम् / अभवत / अभवम् / अभवाव / अभवाम //

विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ् // लसक_४२७ = पा_३,३.१६१ //
एष्वर्थेषु धातोर्लिङ् //

यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च // लसक_४२८ = पा_३,४.१०३ //
लिङः परस्मैपदानां यासुडागमो ङिच्च //

लिङः सलोपो ऽनन्त्यस्य // लसक_४२९ = पा_७,२.७९ //
सार्वधातुकलिङोऽनन्त्यस्य सस्य लोपः / इति प्राप्ते -- .

अतो येयः // लसक_४३० = पा_७,२.८० //
अतः परस्य सार्वधातुकावयवस्य यास् इत्यस्य इय् / गुणः //

लोपो व्योर्वलि // लसक_४३१ = पा_६,१.६६ //
भवेत् / भवेताम् /

झेर्जुस् // लसक_४३२ = पा_३,४.१०८ //
लिङो झेर्जुस् स्यात् / भवेयुः / भवेः / भवेतम् / भवेत / भवेयम् / भवेव / भवेम //

लिङाशिषि // लसक_४३३ = पा_३,४.११६ //
आशिषि लिङस्तिङार्धधातुकसंज्ञः स्यात् //

किदाशिषि // लसक_४३४ = पा_३,४.१०४ //
आशिषि लिङो यासुट् कित् / स्कोः संयोगाद्योरिति सलोपः //

क्ङिति च // लसक_४३५ = पा_१,१.५ //
गित्किन्ङिन्निमित्ते इग्लक्षणे गुणवृद्धी न स्तः / भूयात् / भूयास्ताम् / भूयासुः / भूयाः / भूयास्तम् / भूयास्त / भूयासम् / भूयास्व / भूयास्म /

लुङ् // लसक_४३६ = पा_३,२.११० //
भूतार्थे धातोर्लुङ् स्यात् //

माङि लुङ् // लसक_४३७ = पा_३,३.१७५ //
सर्वलकारापवादः //

स्मोत्तरे लङ् च // लसक_४३८ = पा_३,३.१७६ //
स्मोत्तरे माङि लङ् स्याच्चाल्लुङ् //

च्लि लुङि // लसक_४३९ = पा_३,१.४३ //
शबाद्यपवादः //

च्लेः सिच् // लसक_४४० = पा_३,१.४४ //
इचावितौ //

गातिस्थापाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु // लसक_४४१ = पा_२,४.७७ //
एभ्यः सिचो लुक् स्यात् / गापाविहेणादेशपिबती गृह्यते //

भूसुवोस्तिङि // लसक_४४२ = पा_७,३.८८ //
भू सू एतयोः सार्वधातुके तिङि परे गुणो न / अभूत् / अभूताम् / अभूवन् / अभूः / अभूतम् / अभूत / अभूवम् / अभूव / अभूम /

न माङ्योगे // लसक_४४३ = पा_६,४.७४ //
अडाटौ न स्तः / मा भवान् भूत् / मा स्म भवत् / मा स्म भूत् //

लिङ्निमित्ते ऌङ् क्रियातिपत्तौ // लसक_४४४ = पा_३,३.१३९ //
हेतुहेतुमद्भावादि लिङ्निमित्तं तत्र भविष्यत्यर्थे ऌङ् स्यात् क्रियाया अनिष्पत्तौ गम्यमानायाम् / अभविष्यत् / अभविष्यताम् / अभविष्यन् / अभविष्यः / अभविष्यतम् / अभविष्यत / अभविष्यम् / अभविष्याव / अभविष्याम / सुवृष्टिश्चेदभविष्यत्तदा सुभिक्षमभविष्यत्, इत्यादि ज्ञेयम् // अत सातत्यगमने // २ // अतति //

अत आदेः // लसक_४४५ = पा_६,४.७० //
अभ्यासस्यादेरतो दीर्घः स्यात् / आत / आततुः / आतुः / आतिथ / आतथुः / आत / आत / आतिव / आतिम / अतिता / अतिष्यति / अततु //

आडजादीनाम् // लसक_४४६ = पा_६,४.७२ //
अजादेरङ्गस्याट् लुङ्लङॢङ्क्षु / आतत् / अतेत् / अत्यात् / अत्यास्ताम् / लुङि सिचि इडागमे कृते --- .

अस्तिसिचो ऽपृक्ते // लसक_४४७ = पा_७,३.९६ //
विद्यमानात् सिचो ऽस्तेश्च परस्यापृक्तस्य हल ईडागमः //

इट ईटि // लसक_४४८ = पा_८,२.२८ //
इटः परस्य सस्य लोपः स्यादीटि परे / (सिज्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः) / आतीत् / आतिष्टाम् //

सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च // लसक_४४९ = पा_३,४.१०९ //
सिचो ऽभ्यस्ताद्विदेश्च परस्य ङित्संबन्धिनो झेर्जुस् / आतिषुः / आतीः / आतिष्टम् / आतिष्ट / आतिषम् / आतिष्व / आतिष्म / आतिष्यत् // षिध गत्याम् // ३ //

ह्रस्वं लघु // लसक_४५० = पा_१,४.१० //

संयोगे गरु // लसक_४५१ = पा_१,४.११ //
संयोगे परे ह्रस्वं गुरु स्यात् //

दीर्घं च // लसक_४५२ = पा_१,४.१२ //
गुरु स्यात् //

पुगन्तलघूपधस्य च // लसक_४५३ = पा_७,३.८६ //
पुगन्तस्य लघूपधस्य चाङ्गस्येको गुणः सार्वधातुकार्धधातुकयोः / धात्वादेरिति सः / सेधति / षत्वम् / सिषेध //

असंयोगाल्लिट् कित् // लसक_४५४ = पा_१,२.५ //
असंयोगात्परो ऽपिल्लिट् कित् स्यात् / सिषिधतुः / सिषिधुः / सिषेधिथ / सिषिधथुः / सिषिध / सिषेध / सिषिधिव / सिषिधिम / सेधिता / सेधिष्यति / सेधतु / असेधत् / सेधेत् / सिध्यात् / असेधीत् / असेधिष्यत् / एवम् -- चिती संज्ञाने // ४ // शुच शोके // ५ // गद व्यक्तायां वाचि // ६ // गदति //

नेर्गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यति चिनोतिदेग्धिषु च // लसक_४५५ = पा_८,४.१७ //
उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य नेर्नस्य णो गदादिषु परेषु / प्रणिगदति //

कुहोश्चुः // लसक_४५६ = पा_७,४.६२ //
अभ्यासकवर्गहकारयोश्चवर्गादेशः //

अत अपधायाः // लसक_४५७ = पा_७,२.११६ //
उपधाया अतो वृद्धिः स्यात् ञिति णिति च प्रत्यये परे / जगाद / जगदतुः / जगदुः / जगदिथ / जगदथुः / जगद //

णलुत्तमो वा // लसक_४५८ = पा_७,१.९१ //
उत्तमो णल् वा णित्स्यात् / जगाद, जगद / जगदिव / जगदिम / गदिता / गदिष्यति / गदतु / अगदत् / गदेत् / गद्यात् //

अतो हलादेर्लघोः // लसक_४५९ = पा_७,२.७ //
हलादेर्लघोरकारस्य वृद्धिर्वेडादौ परस्मैपदे सिचि / अगादीत्, अगदीत् / अगदिष्यत् // णद अव्यक्ते शब्दे // ७ //

णो नः // लसक_४६० = पा_६,१.६५ //
धात्वादेर्णस्य नः / णोपदेशास्त्वनर्द्नाटिनाथ्नाध्नन्दनक्कनॄनृतः //

उपसर्गादसमासे ऽपि णोपदेशस्य // लसक_४६१ = पा_८,४.१४ //
उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य धातोर्नस्य णः / प्रणदति / प्रणिनदति / नदति / ननाद //

अत एकहल्मध्ये ऽनादेशादेर्लिटि // लसक_४६२ = पा_६,४.१२० //
लिण्निमित्तादेशादिकं न भवति यदङ्गं तदवयवस्यासंयुक्तहल्मध्यस्थस्यात एत्वमभ्यासलोपश्च किति लिटि / नेदतुः / नेदुः //

थलि च सेटि // लसक_४६३ = पा_६,४.१२१ //
प्रागुक्तं स्यात् / नेदिथ / नेदथुः / नेद / ननाद, ननद / नेदिव / नेदिम / नदिता / नदिष्यति / नदतु / अनदत् / नदेत् / नद्यात् / अनादीत्, अनदीत् / अनदिष्यत् // टु नदि समृद्धौ // ८ //

आदिर्ञिटुडवः // लसक_४६४ = पा_१,३.५ //
उपदेशे धातोराद्या एते इतः स्युः //

इदितो नुम् धातोः // लसक_४६५ = पा_७,१.५८ //
नन्दति / ननन्द / नन्दिता / नन्दिष्यति / नन्दतु / अनन्दत् / नन्देत् / नन्द्यात् / अनन्दीत् / अनन्दिष्यत् / अर्च पूजायाम् // ९ // अर्चति //

तस्मान्नुड् द्विहलः // लसक_४६६ = पा_७,४.७१ //
द्विहलो धातोर्दीर्घीभूतात्परस्य नुट् स्यात् / आनर्च / आनर्चतुः / अर्चिता / अर्चिष्यति / अर्चतु / आर्चत् / अर्चेत् / अर्च्यात् / आर्चीत् / आर्चिष्यत् // व्रज गतौ // १० // व्रजति / वव्राज / व्रजिता / व्रजिष्यति / व्रजतु / अव्रजत् / व्रजेत् / व्रज्यात् //

वदव्रजहलन्तस्याचः // लसक_४६७ = पा_७,२.३ //
एषामचो वृद्धिः सिचि परस्मैपदेषु / अव्राजीत् / अव्रजिष्यत् // कटे वर्षावरणयोः // ११ // कटति / चकाट / चकटतुः / कटिता / कटिष्यति / कटतु / अकटत् / कटेत् / कट्यात् //

ह्म्यन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् // लसक_४६८ = पा_७,२.५ //
हमयान्तस्य क्षणादेर्ण्यन्तस्य श्वयतेरेदितश्च वृद्धिर्नेडादौ सिचि / अकटीत् / अकटिष्यत् // गुपू रक्षणे // १२ //

गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः // लसक_४६९ = पा_३,१.२८ //
एभ्य आयः प्रत्ययः स्यात् स्वार्थे //

सनाद्यन्ता धातवः // लसक_४७० = पा_३,१.३२ //
सनादयः कमेर्णिङन्ताः प्रत्यया अन्ते येषां ते धातुसंज्ञकाः / धातुत्वाल्लडादयः / गोपायति //

आयादय आर्धधातुके वा // लसक_४७१ = पा_३,१.३१ //
आर्धधातुकविवक्षायामायादयो वा स्युः / (कास्यनेकाच आम् वक्तव्यः) / लिटि आस्कासोराम्विधानान्मस्य नेत्त्वम् //

अतो लोपः // लसक_४७२ = पा_६,४.४८ //
आर्धधातुकोपदेशे यददन्तं तस्यातो लोप आर्धधातुके //

आमः // लसक_४७३ = पा_२,४.८१ //
आमः परस्य लुक् //

कृञ् चानुप्रयुज्यते लिटि // लसक_४७४ = पा_३,१.४० //
आमन्ताल्लिट्पराः कृभ्वस्तयो ऽनुप्रयुज्यन्ते / तेषां द्वित्वादि //

उरत् // लसक_४७५ = पा_७,४.६६ //
अभ्यासऋवर्णस्यात् प्रत्यये / रपरः / हलादिः शेषः / वृद्धिः / गोपायाञ्चकार / द्वित्वात्परत्वाद्यणि प्राप्ते ----- .

द्विर्वचने ऽचि // लसक_४७६ = पा_१,१.५९ //
द्वित्वनिमित्ते ऽचि अच आदेशो न द्वित्वे कर्तव्ये / गोपायाञ्चक्रतुः //

एकाच उपदेशे ऽनुदात्तात् // लसक_४७७ = पा_७,२.१० //
उपदेशे यो धातुरेकाजनुदात्तश्च तत आर्धधातुकस्येण्न /
&न्ब्स्प्॑ूदॄदन्तैर्यौतिरुक्ष्णुशीङ्स्नुनुक्षुश्विडीङ्श्रिभिः /
&न्ब्स्प्॑वृङ्वृञ्भ्यां च विनैकाचो ऽजन्तेषु निहताः स्मृताः //
कान्तेषु शक्लेकः / चान्तेषु पच्मुच्रिच्वच्विच्सिचः षट् / छान्तेषु प्रच्छेकः / जान्तेषु त्यज्निजिर्भज्भञ्ज्भुज्भ्रस्ज्मस्ज्यज्युज्रुज् रञ्ज्विजिर्स्वञ्ज्सञ्ज्सृजः पञ्चदश // दान्तेषु अद्क्षुद्खिद्छिद्तुद् नुद्पद्यभिद्विद्यतिविनद्विन्द्शद्सद्स्विद्यस्कन्धदः षोडश / धान्तेषु क्रुध्क्षुध्बुध्यबन्ध्युध्रुध्राध्व्यध्साध्शुध्सिध्या एकादश / नान्तेषु मन्यहनी द्वौ / पान्तेषु आप्छुप्क्षिप्तप्तिप्तृप्यदृप्यलिपलुप्वप्शप्स्वप् सृपस्त्रयोदश / भान्तेषु यभ्रभ्लभस्त्रयः / मान्तेषु गम्यम्नम्रमश्चत्वारः / शान्तेषु क्रश्दंश्दिश्दृश्मृश्रिश्रुश्लिश्विश्स्पृशो दश / षान्तेषु कृष् त्विष्तुष्द्विष्पुष्यपिष्विष्शिष्शुष्श्लिष्या एकादश // सान्तेषु घस्वसती द्वौ / हान्तेषु दह्दिह्दुह्नह्मिह्रुह्लिह्वहो ऽष्टौ /
&न्ब्स्प्॑नुदात्ता हलन्तेषु धातवस्त्र्यधिकं शतम् /
गोपायाञ्चकर्थ / गोपायाञ्चक्रथुः / गोपायाञ्चक्र / गोपायाञ्चकार / गोपायाञ्चकर / गोपायाञ्चकृव / गोपायाञ्चकृम / गोपायाम्बभूव, गोपायामास / जुगोप / जुगुपतुः / जुगुपुः //

स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा // लसक_४७८ = पा_७,२.४४ //
स्वरत्यादेरूदितश्च परस्य वलादेरार्धधातुकस्येड् वा स्यात् / जुगोपिथ, जुगोप्थ / गोपायिता, गोपिता, गोप्ता / गोपायिष्यति, गोपिष्यति, गोप्स्यति / गोपायतु / अगोपायत् / गोपायेत् / गोपाय्यात्, गुप्यात् / अगोपायीत् //

नेटि // लसक_४७९ = पा_७,२.४ //
इडादौ सिचि हलन्तस्य वृद्धिर्न / अगोपीत्, अगौप्सीत् //

झलो झलि // लसक_४८० = पा_८,२.२६ //
झलः परस्य सस्य लोपो झलि / अगौप्ताम् / अगौप्सुः / अगौप्सीः / अगौप्तम् / अगौप्त / अगौप्सम् / अगौप्स्व / अगौप्स्म / अगोपायिष्यत्, अगोपिष्यत्, अगोप्स्यत् // क्षि क्षये // १३ // क्षयति / चिक्षाय / चिक्षियतुः / चिक्षियुः / एकाच इति निषेधे प्राप्ते -- .

कृसृभृवृस्तुद्रुस्रुश्रुवो लिटि // लसक_४८१ = पा_७,२.१३ //
क्रादिभ्य एव लिट इण्न स्यादन्यस्मादनिटो ऽपि स्यात् //

अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम् // लसक_४८२ = पा_७,२.६१ //
उपदेशे ऽजन्तो यो धातुस्तासौ नित्यानिट् ततस्थल इण्न //

उपदेशे ऽत्वतः // लसक_४८३ = पा_७,२.६२ //
उपदेशे ऽकारवतस्तासौ नित्यानिटः परस्य थल इण्न स्यात् //

ऋतो भारद्वाजस्य // लसक_४८४ = पा_७,२.६३ //
तासौ नित्यानिट ऋदन्तादेव थलो नेट् भारद्वाजस्य मते / तेन अन्यस्य स्यादेव / अयमत्र संग्रहः --- &न्ब्स्प्॑जन्तो ऽकारवान्वा यस्तास्यनिट्थलि वेडयम् /
&न्ब्स्प्॑ृदन्त ईदृङ्नित्यानिट् क्राद्यन्यो लिटि सेड्भवेत् //
चिक्षयिथ, चिक्षेथ / चिक्षियथुः / चिक्षिय / चिक्षाय, चिक्षय / चिक्षियिव / चिक्षियिम / क्षेता / क्षेष्यति / क्षयतु / अक्षयत् / क्षयेत् //

अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः // लसक_४८५ = पा_७,४.२५ //
अजन्ताङ्गस्य दीर्घो यादौ प्रत्यये न तु कृत्सार्वधातुकयोः / क्षीयात् //

सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु // लसक_४८६ = पा_७,२.१ //
इगन्ताङ्गस्य वृद्धिः स्यात् परस्मैपदे सिचि / अक्षैषीत् / अक्षेष्यत् // तप सन्तापे // १४ // तपति / तताप / तेपतुः / तेपुः / तेपिथ, ततप्थ / तेपिव / तेपिम / तप्ता / तप्स्यति / तपतु / अतपत् / तपेत् / तप्यात् / अताप्सीत् / अताप्ताम् / अतप्स्यत् // क्रमु पादविक्षेपे // १५ //

वा भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः // लसक_४८७ = पा_३,१.७० //
एभ्यः श्यन्वा कर्त्रर्थे सार्वधातुके परे / पक्षे शप् //

क्रमः परस्मैपदेषु // लसक_४८८ = पा_७,३.७६ //
क्रमो दीर्घः परस्मैपदे शिति / क्राम्यति, क्रामति / चक्राम / क्रमिता / क्रमिष्यति / क्राम्यतु, क्रामतु / अक्राम्यत्, अक्रामत् / क्राम्येत् / क्रामेत् / क्रम्यात् / अक्रमीत् / अक्रमिष्यत् // पा पाने // १६ //

पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्तिसर्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यर्च्छधौशीयसीदाः // लसक_४८९ = पा_७,३.७८ //
पादीनां पिबादयः स्युरित्संज्ञकशकारादौ प्रत्यये परे / पिबादेशो ऽदन्तस्तेन न गुणः / पिबति //

आत औ णलः // लसक_४९० = पा_७,१.३४ //
आदन्ताद्धातोर्णल औकारादेशः स्यात् / पपौ //

आतो लोप इटि च // लसक_४९१ = पा_६,४.६४ //
अजाद्योरार्धधातुकयोः क्ङिदिटोः परयोरातो लोपः / पपतुः / पपुः / पपिथ, पपाथ / पपथुः / पप / पपौ / पपिव / पपिम / पाता / पास्यति / पिबतु / अपिबत् / पिबेत् //

एर्लिङि // लसक_४९२ = पा_६,४.६७ //
घुसंज्ञकानां मास्थादीनां च एत्वं स्यादार्धधातुके किति लिङि / पेयात् / गातिस्थेति सिचो लुक् / अपात् / अपाताम् //

आतः // लसक_४९३ = पा_३,४.११० //
सिज्लुकि आदन्तादेव झेर्जुस् //

उस्यपदान्तात् // लसक_४९४ = पा_६,१.९६ //
अपदान्तादकारादुसि पररूपमेकादेशः / अपुः / अपास्यत् // ग्लै हर्षक्षये // १७ // ग्लायति //

आदेच उपदेशे ऽशिति // लसक_४९५ = पा_६,१.४५ //
उपदेशे एजन्तस्य धातोरात्वं न तु शिति / जग्लौ / ग्लाता / ग्लास्यति / ग्लायतु / अग्लायत् / ग्लायेत् //

वान्यस्य संयोगादेः // लसक_४९६ = पा_६,४.६८ //
घुमास्थादेरन्यस्य संयोगादेर्धातोरात एत्वं वार्धधातुके किति लिङि / ग्लेयात्, ग्लायात् //

यमरमनमातां सक् च // लसक_४९७ = पा_७,२.७३ //
एषां सक् स्यादेभ्यः सिच इट् स्यात्परस्मैपदेषु / अग्लासीत् / अग्लास्यत् // ह्वृ कौटिल्ये // १८ // ह्वरति //

ऋतश्च संयोगादेर्गुणः // लसक_४९८ = पा_७,४.१० //
ऋदन्तस्य संयोगादेरङ्गस्य गुणो लिटि / उपधाया वृद्धिः / जह्वार / जह्वरतुः / जह्वरुः / जह्वर्थ / जह्वरथुः / जह्वर / जह्वार, जह्वर / जह्वरिव / जह्वरिम / ह्वर्ता //

ऋद्धनोः स्ये // लसक_४९९ = पा_७,२.१० //
ऋतो हन्तेश्च स्यस्येट् / ह्वरिष्यति / ह्वरतु / अह्वरत् / ह्वरेत् //

गुणो ऽर्तिसंयोगाद्योः // लसक_५०० = पा_७,४.२९ //
अर्तेः संयोगादेरृदन्तस्य च गुणः स्याद्यकि यादावार्धधातुके लिङि च / ह्वर्यात् / अह्वार्षीत् / अह्वरिष्यत् // श्रु श्रवणे // १९ //

श्रुवः शृ च // लसक_५०१ = पा_६,१.७४ //
श्रुवः शृ इत्यादेशः स्यात् श्नुप्रत्ययश्च / शृणोति //

सार्वधातुकमपित् // लसक_५०२ = पा_१,२.४ //
अपित्सार्वधातुकं ङिद्वत् / शृणुतः //

हुश्नुवोः सार्वधातुके // लसक_५०३ = पा_६,४.८७ //
हुश्नुवोरनेकाचो ऽसंयोगपूर्वस्योवर्णस्य यण् स्यादचि सार्वधातुके / शृण्वन्ति / शृणोषि / शृणुथः / शृणुथ / शृणोमि //

लोपश्चास्यान्यतरस्यां म्वोः // लसक_५०४ = पा_६,४.१०७ //
असंयोगपूर्वस्य प्रत्ययोकारस्य लोपो वा म्वोः परयोः / शृण्वः, शृणुवः / शृण्मः, शृणुमः / शुश्राव / शुश्रुवतुः / शुश्रुवुः / शुश्रोथ / शुश्रुवथुः / शुश्रुव / शुश्राव, शुश्रव / शुश्रुव / शुश्रुम / श्रोता / श्रोष्यति / शृणोतु, शृणुतात् / शृणुताम् / शृण्वन्तु //

उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् // लसक_५०५ = पा_६,४.१०६ //
असंयोगपूर्वात्प्रत्ययोतो हेर्लुक् / शृणु, शृणुतात् / शृणुतम् / शृणुत / गुणावादेशौ / शृणवानि / शृणवाव / शृणवाम / अशृणोत् / अशृणुताम् / अशृण्वन् / अशृणोः / अशृणुतम् / अशृणुत / अशृणवम् / अशृण्व, अशृणुव / अशृण्म, अशृणुम / शृणुयात् / शृणुयाताम् / शृणुयुः / शृणुयाः / शृणुयातम् / शृणुयात / शृणुयाम् / शृणुयाव / शृणुयाम / श्रूयात् / अश्रौषीत् / अश्रोष्यत् // गमॢ गतौ // २० //

इषुगमियमां छः // लसक_५०६ = पा_७,३.७७ //
एषां छः स्यात् शिति / गच्छति / जगाम //

गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि // लसक_५०७ = पा_६,४.९८ //
एषामुपधाया लोपो ऽजादौ क्ङिति न त्वङि / जग्मतुः / जग्मुः / जगमिथ, जगन्थ / जग्मथुः / जग्म / जगाम, जगम / जग्मिव / जग्मिम / गन्ता //

गमेरिट् परस्मैपदेषु // लसक_५०८ = पा_७,२.५८ //
गमेः परस्य सादेरार्धधातुकस्येट् स्यात् परस्मैपदेषु / गमिष्यति / गच्छतु / अगच्छत् / गच्छेत् / गम्यात् //

पुषादिद्युताद्यॢदितः परस्मैपदेषु // लसक_५०९ = पा_३,१.५५ //
श्यन्विकरणपुषादेर्द्युतादेरॢदितश्च च्लेरङ् परस्मैपदेषु / अगमत् / अगमिष्यत् //
इति परस्मैपदिनः /
एध वृद्धौ // १ //

टित आत्मनपदानां टेरे // लसक_५१० = पा_३,४.७९ //
टितो लस्यात्मनेपदानां टेरेत्वम् / एधते //

आतो ङितः // लसक_५११ = पा_७,२.८१ //
अतः परस्य ङितामाकारस्य इय् स्यात् / एधेते / एधन्ते //

थासः से // लसक_५१२ = पा_३,४.८० //
टितो लस्य थासः से स्यात् / एधसे / एधेथे / एधध्वे / अतो गुणे / एधे / एधावहे / एधामहे //

इजादेश्च गुरुमतो ऽनृच्छः // लसक_५१३ = पा_३,१.३६ //
इजादिर्यो धातुर्गुरुमानृच्छत्यन्यस्तत आम् स्याल्लिटि //

आम्प्रत्ययवत्कृञो ऽनुप्रयोगस्य // लसक_५१४ = पा_१,३.६३ //
आम्प्रत्ययो यस्मादित्यतद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः / आम्प्रकृत्या तुल्यमनुप्रयुज्यमानात् कृञो ऽप्यात्मनेपदम् //

लिटस्तझयोरेशिरेच् // लसक_५१५ = पा_३,४.८१ //
लिडादेशयोस्तझयोरेश् इरेजेतौ स्तः / एधाञ्चक्रे / एधाञ्चक्राते / एधाञ्चक्रिरे / एधाञ्चकृषे / एधाञ्चक्राथे //

इणः षीध्वंलुङ्लिटां धो ऽङ्गात् // लसक_५१६ = पा_८,३.७८ //
इणन्तादङ्गात्परेषां षीध्वंलुङ्लिटां धस्य ढः स्यात् // एधाञ्चकृढ्वे / एधाञ्चक्रे / एधाञ्चकृवहे / एधाञ्चकृमहे / एधाम्बभूव / एधामास / एधिता / एधितारौ / एधितारः / एधितासे / एधितासाथे //

धि च // लसक_५१७ = पा_८,२.२५ //
धादौ प्रत्यये परे सस्य लोपः / एधिताध्वे //

ह एति // लसक_५१८ = पा_७,४.२५ //
तासस्त्योः सस्य हः स्यादेति परे / एधिताहे / एधितास्वहे / एधितास्महे / एधिष्यते / एधिष्येते / एधिष्यन्ते / एधिष्यसे / एधिष्येथे / एधिष्यध्वे / एधिष्ये / एधिष्यावहे / एधिष्यामहे //

आमेतः // लसक_५१९ = पा_३,४.९० //
लोट एकारस्याम् स्यात् / एधताम् / एधेताम् / एधन्ताम् //

सवाभ्यां वामौ // लसक_५२० = पा_३,४.९१ //
सवाभ्याम् परस्य लोडेतः क्रमाद्वामौ स्तः / एधस्व / एधेथाम् / एधध्वम् //

एत ऐ // लसक_५२१ = पा_३,४.९३ //
लोडुत्तमस्य एत ऐ स्यात् / एधै / एधावहै / एधामहै // आटश्च / ऐधत / ऐधेताम् / ऐधन्त / ऐधथाः / ऐधेथाम् / ऐधध्वम् / ऐधे / ऐधावहि / ऐधामहि //

लिडः सीयुट् // लसक_५२२ = पा_३,४.१०२ //
सलोपः / एधेत / एधेयाताम् //

झस्य रन् // लसक_५२३ = पा_३,४.१०५ //
लिङो झस्य रन् स्यात् / एधेरन् / एधेथाः / एधेयाथाम् / एधेध्वम् //

इटो ऽत् // लसक_५२४ = पा_३,४.१०६ //
लिङादेशस्य इटो ऽत्स्यात् / एधेय / एधेवहि / एधेमहि //

सुट् तिथोः // लसक_५२५ = पा_३,४.१०७ //
लिङस्तथोः सुट् / यलोपः / आर्धधातुकत्वात्सलोपो न / एधिषीष्ट / एधिषीयास्ताम् / एधिषीरन् / एधिषीष्ठाः / एधिषीयास्थाम् / एधिषीध्वम् / एधिषीय / एधिषीवहि / एधिषीमहि / ऐधिष्ट / ऐधिषाताम् //

आत्मनेपदेष्वनतः // लसक_५२६ = पा_७,१.५ //
अनकारात्परस्यात्मनेपदेषु झस्य अदित्यादेशः स्यात् / ऐधिषत / ऐधिष्ठाः / ऐधिषाथाम् / ऐधिढ्वम् / ऐधिषि / ऐधिष्वहि / ऐधिष्महि / ऐधिष्यत / ऐधिष्येताम् / ऐधिष्यन्त / ऐधिष्यथाः / ऐधिष्येथाम् / ऐधिष्यध्वम् / ऐधिष्ये / ऐधिष्यावहि / ऐधिष्यामहि // कमु कान्तौ // २ //

क्रमेर्णिङ् // लसक_५२७ = पा_३,१.३० //
स्वार्थे / ङित्त्वात्तङ् / कामयते //

अयामन्ताल्वाय्येत्न्विष्णुषु // लसक_५२८ = पा_६,४.५५ //
आम् अन्त आलु आय्य इत्नु इष्णु एषु णेरयादेशः स्यात् / कामायाञ्चक्रे / आयादय इति णिङ् वा / चकमे / चकमाते / चकमिरे / चकमिषे / चकमाथे / चकमिध्वे / चकमे / चकमिवहे / चकमिमहे / कामयिता / कामयितासे / कमिता / कामयिष्यते, कमिष्यते / कामयताम् / अकामयत / कामयेत / कामयिषीष्ट //

विभाषेटः // लसक_५२९ = पा_८,३.७९ //
इणः परो य इट् ततः परेषां षीध्वंलुङ्लिटां धस्य वा ढः / कामयिषीढ्वम्, कामयिषीध्वम् / कमिषीष्ट / कमिषीध्वम् //

णिश्रिद्रुश्रुभ्यः कर्तरि चङ् // लसक_५३० = पा_३,१.४८ //
ण्यन्तात् श्र्यादिभ्यश्च च्लेश्चङ् स्यात् कर्त्रर्थे लुङि परे / अकामि अ त इति स्थिते -- .

णेरनिटि // लसक_५३१ = पा_६,४.५१ //
अनिडादावार्धधातुके परे णेर्लोपः स्यात् /

णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः // लसक_५३२ = पा_७,४.१ //
चङ्परे णौ यदङ्गं तस्योपधाया ह्रस्वः स्यात् //

चङि // लसक_५३३ = पा_६,१.११ //
चङि परे अनभ्यासस्य धात्ववयवस्यैकाचः प्रथमस्य द्वे स्तो ऽजादेर्द्वितीयस्य //

सन्वल्लघुनि चङ्परे ऽनग्लोपे // लसक_५३४ = पा_७,४.९३ //
चङ्परे णौ यदङ्गं तस्य यो ऽभ्यासो लघुपरः, तस्य सनीव कार्यं स्याण्णावग्लोपे ऽसति //

सन्यतः // लसक_५३५ = पा_७,४.७९ //
अभ्यासस्यात इत् स्यात् सनि //

दीर्घो लघोः // लसक_५३६ = पा_७,४.९४ //
लघोरभ्यासस्य दीर्घः स्यात् सन्वद्भावविषये / अचीकमत, णिङ्भावपक्षे -- (कमेश्च्लेश्चङ् वाच्यः) / अचकमत / अकामयिष्यत, अकमिष्यत // अय गतौ // ३ // अयते //

उपसर्गस्यायतौ // लसक_५३७ = पा_८,२.१९ //
अयतिपरस्योपसर्गस्य यो रेफस्तस्य लत्वं स्यात् / प्लायते / पलायते //

दयायासश्च // लसक_५३८ = पा_३,१.३७ //
दय् अय् आस् एभ्य आम् स्याल्लिटि / अयाञ्चक्रे / अयिता / अयिष्यते / अयताम् / आयत / अयेत / अयिषीष्ट / विभाषेटः / अयिषीढ्वम्, अयिषीध्वम् / आयिष्ट / आयिढ्वम्, आयिध्वम् / आयिष्यत // द्युत दीप्तौ // ४ // द्योतते //

द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणम् // लसक_५३९ = पा_७,४.६७ //
अनयोरभ्यासस्य सम्प्रसारणं स्यात् / दिद्युते //

द्युद्भ्यो लुङि // लसक_५४० = पा_१,३.९१ //
द्युतादिभ्यो लुङः परस्मैपदं वा स्यात् / पुषादीत्यङ् / अद्युतत्, अद्योतिष्ट / अद्योतिष्यत // एवं श्विता वर्णे // ५ // ञिमिदा स्नेहने // ६ // ञिष्विदा स्नेहनमोचनयोः // ७ // मोहनयोरित्येके / ञिक्ष्विदा चेत्येके // रुच दीप्तावभिप्रीतौ च // ८ // घुट परिवर्तने // ९ // शुभ दीप्तौ // १० // क्षुभ संचलने // ११ // णभ तुभ हिंसायाम् // १२-१३ // स्रंसु भ्रंसु ध्वंसु अवस्रंसने // १४-१५-१६ // ध्वंसु गतौ च // स्रम्भु विश्वासे // १७ // वृतु वर्तने // १८ // वर्तते / ववृते / वर्तिता //

वृद्भ्यः स्यसनोः // लसक_५४१ = पा_१,४.९२ //
वृतादिभ्यः पञ्चभ्यो वा परस्मैपदं स्यात्स्ये सनि च //

न वृद्भ्यश्चतुर्भ्यः // लसक_५४२ = पा_७,२.५९ //
वृतुवृधुशृधुस्यन्दूभ्यः सकारादेरार्धधातुकस्येण् न स्यात् तङानयोरभावे / वर्त्स्यति, वर्तिष्यते / वर्तताम् / अवर्तत / वर्तेत / वर्तिषीष्ट / अवर्तिष्ट / अवर्त्स्यत्, अवर्तिष्यत् // दद दाने // १९ // ददते //

न शसददवादिगुणानाम् // लसक_५४३ = पा_६,४.१२६ //
शसेर्ददेर्वकारादीनां गुणशब्देन विहितो यो ऽकारस्तस्य एत्त्वाभ्यासलोपौ न / दददे / दददाते / दददिरे / ददिता / ददिष्यते / ददताम् / अददत / ददेत / ददिषीष्ट / अददिष्ट / अददिष्यत // त्रपूष् लज्जायाम् // २० // त्रपते //

तॄफलभजत्रपश्च // लसक_५४४ = पा_६,४.१२२ //
एषामत एत्त्वमभ्यासलोपश्च स्यात् किति लिटि सेटि थलि च / त्रेपे / त्रपिता, त्रप्ता / त्रपिष्यते, त्रप्स्यते / त्रपताम् / अत्रपत / त्रपेत / त्रपिषीष्ट, त्रप्सीष्ट / अत्रपिष्ट, अत्रप्त / अत्रपिष्यत, अत्रप्स्यत //
इत्यात्मनेपदिनः//
श्रिञ् सेवायाम् // १ // श्रयति, श्रयते / शिश्राय, शिश्रिये / श्रयितासि, श्रयितासे / श्रयिष्यति, श्रयिष्यते / श्रयतु, श्रयताम् / अश्रयत्, अश्रयत / श्रयेत्, श्रयेत / श्रीयात्, श्रयिषीष्ट / चङ् / अशिश्रियत्, अशिश्रियत / अश्रयिष्यत्, अश्रयिष्यत // भृञ् भरणे // २ // भरति, भरते / बभार / बभ्रतुः / बभ्रुः / बभर्थ / बभृव / बभृम / बभ्रे / बभृषे / भर्तासि, भर्तासे / भरिष्यति, भरिष्यते / भरतु, भरताम् / अभरत्, अभरत / भरेत्, भरेत //

रिङ् शयग्लिङ्क्षु // लसक_५४५ = पा_७,४.२८ //
शे यकि यादावार्धधातुके लिङि च ऋतो रिङ् आदेशः स्यात् / रीङि प्रकृते रिङ्विधानसामर्थ्याद्दीर्घो न / भ्रियात् //

उश्च // लसक_५४६ = पा_१,२.१२ //
ऋवर्णात्परौ झलादी लिङ्सिचौ कितौ स्तस्तङि / भृषीष्ट / भृषीयास्ताम् / अभार्षीत् //

ह्रस्वादङ्गात् // लसक_५४७ = पा_८,२.२७ //
सिचो लोपो झलि / अभृत / अभृषाताम् / अभरिष्यत्, अभरिष्यत // हृञ् हरणे // ३ // हरति, हरते / जहार / जहर्थ / जह्रिव / जह्रिम / जह्रे / जह्रिषे / हर्तासि, हर्तासे / हरिष्यति, हरिष्यते / हरतु, हरताम् / अहरत्, अहरत / हरेत्, हरेत / ह्रियात्, हृषीष्ट / हृषीयास्ताम् / अहार्षीत्, अहृत / अहरिष्यत्, अहरिष्यत // धृञ् धारणे // ४ // धरति, धरते // णीञ् प्रापणे // ५ // नयति, नयते // डुपचष् पाके // ६ // पचति, पचते / पपाच / पेचिथ, पपक्थ / पेचे / पक्तासि, पक्तासे // भज सेवायाम् // ७ // भजति, भजते / बभाज, भेजे / भक्तासि, भक्तासे / भक्ष्यति, भक्ष्यते / अभाक्षीत्, अभक्त / अभक्षाताम् //
यज देवपूजा सङ्गतिकरणदानेषु // ८ // यजति, यजते //

लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् // लसक_५४८ = पा_६,१.१७ //
वच्यादीनां ग्रह्यादीनां चाभ्यासस्य सम्प्रसारणं लिटि / इयाज //

वचिस्वपियजादीनां किति // लसक_५४९ = पा_६,१.१५ //
वचिस्वप्योर्यजादीनां च संप्रसारणं स्यात् किति / ईजतुः / ईजुः / इयजिथ, इयष्ठ / ईजे / यष्टा //

षढोः कः सि // लसक_५५० = पा_८,२.४१ //
यक्ष्यति, यक्ष्यते / इज्यात्, यक्षीष्ट / अयाक्षीत्, अयष्ट // वह्अ प्रापणे // ९ // वहति, वहते / उवाह / ऊहतुः / ऊहुः / उवहिथ //

झषस्ताथोर्धो ऽधः // लसक_५५१ = पा_८,२.४० //
झषः परस्योस्तथोर्धः स्यान्न तु दधातेः //

ढो ढे लोपः // लसक_५५२ = पा_८,३.१३ //

सहिवहोरोदवर्णस्य // लसक_५५३ = पा_६,३.११२ //
अनयोरवर्णस्य ओत्स्याड्ढलोपे / उवोढ / ऊहे / वोढा / वक्ष्यति / अवाक्षीत् / अवोढाम् / अवाक्षुः / अवाक्षीः / अवोढम् / अवोढ / अवाक्षम् / अवाक्ष्व / अवाक्ष्म / अवोढ / अवक्षाताम् / अवक्षत / अवोढाः / अवक्षाथाम् / अवोढ्वम् / अवक्षि / अवक्ष्वहि / अवक्ष्महि //

इति भ्वादयः // १ //

अथादादयः

अद भक्षणे // १ //

अदिप्रभृतिभ्यः शपः // लसक_५५४ = पा_२,४.७२ //
लुक् स्यात् / अत्ति / अत्तः / अदन्ति / अत्सि / अत्थः / अत्थ / अद्मि / अद्वः / अद्मः /

लिट्यन्यतरस्याम् // लसक_५५५ = पा_२,४.४० //
अदो घसॢ वा स्याल्लिटि / जघास / उपधालोपः //

शासिवसिघसीनां च // लसक_५५६ = पा_८,३.६० //
इण्कुभ्यां परस्यैषां सस्य षः स्यात् / घस्य चर्त्वम् // जक्षतुः / जक्षुः / जघसिथ / जक्षथुः / जक्ष / जघास, जघस / जक्षिव / जक्षिम / आद / आदतुः / आदुः //

इडत्त्यर्तिव्ययतीनाम् // लसक_५५७ = पा_७,२.६६ //
अद् ऋ व्येञ् एभ्यस्थलो नित्यमिट् स्यात् / आदिथ / अत्ता / अत्स्यति / अत्तु / अत्तात् / अत्ताम् / अदन्तु //

हुझल्भ्यो हेर्धिः // लसक_५५८ = पा_६,४.१०१ //
होर्झलन्तेभ्यश्च हेर्धिः स्यात् / अद्धि / अत्तात् / अत्तम् / अत्त / अदानि / अदाव / अदाम //

अदः सर्वेषाम् // लसक_५५९ = पा_७,३.१०० //
अदः परस्यापृक्तसार्वधातुकस्य अट् स्यात्सर्वमतेन / आदत् / आत्ताम् / आदन् / आदः / आत्तम् / आत्त / आदम् / आद्व / आद्म / अद्यात् / अद्याताम् / अद्युः / अद्यात् / अद्यास्ताम् / अद्यासुः //

लुङ्सनोर्घसॢ // लसक_५६० = पा_२,४.३७ //
अदो घसॢ स्याल्लुङि सनि च / ऌदित्वादङ् / अघसत् / आत्स्यत् // हन हिंसागत्योः // २ // हन्ति //

अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि क्ङिति // लसक_५६१ = पा_६,४.३७ //
अनुनासिकान्तानामेषां वनतेश्च लोपः स्याज्झलादौ किति ङिति परे / यमिरमिनमिगमिहनिमन्यतयो ऽनुदात्तोपदेशाः / तनु क्षणु क्षिणु ऋणु तृणु घृणु वनु मनु तनोत्यादयः / हतः / घ्नन्ति / हंसि / हथः / हथ / हन्मि / हन्वः / हन्मः / जघान / जघ्नतुः / जघ्नुः //

अभ्यासाच्च // लसक_५६२ = पा_७,३.५५ //
अभ्यासात्परस्य हन्तेर्हस्य कुत्वं स्यात् / जघनिथ, जघन्थ / जघ्नथुः / जघ्न / जघ्निव / जघ्निम / हन्ता / हनिष्यति / हन्तु, हतात् / हताम् / घ्नन्तु //

हन्तेर्जः // लसक_५६३ = पा_६,४.३६ //
हौ परे //

असिद्धवदत्राभात् // लसक_५६४ = पा_६,४.२२ //
इत उर्ध्वमापादसमाप्तेराभीयम्, समानाश्रये तस्मिन्कर्तव्ये तदसिद्धम् / इति जस्यासिद्धत्वान्न हेर्लुक् / जहि, हतात् / हतम् / हत / हनानि / हनाव / हनाम / अहन् / अहताम् / अघ्नन् / अहन् / अहतम् / अहत / अहनम् / अहन्व / अहन्म / हन्यात् / हन्याताम् / हन्युः //

आर्धधातुके // लसक_५६५ = पा_२,४.३५ //
इत्यधिकृत्य //

हनो वध लिङि // लसक_५६६ = पा_२,४.४१ //

लुङि च // लसक_५६७ = पा_२,४,४३ //
वधादेशो ऽदन्तः / अर्धधातुके इति विषयसप्तमी, तेन आर्धधातुकोपदेशे अकारान्तत्वादतो लोपः / वध्यात् / वध्यास्ताम् / आदेशस्यानेकाच्त्वादेकाच इतीण्निषेधाभावादिट् / ऽतो हलादेः&८२१७॑ इति वृद्धौ प्राप्तायाम् ---- .

अचः परस्मिन् पूर्वविधौ // लसक_५६८ = पा_१,१.५७ //
परनिमित्तो ऽजादेशः स्थानिवत्, स्थानिभूतादचः पूर्वत्वेन दृष्टस्य विधौ कर्तव्ये / इत्यल्लोपस्य स्थानिवत्त्वान्न वृद्धिः / अवधीत् / अहनिष्यत् // यु मिश्राणामिश्रणयोः // ३ //

उतो वृद्धिर्लुकि हलि // लसक_५६९ = पा_७,३.८९ //
लुग्विषये उतो वृद्धिः पिति हलादौ सार्वधातुके नत्वभ्यस्तस्य / यौति / युतः / युवन्ति / यौषि / युथः / युथ / यौमि / युवः / युमः / युयाव / यविता / यविष्यति / यौतु, युतात् / अयौत् / अयुताम् / अयुवन् / युयात् / इह उतो वृद्धिर्न, भाष्ये - ऽपिच्च ङिन्न ङिच्च पिन्न&८२१७॑ इति व्याख्यानात् / युयाताम् / युयुः / यूयात् / यूयास्ताम् / यूयासुः / अयावीत् / अयविष्यत् // या प्रापणे // ४ // याति / यातः / यान्ति / ययौ / याता / यास्यति / यातु / अयात् / अयाताम् //

लङः शाकटायनस्यैव // लसक_५७० = पा_३,४.१११ //
आदन्तात्परस्य लङो झेर्जुस् वा स्यात् / अयुः, अयान् / यायात् / यायाताम् / यायुः / यायात् / यायास्ताम् / यायासुः / अयासीत् / अयास्यत् / वा गतिगन्धनयोः // ५ // भा दीप्तौ // ६ // ष्णा शौचे // ७ // श्रा पाके // ८ // द्रा कुत्सायां गतौ // ९ // प्सा भक्षणे // १० // रा दाने // ११ // ला आदाने // १२ // दाप् लवने // १३ // पा रक्षणे // १४ // ख्या प्रकथने // १५ // अयं सार्वधातुके एव प्रयोक्तव्यः // विद ज्ञाने // १६ //

विदो लटो वा // लसक_५७१ = पा_३,४.८३ //
वेत्तेर्लटः परस्मैपदानां णलादयो वा स्युः / वेद / विदतुः / विदुः / वेत्थ / विदथुः / विद / वेद / विद्व / विद्म / पक्षे -- वेत्ति / वित्तः / विदन्ति //

उषविदजागृभ्यो ऽन्यतरस्याम् // लसक_५७२ = पा_३,१.३८ //
एभ्यो लिटि आम्वा स्यात् / विदेरन्तत्वप्रतिज्ञानादामि न गुणः / विदाञ्चकार, विवेद / वेदिता / वेदिष्यति //

विदाङ्कुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम् // लसक_५७३ = पा_३,१.४१ //
वेत्तेर्लोटि आम् गुणाभावो लोटो लुक् लोडन्तकरोत्यनुप्रयोगश्च वा निपात्यते पुरुषवचने न विवक्षिते //

तनादिकृञ्भ्य उः // लसक_५७४ = पा_३,१.७९ //
तनादेः कृञश्च उः प्रत्ययः स्यात् / शपो ऽपवादः / गुणौ / विदाङ्करोतु //

अत उत्सार्वधातुके // लसक_५७५ = पा_६,४.११० //
उत्प्रत्ययान्तस्य कृञो ऽत उत्सार्वधातुके क्ङिति / विदाङ्कुरुतात् / विदाङ्कुरुताम् / विदाङ्कुर्वन्तु / विदाङ्कुरु / विदाङ्करवाणि / अवेत् / अवित्ताम् / अविदुः //

दश्च // लसक_५७६ = पा_८,२.७५ //
धातोर्दस्य पदान्तस्य सिपि रुर्वा / अवेः, अवेत् / विद्यात् / विद्याताम् / विद्युः / विद्यात् / विद्यास्ताम् / अवेदीत् / अवेदिष्यत् // अस् भुवि // १७ // अस्ति //

श्नसोरल्लोपः // लसक_५७७ = पा_६,४.१११ //
श्नस्यास्तेश्चातो लोपः सार्वधातुके क्ङिति / स्तः / सन्ति / असि / स्थः / स्थ / अस्मि / स्वः / स्मः /

उपसर्गप्रादुर्भ्यामस्तिर्यच्परः // लसक_५७८ = पा_८,३.८७ //
उपसर्गेणः प्रादुसश्चास्तेः सस्य षो यकारे ऽचि च परे / निष्यात् / प्रनिषन्ति, प्रादुः षन्ति / यच्परः किम् ? / अभिस्तः //

अस्तेर्भूः // लसक_५७९ = पा_२,४.५२ //
आर्धधातुके / बभूव / भविता / भविष्यति / अस्तु, स्तात् / स्ताम् / सन्तु //

घ्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च // लसक_५८० = पा_६,४.११९ //
घोरस्तेश्च एत्त्वं स्याद्धौ परे अभ्यासलोपश्च / एत्त्वस्यासिद्धत्वाद्धेर्धिः / श्नसोरित्यल्लोपः / तातङ्पक्षे एत्त्वं न, परेण तातङा बाधात् / एधि, स्तात् / स्तम् / स्त / असानि / असाव / असाम / आसीत् / आस्ताम् / आसन् / स्यात् / स्याताम् / स्युः / भूयात् / अभूत् / अभविष्यत् // इण् गतौ // १८ // एति / इतः //

इणो यण् // लसक_५८१ = पा_६,४.८१ //
अजादौ प्रत्यये परे / यन्ति //

अभ्यासस्यासवर्णे // लसक_५८२ = पा_६,४.७८ //
अभ्यासस्य इवर्णोवर्णयोरियङुवङौ स्तो ऽसवर्णे ऽचि / इयाय //

दीर्घ इणः किति // लसक_५८३ = पा_७,४.६९ //
&न्ब्स्प्॑िणो ऽभ्यासस्य दीर्घः स्यात् किति लिटि / ईयतुः / ईयुः / इययिथ, इयेथ / एता / एष्यति / एतु / ऐत् / ऐताम् / आयन् / इयात् //
एतेर्लिङि // लसक_५८४ = पा_७,४.२४ //
उपसर्गात्परस्य इणो ऽणो ह्रस्व आर्धधातुके किति लिङि / निरियात् / उभयत आश्रयणे नान्तादिवत् / अभीयात् / अणः किम् ? समेयात् //

इणो गा लुङि // लसक_५८५ = पा_२,४.४५ //
गातिस्थेति सिचो लुक् / अगात् / ऐष्यत् // शीङ् स्वप्ने // १९ //

शीडः सार्वधातुके गुणः // लसक_५८६ = पा_७,४.२१ //
क्क्ङिति चेत्यस्यापवादः / शेते / शयाते //

शीङो रुट् // लसक_५८७ = पा_७,१.६ //
शीडः परस्य झादेशस्यातो रुडागमः स्यात् / शेरते / शेषे / शयाथे / शेध्वे / शये / शेवहे / शेमहे / शिश्ये / शिश्याते / शिश्यिरे / शयिता / शयिष्यते / शेताम् / शयाताम् / अशेत / अशयाताम् / अशेरत / शयीत / शयीयाताम् / शयीरन् / शयिषीष्ट / अशयिष्ट / अशयिष्यत // इङ् अध्ययने // २० // इङिकावध्युपसर्गतो न व्यभिचारतः / अधीते / अधीयाते / अधीयते //

गाङ् लिटि // लसक_५८८ = पा_२,४.४९ //
इङो गाङ् स्याल्लिटि / अधिजगे / अधिजगाते / अधिजगिरे / अध्येता / अध्येष्यते / अधीताम् / अधीयाताम् / अधीयताम् / अधीष्व / अधीयाथाम् / अधीध्वम् / अध्ययै / अध्ययावहै / अध्ययामहै / अध्यैत / अध्यैयाताम् / अध्यैयत / अध्यैथाः / अध्यैयाथाम् / अध्यैध्वम् / अध्यैयि / अध्यैवहि / अध्यैमहि / अधीयीत / अधीयीयाताम् / अधीयीरन् / अध्येषीष्ट //

विभाषा लुङॢङोः // लसक_५८९ = पा_२,४.५० //
इङो गाङ् वा स्यात् //

गाङ्कुटादिभ्यो ऽञ्णिन्ङित् // लसक_५९० = पा_१,२.१ //
गाङादेशात्कृटादिभ्यश्च परे ऽञ्णितः प्रत्यया ङितः स्युः //

धुमास्थागापाजहातिसां हलि // लसक_५९१ = पा_६,४.६६ //
एषामात ईत्स्याद्धलादौ क्ङित्यार्धधातुके / अध्यगीष्ट, अध्यैष्ट / अध्यगीष्यत, अध्यैष्यत // दुह प्रपूरणे // २१ // दोग्धि / दुग्धः / दुहन्ति / धोक्षि / दुग्धे / दुहाते / दुहते / धुक्षे / दुहाथे / धुग्ध्वे / दुहे / दुह्वहे / दुह्महे / दुदोह, दुदुहे / दोग्धासि, दोग्धासे / धोक्ष्यति, धोक्ष्यते / दोग्धु, दुग्धात् / दुग्धाम् / दुहन्तु / दुग्धि, दुग्धात् / दुग्धम् / दुग्ध / दोहानि / दोहाव / दोहाम / दुग्धाम् / दुहाताम् / दुहताम् / धुक्ष्व / दुहाथाम् / धुग्घ्वम् / दोहै / दोहावहै / दोहामहै / अधोक् / अदुग्धाम् / अदुहन् / अदोहम् / अदुग्ध / अदुहाताम् / अदुहत / अधुग्ध्वम् / दुह्यात्, दुहीत //

लिङ्सिचावात्मनेपदेषु // लसक_५९२ = पा_१,२.११ //
इक्समीपाद्धलः परौ झलादी लिङ्सिचौ कितौ स्तस्तङि / धुक्षीष्ट //

शल इगुपधादनिटः क्सः // लसक_५९३ = पा_३,१.४५ //
इगुपधो यः शलन्तस्तस्मादनिटश्च्लेः क्सादेशः स्यात् / अधुक्षत् //

लुग्वा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदे दन्त्ये // लसक_५९४ = पा_७,३.७३ //
एषां क्सस्य लुग्वा स्याद्दन्त्ये तङि / अदुग्ध, अधुक्षत //

क्सस्याचि // लसक_५९५ = पा_७,३.७२ //
&न्ब्स्प्॑जादौ तङि क्सस्य लोपः / अधुक्षाताम् / अधुक्षन्त / अदुग्धाः, अधुक्षथाः / अधुक्षाथाम् / अधुग्ध्वम्, अधुक्षध्वम् / अधुक्षि / अदुह्वहि, अधुक्षावहि / अधुक्षामहि / अधोक्ष्यत // एवं दिह उपचये // २२ // लिह आस्वादने // २३ // लेढि / लीढः / लिहन्ति / लेक्षि / लीढे / लिहाते / लिहते / लिक्षे / लिहाथे / लीढ्वे / लिलेह, लिलिहे / लेढासि, लेढासे / लेक्ष्यति, लेक्ष्यते / लेढु / लीढाम् / लिहन्तु / लीढि / लेहानि / लीढाम् / अलेट्, अलेड् / अलिक्षत्, अलीढ, अलिक्षत / अलेक्ष्यत्, अलेक्ष्यत // ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि // २४ //

ब्रुवः पञ्चानामादित आहो ब्रुवः // लसक_५९६ = पा_३,४.८४ //
ब्रुवो लटस्तिबादीनां पञ्चानां णलादयः पञ्च वा स्युर्ब्रुवश्चाहादेशः / आह / आहतुः / आहुः //

आहस्थः // लसक_५९७ = पा_८,२.३५ //
झलि परे / चर्त्वम् / आत्थ / आहथुः //

ब्रुव ईट् // लसक_५९८ = पा_७,३.९३ //
ब्रुवः परस्य हलादेः पित ईट् स्यात् / ब्रवीति / ब्रूतः / ब्रुवन्ति / ब्रूते / ब्रुवाते / ब्रुवते //

ब्रुवो वचिः // लसक_५९९ = पा_२,४.५३ //
आर्धधातुके / उवाच / ऊचतुः / ऊचुः / उवचिथ, उवक्थ / ऊचे / वक्तासि, वक्तासे / वक्ष्यति, वक्ष्यते / ब्रवीतु, ब्रूतात् / ब्रुवन्तु / ब्रूहि / ब्रवाणि / ब्रूताम् / ब्रवै / अब्रवीत्, अब्रूत / ब्रूयात्, ब्रुवीत / उच्यात्, वक्षीष्ट //

अस्यतिवक्तिख्यातिभ्यो ऽङ् // लसक_६०० = पा_३,१.५२ //
एभ्यश्चलेरङ् स्यात् //

वच उम् // लसक_६०१ = पा_७,४.२० //
अङि परे / अवोचत्, अवोचत / अवक्ष्यत्, अवक्ष्यत / (ग. सू.) चर्करीतं च / चर्करीतमिति यङ्लुगन्तस्य संज्ञा, तददादौ बोध्यम् // ऊर्णुञ् आच्छादने // २५ //

ऊर्णोतेर्विभाषा // लसक_६०२ = पा_७,३.९० //
वा वृद्धिः स्याद्धलादौ पिति सार्वधातुके / ऊर्णौति, ऊर्णोति / ऊर्णुतः / ऊर्णुवन्ति / ऊर्णुते / ऊर्णुवाते / ऊर्णुवते / (ऊर्णोतेराम्नेति वाच्यम्) //

न न्द्राः संयोगादयः // लसक_६०३ = पा_६,१.३ //
अचः पराः संयोगादयो नदरा द्विर्न भवन्ति / नुशब्दस्य द्वित्वम् / ऊर्णुनाव / ऊर्णुनुवतुः / ऊर्णुनुवुः //

विभाषोर्णोः // लसक_६०४ = पा_१,२.३ //
इडादिप्रत्ययो वा ङित्स्यात् / ऊर्णुनुविथ, ऊर्णुनविथ / ऊर्णुविता, ऊर्णविता / ऊर्णुविष्यति, ऊर्णविष्यति / ऊर्णौतु, ऊर्णोतु / ऊर्णवानि / ऊर्णवै //

गुणो ऽपृक्ते // लसक_६०५ = पा_७,३.९१ //
ऊर्णोतेर्गुणो ऽपृक्ते हलादौ पिति सार्वधातुके / वृद्ध्यपवादः / और्णोतु / और्णोः / ऊर्णुयात् / ऊर्णुयाः / ऊर्णुवीत / ऊर्णूयात् / ऊर्णुविषीष्ट, ऊर्णविषीष्ट //

ऊर्णोतेर्विभाषा // लसक_६०६ = पा_७,१.६ //
इडादौ सिचि वा वृद्धिः परस्मैपदे परे / पक्षे गुणः / और्णावीत्, और्णुवीत्, और्णवीत् / और्णाविष्टाम्, और्णुविष्टाम्, और्णविष्टाम् / और्णुविष्ट, और्णविष्ट / और्णुविष्यत्, और्णविष्यत् / और्णुविष्यत, और्णविष्यत //

इत्यदादयः // २ //

अथ जुहोत्यादयः

हु दानादनयोः // १ //

जुहोत्यादिभ्यः श्लुः // लसक_६०७ = पा_२,४.७५ //
शपः श्लुः स्यात् //

श्लौ // लसक_६०८ = पा_६,१.१० //
धातोर्द्वे स्तः / जुहोति / जुहुतः /

अदभ्यस्तात् // लसक_६०९ = पा_७,१.४ //
झस्यात्स्यात् / हुश्नुवोरिति यण् / जुह्वति //

भीह्रीभृहुवां श्लुवच्च // लसक_६१० = पा_३,१.३९ //
एभ्यो लिटि आम् वा स्यादामि श्लाविव कार्यं च / जुहवाञ्चकार, जुहाव / होता / होष्यति / जुहोतु, जुहुतात् / जुहुताम् / जुह्वतु / जुहुधि / जुहवानि / अजुहोत् / अजुहुताम् //

जुसि च // लसक_६११ = पा_७,३.८३ //
इगन्ताङ्गस्य गुणो ऽजादौ जुसि / अजुहवुः / जुहुयात् / हूयात् / अहौषीत् / अहोष्यत् // ञिभी भये // २ // बिभेति //

भियो ऽन्यतरस्याम् // लसक_६१२ = पा_६,४.११५ //
इकारो वा स्याद्धलादौ क्ङिति सार्वधातुके / बिभितः, बिभीतः / बिभ्यति / बिभयाञ्चकार, बिभाय / भेता / भेष्यति / बिभेतु, बिभितात्, बिभीतात् / अबिभेत् / बिभीयात् / भीयात् / अभैषीत् / अभेष्यत् // ह्री लज्जायाम् // ३ // जिह्रेति / जिह्रीतः / जिह्रियति / जिह्रयाञ्चकार, जिह्राय / ह्रेता / ह्रेष्यति / जिह्रेतु / अजिह्रेत् / जिह्रियात् / ह्रीयात् / अह्रैषीत् / अह्रेष्यत् // पॄ पालन पूरणयोः // ४ //

अर्तिपिपर्त्योश्च // लसक_६१३ = पा_७,४.७७ //
अभ्यासस्य इकारो ऽन्तादेशः स्यात् श्लौ / पिपर्ति //

उदोष्ठ्यपूर्वस्य // लसक_६१४ = पा_७,१.१०२ //
अङ्गावयवौष्ठ्यपूर्वो य ॠत् तदन्तस्याङ्गस्य उत् स्यात् //

हलि च // लसक_६१५ = पा_८,२.७७ //
रेफवान्तस्य धातेरुपधाया इको दीर्घो हलि / पिपूर्तः / पिपुरति / पपार //

शॄदॄप्रां ह्रस्वो वा // लसक_६१६ = पा_७,४.१२ //
एषां लिटि ह्रस्वो वा स्यात् / पप्रतुः //

ऋच्छत्यॄताम् // लसक_६१७ = पा_७,४.११ //
तौदादिक ऋच्छेर् ऋधातोर् ॠतां च गुणो लिटि / पपरतुः / पपरुः //

वॄतो वा // लसक_६१८ = पा_७,२.३८ //
वृङ्वृञ्भ्यामॄदन्ताच्चेटो दीर्घो वा स्यान्न तु लिटि / परिता, परीता / परीष्यति, परिष्यति / पिपर्तु / अपिपः / अपिपूर्ताम् / अपिपरुः / पिपूर्यात् / पूर्यात् / अपारीत् //

सिचि च परस्मैपदेषु // लसक_६१९ = पा_७,२.४० //
अत्र इटो न दीर्घः / अपारिष्टाम् / अपरिष्यत्, अपरीष्यत् // ओहाक् त्यागे // ५ // जहाति //

जहातेश्च // लसक_६२० = पा_६,४.११६ //
इद्वा स्याद्धलादौ क्ङिति सार्वधातुके / जहितः //

ई हल्यघोः // लसक_६२१ = पा_६,४.११३ //
श्नाभ्यस्तयोरात ईत् स्यात् सार्वधातुके क्ङिति हलादौ न तु घोः / जहीतः //

श्नाभ्यस्तयोरातः // लसक_६२२ = पा_६,४.११२ //
अनयोरातो लोपः क्ङिति सार्वधातुके / जहति / जहौ / हाता / हास्यति / जहातु, जहितात्, जहीतात् //

आ च हौ // लसक_६२३ = पा_६,४.११७ //
जहातेर्है परे आ स्याच्चादिदीतौ / जहाहि, जहिहि, जहीहि / अजहात् / अजहुः //

लोपो यि // लसक_६२४ = पा_६,४.११८ //
जहातेरालोपो यादौ सार्वधातुके / जह्यात् / एर्लिङि / हेयात् / अहासीत् / अहास्यत् // माङ् माने शब्दे च // ६ //

भृञामित् // लसक_६२५ = पा_७,४.७६ //
भृञ् माङ् ओहाङ् एषां त्रयाणामभ्यासस्य इत्स्यात् श्लौ / मिमीते / मिमाते / मिमते / ममे / माता / मास्यते / मिमीताम् / अमिमीत / मिमीत / मासीष्ट / अमास्त / अमास्यत // ओहाङ् गतौ // ७ // जिहीते / जिहाते / जिहते / जहे / हाता / हास्यते / जिहीताम् / अजिहीत / जिहीत / हासीष्ट / अहास्त / अहास्यत // डु भृञ् धारणपोषणयोः // ८ // बिभर्ति / बिभृतः / बिभ्रति / बिभृते / बिभ्राते / बिभ्रते / विभराञ्चकार, बभार / बभर्थ / बभृव / बिभराञ्चक्रे, बभ्रे / भर्तासि, भर्तासे / भरिष्यति, भरिष्यते / बिभर्तु / बिभराणि / बिभृताम् / अबिभः / अबिभृताम् / अबिभरुः / अबिभृत / बिभृयात्, बिभ्रीत / भ्रियात्, भृषीष्ट / अभार्षीत्, अभृत / अभरिष्यत्, अभरिष्यत // डु दाञ् दाने // ९ // ददाति / दत्तः / ददति / दत्ते / ददाते / ददते / ददौ, ददे / दातासि, दातासे / दास्यति, दास्यते / ददातु //

दाधा घ्वदाप् // लसक_६२६ = पा_१,१.२० //
दारूपा धारूपाश्च धातवो घुसंज्ञाः स्युर्दाप्दैपौ विना / घ्वसोरित्येत्त्वम् / देहि / दत्तम् / अददात्, अदत्त / दद्यात्, ददीत / देयात्, दासीष्ट / अदात् / अदाताम् / अदुः //

स्थाघ्वोरिच्च // लसक_६२७ = पा_१,२.१७ //
अनयोरिदन्तादेशः सिच्च कित्स्यादात्मनेपदे / अदित / अदास्यत्, अदास्यत // डु धाञ् धारणपोषणयोः // १० // दधाति //

दधस्तथोश्च // लसक_६२८ = पा_८,२.३८ //
द्विरुक्तस्य झषन्तस्य धाञो बशो भष् स्यात्तयोः स्ध्वोश्च परतः / धत्तः / दधति / दधासि / धत्थः / धत्थ / धत्ते / दधाते / दधते / धत्से / धद्ध्वे / घ्वसोरेद्धावभ्यास लोपश्च / धेहि / अदधात्, अधत्त / दध्यात्, दधीत / धेयात्, धासीष्ट / अधात्, अधित / अधास्यत् / अधास्यत // णिजिर् शौचपोषणयोः // ११ // (इर इत्संज्ञा वाच्या) //

णिजां त्रयाणां गुणः श्लौ // लसक_६२९ = पा_७,४.५७ //
णिज्विज्विषामभ्यासस्य गुणः स्यात् श्लौ / नेनेक्ति / नेनिक्तः / नेनिजति / नेनिक्ते / निनेज, निनिजे / नेक्ता / नेक्ष्यति, नेक्ष्यते / नेनेक्तु / नेनिग्धि //

नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके // लसक_६३० = पा_७,३.८७ //
लघूपधगुणो न स्यात् / नेनिजानि / नेनिक्ताम् / अनेनेक् / अनेनिक्ताम् / अनेनिजुः / अनेनिजम् / अनेनिक्त / नेनिज्यात् / नेनिजीत / निज्यात्, निक्षीष्ट //

इरितो वा // लसक_६३१ = पा_३,२.५७ //
इरितो धातोश्च्लेरङ् वा परस्मै पदेषु / अनिजत्, अनैक्षीत्, अनिक्त / अनेक्ष्यत्, अनेक्ष्यत //

इति जुहोत्यादयः // ३ //

अथ दिवादयः

दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु // १ //

दिवादिभ्यः श्यन् // लसक_६३२ = पा_३,१.६९ //
शपो ऽपवादः / हलि चेति दीर्घः / दीव्यति / दिदेव / देविता / देविष्यति / दीव्यतु / अदीव्यत् / दीव्येत् / दीव्यात् / अदेवीत् / अदेविष्यत् // एवं षिवु तन्तुसन्ताने // २ // नृती गात्रविक्षेपे // ३ // नृत्यति / ननर्त / नर्तिता //

से ऽसिचि कृतचृतच्छृदतृदनृतः // लसक_६३३ = पा_७,२.५७ //
एभ्यः परस्य सिज्भिन्नस्य सादेरार्धधातुकस्येड्वा / नर्तिष्यति, नर्त्स्यति / नृत्यतु / अनृत्यत् / नृत्येत् / नृत्यात् / अनर्तीत् / अनर्तिष्यत्, अनर्त्स्यत् // त्रसी उद्वेगे // ४ // वा भ्राशेति श्यन्वा / त्रस्यति, त्रसति / तत्रास //

वा जॄभ्रमुत्रसाम् // लसक_६३४ = पा_६,४.१२४ //
एषां किति लिटि सेटि थलि च एत्वाभ्यासलोपौ वा / त्रेसतुः, तत्रसतुः / त्रेसिथ, तत्रसिथ / त्रसिता // शो तनूकरणे // ५ //

ओतः श्यनि // लसक_६३५ = पा_७,३.७१ //
लोपः स्यात् / श्यति / श्यतः / श्यन्ति / शशौ / शशतुः / शाता / शास्यति //

विभाषा घ्राधेट्शाच्छासः // लसक_६३६ = पा_२,४.७८ //
&न्ब्स्प्॑ेभ्यस्सिचो लुग्वा स्यात्परस्मैपदे परे / अशात् / अशाताम् / अशुः / इट्सकौ / अशासीत् / अशासिष्टाम् // छो छेदने // ६ // छ्यति // षो ऽन्तकर्मणि // ७ // स्यति / ससौ // दो ऽवखण्डने // ८ // द्यति / ददौ / देयात् / अदात् // व्यध ताडने // ९ //

ग्रहिज्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृञ्जतीनां ङिति च // लसक_६३७ = पा_६,१.१६ //
एषां सम्प्रसारणं स्यात्किति ङिति च / विध्यति / विव्याध / विविधतुः / विविधुः / विव्यधिथ, विव्यद्ध / व्यद्धा / व्यत्स्यति / विध्येत् / विध्यात् / अव्यात्सीत् // पुष पुष्टौ // १० // पुष्यति / पुपोष / पुपोषिथ / पोष्टा / पोक्ष्यति / पुषादीत्यङ् / अपुषत् // शुष शोषणे // ११ // शुष्यति / शुशोष / अशुषत् // णश अदर्शने // १२ // नश्यति / ननाश / नेशतुः //

रधादिभ्यश्च // लसक_६३८ = पा_७,२.४५ //
रध् नश् तृप् दृप् द्रुह् मुह् ष्णुह् ष्णिह् एभ्यो वलाद्यार्धधातुकस्य वेट् स्यात् / नेशिथ //

मस्जिनशोर्झलि // लसक_६३९ = पा_७,१.६० //
नुम् स्यात् / ननंष्ठ / नेशिव, नेश्व / नेशिम, नेश्म / नशिता, नंष्टा / नशिष्यति, नङ्क्ष्यति / नश्यतु / अनश्यत् / नश्येत् / नश्यात् / अनशत् // षूङ् प्राणिप्रसवे // १३ // सूयते / सुषुवे / क्रादिनियमादिट् / सुषुविषे / सुषुविवहे / सुषुविमहे / सविता सोता // दूङ् परितापे // १४ // दूयते // दीङ् क्षये // १५ // दीयते //

दीङो युडचि क्ङिति // लसक_६४० = पा_६,४.६३ //
दीङः परस्याजादेः क्ङित आर्धधातुकस्य युट् / (वुग्युटावुवङ्यणोः सिद्धौ वक्तव्यौ) / दिदीये //

मीनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च // लसक_६४१ = पा_६,१.५० //
एषामात्वं स्याल्ल्यपि चादशित्येज्निमित्ते / दाता / दास्यति / (स्थाघ्वोरित्त्वे दीङः प्रतिषेधः) / अदास्त // डीङ् विहायसा गतौ // १६ // डीयते / डिड्ये / डयिता // पीङ् पाने // १७ // पीयते / पेता / अपेष्ट // माङ् माने // १८ // मायते / ममे // जनी प्रादुर्भावे // १९ //

ज्ञाजनोर्जा // लसक_६४२ = पा_७,३.७९ //
अनयोर्जादेशः स्याच्छिति / जायते / जज्ञे / जनिता / जनिष्यते //

दीपजनबुधपूरितायिप्यायिभ्यो ऽन्यरतस्याम् // लसक_६४३ = पा_३,१.६१ //
एभ्यश्च्लेश्चिण् वा स्यादेकवचने तशब्दे परे //

चिणो लुक् // लसक_६४४ = पा_६,४.१०४ //
चिणः परस्य लुक् स्यात् //

जनिवध्योश्च // लसक_६४५ = पा_७,३.३५ //
अनयोरुपधाया वृद्धिर्न स्याच्चिणि ञ्णिति कृति च / अजनि, अजनिष्ट // दीपी दीप्तौ // २०// दीप्यते / दिदीपे / अदीपि, अदीपिष्ट // पद गतौ // २१ // पद्यते / पेदे / पत्ता / पत्सीष्ट //

चिण् ते पदः // लसक_६४६ = पा_३,१.६० //
पदश्च्लेश्चिण् स्यात्तशब्दे परे / अपादि / अपत्साताम् / अपत्सत // विद सत्तायाम् // २२ // विद्यते / वेत्ता / अवित्त // बुध अवगमने // २३ // बुध्यते / बोद्धा / भोत्स्यते / भुत्सीष्ट / अबोधि, अबुद्ध / अभुत्साताम् // युध संप्रहारे // २४ // युध्यते / युयुधे / योद्धा / अयुद्ध // सृज विसर्गे // २५ // सृज्यते / ससृजे / ससृजिषे //

सृजिदृशोर्झल्यमकिति // लसक_६४७ = पा_६,१.५८ //
अनयोरमागमः स्याज्झलादावकिति / स्रष्टा / स्रक्ष्यति / सृक्षीष्ट / असृष्ट / असृक्षाताम् // मृष तितिक्षायाम् // २६ // मृष्यति, मृष्यते // ममर्ष / ममर्षिथ / ममृषिषे / मर्षितासि / मर्षिष्यति, मर्षिष्यते // णह बन्धने // २७ // नह्यति, नह्यते / ननाह / नेहिथ, ननद्ध / नेहे / नद्धा / नत्स्यति / अनात्सीत्, अनद्ध //

इति दिवादयः // ४ //

अथ स्वादयः

षुञ् अभिषवे // १ //

स्वादिभ्यः श्नुः // लसक_६४८ = पा_३,१.७३ //
शपो ऽपवादः / सुनोति / सुनुतः / हुश्नुवोरिति यण् / सुन्वन्ति / सुन्वः, सुनुवः / सुनुते / सुन्वाते / सुन्वते / सुन्वहे, सुनुवहे / सुषाव, सुषुवे / सोता / सुनु / सुनवानि / सुनवै / सुनुयात् / सूयात् //

स्तुसुधूञ्भ्यः परस्मैपदेषु // लसक_६४९ = पा_७,२.७२ //
एभ्यस्सिच इट् स्यात्परस्मैपदेषु / असावीत्, असोष्ट // चिञ् चयने // २ // चिनोति, चिनुते //

विभाषा चेः // लसक_६५० = पा_७,३.५८ //
अभ्यासात्परस्य कुत्वं वा स्यात्सनि लिटि च / चिकाय, चिचाय॑ चिक्ये, चिच्ये / अचैषीत्, अचेष्ट // स्तृञ् आच्छादने // ३ // स्तृणोति, स्तृणुते //

शर्पूर्वाः खयः // लसक_६५१ = पा_७,४.६१ //
अभ्यासस्य शर्पूर्वाः खयः शिष्यन्ते ऽन्ये हलो लुप्यन्ते / तस्तार / तस्तरतुः / तस्तरे / गुणोर्ऽतीति गुणः / स्तर्यात् //

ऋतश्च संयोगादेः // लसक_६५२ = पा_७,२.४३ //
ऋदन्तात्संयोगादेः परयोः लिङ्सिचोरिड्वा स्यात्तङि / स्तरिषीष्ट, स्तृषीष्ट / अस्तरिष्ट, अस्तृत // धूञ् कम्पने // ४ // धूनोति, धूनुते / दुधाव / स्वरतीति वेट् / दुधविथ, दुधोथ //

श्र्युकः किति // लसक_६५३ = पा_७,२.११ //
श्रिञ एकाच उगन्ताच्च गित्कितोरिण् न / परमपि स्वरत्यादिविकल्पं बाधित्वा पुरस्तात्प्रतिषेध काण्डारम्भ सामर्थ्यादनेन निषेधे प्राप्ते क्रादिनियमान्नित्यमिट् / दुधुविव / दुधुवे / अधावीत्, अधविष्ट, अधोष्ट / अधविष्यत्, अधोष्यत् / अधविष्यताम्, अधोष्यताम् / अधविष्यत, अधोष्यत //

इति स्वादयः // ५ //

अथ तुदादयः
तुद व्यथने // १ //

तुदादिभ्यः शः // लसक_६५४ = पा_३,१.७७ //
शपो ऽपवादः / तुदति, तुदते / तुतोद / तुतोदिथ / तुतुदे / तोत्ता / अतौत्सीत्, अतुत // णुद प्रेरणे // २ // नुदति, नुदते / नुनोद / नोत्ता / भ्रस्ज पाके // ३ // ग्रहिज्येति सम्प्रसारणम् / सस्य श्चुत्वेन शः / शस्य जश्त्वेन जः / भृज्जति, भृज्जते //

भ्रस्जो रोपधयो रमन्यतरस्याम् // लसक_६५५ = पा_६,४.४७ //
भ्रस्जो रेफस्योपधायाश्च स्थाने रमागमो वा स्यादार्धधातुके / मित्वादन्त्यादचः परः / स्थानषष्ठीनिर्देशाद्रोपधयोर्निवृत्तिः / बभर्ज / बभर्जतुः / बभर्जिथ, बभर्ष्ठ / बभ्रज्ज / बभ्रज्जतुः / बभ्रज्जिथ / स्कोरिति सलोपः / व्रश्चेति षः / बभ्रष्ठ / बभर्जे, बभ्रज्जे / भर्ष्टा, भ्रष्टा / भर्क्ष्यति, भ्रक्ष्यति / क्ङिति रमागमं बाधित्वा सम्प्रसारणं पूर्वविप्रतिषेधेन / भृज्ज्यात् / भृज्ज्यास्ताम् / भृज्ज्यासुः / भर्क्षीष्ट, भ्रक्षीष्ट / अभार्क्षीत्, अभ्राक्षीत् / अभर्ष्ट, अभ्रष्ट // कृष विलेखने // ४ // कृषति कृषते / चकर्ष, चकृषे //

अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् // लसक_६५६ = पा_६,१.५९ //
उपदेशे ऽनुदात्तो य ऋदुपधस्तस्याम्वा स्याज्झलादावकिति / क्रष्टा, कर्ष्टा / कृक्षीष्ट / (स्पृशमृशकृषतृपदृपां च्लेः सिज्वा वक्तव्यः) / अक्राक्षीत्, अकार्क्षीत्, अकृक्षत् / अकृष्ट / अकृक्षाताम् / अकृक्षत / क्सपक्षे अकृक्षत / अकृक्षाताम् / अकृक्षन्त // मिल संगमे // ५ // मिलति, मिलते, मिमेल / मेलिता / अमेलीत् // मुचॢ मोचने // ६ //

शे मुचादीनाम् // लसक_६५७ = पा_७,१.५९ //
मुच् लिप् विद् लुप् सिच् कृत् खिद् पिशां नुम् स्यात् शे परे / मुञ्चति, मुञ्चते / मोक्ता / मुच्यात् / मुक्षीष्ट / अमुचत्, अमुक्त / अमुक्षाताम् / लुपॢ छेदने // ७ // लुम्पति, लुम्पते / लोप्ता / अलुपत् / अलुप्त / विदॢ लाभे // ८ // विन्दति, विन्दते / विवेद, विवेदे / व्याघ्रभूतिमते सेट् / वेदिता / भाष्यमते ऽनिट् / परिवेत्ता // षिच क्षरणे // ९ // सिञ्चति, सिञ्चते //

लिपिसिचिह्वश्च // लसक_६५८ = पा_३,१.५३ //
एभ्यश्च्लेरङ् स्यात् / असिचत् //

आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् // लसक_६५९ = पा_३,१.५४ //
लिपिसिचिह्वः परस्य च्लेरङ् वा / असिचत, असिक्त // लिप उपदेहे // १० // उपदेहो वृद्धिः / लिम्पति, लिम्पते / लेप्ता / अलिपत्, अलिपत, अलिप्त//
इत्युभयपदिनः /
कृती छेदने // ११ // कृन्तति / चकर्त / कर्तिता / कर्तिष्यति, कर्त्स्यति / अकर्तीत् // खिद परिघाते // १२ // खिन्दति / चिखेद / खेत्ता // पिश अवयवे // १३ // पिंशति / पेशिता // ओव्रश्चू छेदने // १४ // वृश्चति / वव्रश्च / वव्रश्चिथ, वव्रष्ठ / व्रश्चिता, व्रष्टा / व्रश्चिष्यति, व्रक्ष्यति / वृश्च्यात् / अव्रश्चीत्, अव्राक्षीत् // व्यच व्याजीकरणे // १५ // विचति / विव्याच / विविचतुः / व्यचिता / व्यचिष्यति / विच्यात् / अव्याचीत्, अव्यचीत् / व्यचेः कुटादित्वमनसीति तु नेह प्रवर्तते, अनसीति पर्युदासेन कृन्मात्रविषयत्वात् // उछि उञ्छे // १६ // उञ्छति / &न्ब्स्प्॑ऽुञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम् /&८२१७॑ इति यादवः // ऋच्छ गतीन्द्रियप्रलयमूर्तिभावेषु // १७ // ऋच्छति / ऋच्छत्यॄतामिति गुणः / द्विहल् ग्रहणस्य अनेक हलुपसक्षणत्वान्नुट् / आनर्च्छ / आनर्च्छतुः / ऋच्छिता // उज्झ उत्सर्गे // १८ // उज्झति // लुभ विमोहने // १९ // लुभति //

तीषसहलुभरुषरिषः // लसक_६६० = पा_७,२.४८ //
इच्छत्यादेः परस्य तादेरार्धधातुकस्येड्वा स्यात् / लोभिता, लोब्धा / लोभिष्यति // तृप तृम्फ तृप्तौ // २०-२१ // तृपति / ततर्प / तर्पिता / अतर्पीत् / तृम्फति / (शे तृम्फादीनां नुम् वाच्यः) / आदिशब्दः प्रकारे, तेन ये ऽत्र नकारानुषक्तास्ते तृम्फादयः / ततृम्फ / तृफ्यात् // मृड पृड सुखने // २२-२३ // मृडति / पृडति / शुन गतौ // २४ // शुनति // इषु इच्छायाम् // २५ // इच्छति / एषिता, एष्टा / एषिष्यति / इष्यात् / ऐषीत् // कुट कौटिल्ये // २६ // गाङ्कुटादीति ङित्त्वम् // चुकुटिथ / चुकोट, चुकुट / कुटिता // पुट संश्लेषणे // २७ // पुटति / पुटिता / स्फुट विकसने // २८ // स्पुटति / स्पुटिता // स्फुर स्फुल संचलने // २९-३० // स्फुरति / स्फुलति //

स्फुरतिस्फुलत्योर्निर्निविभ्यः // लसक_६६१ = पा_८,३.७६ //
षत्वं वा स्यात् / निःष्फुरति, निःस्फुरति / णू स्तवने // ३१ // परिणूतगुणोदयः / नुवति / नुनाव / नुविता // टुमस्जो शुद्धौ // ३२ // मज्जति / ममज्ज / ममज्जिथ / मस्जिनशोरिति नुम् / (मस्जेरन्त्यात्पूर्वो नुम्वाच्यः) / संयेगादिलोपः / ममङ्क्थ / मङ्क्ता / मङ्क्ष्यति / अमाङ्क्षीत् / अमाङ्क्ताम् / अमाङ्क्षुः // रुजो भङ्गे // ३३ // रुजति / रोक्ता / रोक्ष्यति / अरौक्षीत् // भुजो कौटिल्ये // ३४ // रुजिवत् // विश प्रवेशने // ३५ // विशति // मृश आमर्शने // ३६ // आमर्शनं स्पर्शः // अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् // अम्राक्षीत्, अमार्क्षीत्, अमृक्षत् // षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु // ३७ // सीदतीत्यादि // शदॢ शातने // ३८ //

शदेः शितः // लसक_६६२ = पा_१,३.६० //
शिद्भाविनो ऽस्मात्तङानौ स्तः / शीयते / शीयताम् / अशीयत / शीयेत / शशाद / शत्ता / शत्स्यति / अशदत् / अशत्स्यत् // कॄ विक्षेपे // ३९ //

ॠत इद्धातोः // लसक_६६३ = पा_७,१.१०० //
ॠदन्तस्य धातोरङ्गस्य इत्स्यात् / किरति / चकार / चकरतुः / चकरुः / करीता, करिता / कीर्यात् //

किरतौ लवने // लसक_६६४ = पा_६,१.१४० //
उपात्किरतेः सुट् छेदने/ उपस्किरति / (अडभ्यासव्यवाये ऽपि सुट्कात् पूर्व इति वक्तव्यम्) / उपास्किरत् / उपचस्कार //

हिंसायां प्रतेश्च // लसक_६६५ = पा_६,१.१४१ //
उपात्प्रतेश्च किरतेः सुट् स्यात् हिंसायाम् / उपस्किरति / प्रतिस्किरति // गॄ निगरणे // ४० //

अचि विभाषा // लसक_६६६ = पा_८,२.२१ //
गिरते रेफस्य लो वाजादौ प्रत्यये / गिरति, गिलति / जगार, जगाल / जगरिथ, जगलिथ / गरीता, गरिता, गलीता, गलिता // प्रच्छ ज्ञीप्सायाम् // ४२ // ग्रहिज्येति सम्प्रसारणम् / पृच्छति / पप्रच्छ / पप्रच्छतुः / प्रष्टा / प्रक्ष्यति / अप्राक्षीत् // मृङ् प्राणत्यागे // ४२ //

म्रियतेर्लुङ्लिङोश्च // लसक_६६७ = पा_१,३.६१ //
लुङ्लिङोः शितश्च प्रकृतिभूतान्मृङस्तङ् नान्यत्र / रिङ् / इयङ् / म्रियते / ममार / मर्ता / मरिष्यति / मृषीष्ट / अमृत // पृङ् व्यायामे // ४३ // प्रायेणायं व्याङ्पूर्वः / व्याप्रियते / व्यापप्रे / व्यापप्राते / व्यापरिष्यते / व्यापृत / व्यापृषाताम् // जुषी प्रीतिसेवनयोः // ४४ // जुषते / जुजुषे // ओविजी भयचलनयोः // ४५ // प्रायेणायमुत्पूर्वः / उद्विजते //

विज इट् // लसक_६६८ = पा_१,२.२ //
विजेः पर इडादिप्रत्ययो ङिद्वत् / उद्विजिता //

इति तुदादयः // ६ //

अथ रुधादयः

रुधिर् आवरणे // १ //

रुधादिभ्यः श्नम् // लसक_६६९ = पा_३,१.७८ //
शपो ऽपवादः / रुणद्धि / श्नसोरल्लोपः / रुन्धः / रुन्धन्ति / रुणत्सि / रुन्धः / रुन्ध / रुणध्मि / रुन्ध्वः / रुन्ध्मः / रुन्धे / रुन्धाते / रुन्धते / रुन्त्से / रुन्धाथे / रुन्ध्वे / रुन्धे / रुन्ध्वहे / रुन्ध्महे / रुरोध, रुरुधे / रोद्धासि, रोद्धासे / रोत्स्यसि, रोत्स्यसे / रोत्स्यति, रोत्स्यते / रुणद्धु, रुन्धात् / रुन्धाम् / रुन्धन्तु / रुन्धि / रुणधानि / रुणधाव / रुणधाम / रुन्धाम् / रुन्धाताम् / रुन्धताम् / रुन्त्स्व / रुणधै / रुणधावहै / रुणधामहै / अरुणत्, अरुणद् / अरुन्धताम् / अरुन्धन् / अरुणः, अरुणत्, अरुणद् / अरुन्ध / अरुन्धाताम् / अरुन्धत / अरुन्धाः / रुन्ध्यात् / रुन्धीत / रुध्यात्, रुत्सीष्ट / अरुधत्, अरौत्सीत् / अरुद्ध / अरुत्साताम् / अरुत्सत / अरोत्स्यत्, अरौत्सीत् / अरुद्ध / अरुत्साताम् / अरुत्सत / अरोत्स्यत्, अरोत्स्यत // भिदिर् विदारणे // २ // छिदिर् द्वैधीकरणे // ३ // युजिर् योगे // ४ // रिचिर् विरेचने // ५ // रिणक्ति, रिङ्क्ते / रिरेच / रेक्ता रेक्ष्यति अरिणक् / अरिचत्, अरैक्षीत्, अरिक्त // विचिर् पृथग्भावे // ६ // विनक्ति विङ्क्ते // क्षुदिर् संपेषणे // ७ // क्षुणत्ति, क्षुन्ते / क्षोत्ता // अक्षुदत्, अक्षौत्सीत्, अक्षुत्त / उच्छृदिर् दीप्तिदेवनयोः // ८ // छृणत्ति छृन्ते / चच्छर्द / से ऽसिचीति वेट् / चच्छृदिषे, चच्छृत्से / छर्दिता / छर्दिष्यति, छर्त्स्यति / अच्छृदत्, अच्छर्दीत्, अच्छर्दिष्ट // उत्तृदिर् हिंसानादरयोः // ९ // तृणत्ति, तृन्ते // कृती वेष्टने // १० // कृणत्ति // तृह हिसि हिंसायाम् // ११-१२//

तृणह इम् // लसक_६७० = पा_७,३.९२ //
तृहः श्नमि कृते इमागमो हलादौ पिति सार्वधातुके / तृणेढि / तृण्ढः / ततर्ह / तर्हिता / अतृणेट् //

श्नान्नलोपः // लसक_६७१ = पा_६,४.२३ //
श्नमः परस्य नस्य लोपः स्यात् / हिनस्ति / जिहिंस / हिंसिता //

तिप्यनस्तेः // लसक_६७२ = पा_८,२.७३ //
पदान्तस्य सस्य दः स्यात्तिपि न त्वस्तेः / ससजुषोरुरित्यस्यापवादः / अहिनत्, अहिनद् / अहिंस्ताम् / अहिंसन् //

सिपि धातो रुर्वा // लसक_६७३ = पा_८,२.७४ //
पदान्तस्य धातोः सस्य रुः स्याद्वा, पक्षे दः / अहिनः, अहिनत्, अहिनद् // उन्दी क्लेदने // १३ // उनत्ति / उन्तः / उन्दन्ति / उन्दाञ्चकार / औनत्, औनद् / औन्ताम् / औन्दन् / औनः, औनत्, औनद् / औनदम् // अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु // १४ // अनक्ति / अङ्क्तः / अञ्जन्ति / आनञ्ज / आनञ्जिथ, आनङ्क्थ / अञ्जिता, अङ्क्ता / अङ्ग्धि / अनजानि / आनक् //

अञ्जेः सिचि // लसक_६७४ = पा_७,२.७१ //
अञ्जेः सिचो नित्यमिट् स्यात् / आञ्जीत् // तञ्चू संकोचने // १५ // तनक्ति / तञ्चिता, तङ्क्ता / ओविजी भयचलनयोः // १६ // विनक्ति // विङ्क्तः / विज इडिति ङित्त्वम् / विविजिथ / विजिता / अविनक् / अविजीत् // शिषॢ विशेषणे // १७ // शिनष्टि / शिं शिंष्टः / शिंषन्ति / शिनक्षि / शिशेष / शिशेषिथ / शेष्टा / शेक्ष्यति / हेर्धिः / शिण्ड्ढि / शिनषाणि / अशिनट् / शिंष्यात् / शिष्यात् / अशिषत् // एवं पिषॢ संचूर्णने // १८ // भञ्जो आमर्दने // १९ // श्नान्नलोपः / भनक्ति / बभञ्जिथ, बभङ्क्थ / भङ्क्ता / भङ्ग्धि / अभाङ्क्षीत् // भुज पालनाभ्यवहारयोः // २० // भुनक्ति / भोक्ता / भोक्ष्यति / अभुनक् //

भुजो ऽनवने // लसक_६७५ = पा_१,३.६६ //
तङानौ स्तः / ओदनं भुङ्क्ते / अनवने किम्? महीं भुनक्ति // ञिइन्धी दीप्तौ // २१ // इन्द्धे / इन्धाते / इन्धाताम् / इनधै / ऐन्ध / ऐन्धताम् / ऐन्धाः / विद विचारणे // २२ // विन्ते / वेत्ता //

इति रुधादयः // ७ //

अथ तनादयः

तनु विस्तारे // १ //

तनादिकृञ्भ्य उः // लसक_६७६ = पा_६,१.७९ //
शपो ऽपवादः / तनोति, तनुते / ततान, तेने / तनितासि, तनितासे / तनोतु / तनुताम् / अतनोत्, अतनुत / तनुयात्, तन्वीत / तन्यात्, तनिषीष्ट / अतानीत्, अतनीत् //

तनादिभ्यस्तथासोः // लसक_६७७ = पा_२,४.७९ //
तनादेः सिचो वा लुक् स्यात्तथासोः / अतत, अतनिष्ट / अतथाः, अतनिष्टाः / अतनिष्यत्, अतनिष्यत // षणु दाने // २ // सनोति, सनुते //


ये विभाषा // लसक_६७८ = पा_६,४.४३ //
जनसनखनामात्वं वा यादौ क्ङिति / सायात्, सन्यात् //

जनसनखनां सञ्झलोः // लसक_६७९ = पा_६,४.४२ //
एषामाकारे ऽन्तादेशः स्यात् सनि झलादौ क्ङिति / असात, असनिष्ट // क्षणु हिंसायाम् // ३ // क्षणोति, क्षणुते // ह्म्यन्तेति न वृद्धिः / अक्षणीत्, अक्षत, अक्षणिष्ट / अक्षथाः, अक्षणिष्ठाः // क्षिणु च // ४ // अप्रत्यये लघूपधस्य गुणो वा / क्षेणोति, क्षिणोति / क्षेणिता / अक्षेणीत्, अक्षित, अक्षेणिष्ट // तृणु अदने // ५ // तृणोति, तर्णोति॑ तृणुते, तर्णुते // डुकृञ् करणे // ६ // करोति //

अत उत्सार्वधातुके // लसक_६८० = पा_६,४.११० //
उप्रत्ययान्तस्य कृञो ऽकारस्य उः स्यात् सार्वधातुके क्ङिति / कुरुतः //

न भकुर्छुराम् // लसक_६८१ = पा_८,२.७९ //
भस्य कुर्छुरोरुपधाया न दीर्घः / कुर्वन्ति //

नित्यं करोतेः // लसक_६८२ = पा_६,४.१०८ //
करोतेः प्रत्ययोकारस्य नित्यं लोपो म्वोः परयोः / कुर्वः / कुर्मः / कुरुते / चकार, चक्रे / कर्तासि, कर्तासे / करिष्यति, करिष्यते / करोतु / कुरुताम् / अकरोत् / अकुरुत //

ये च // लसक_६८३ = पा_६,४.१०९ //
कृञ उलोपो यादौ प्रत्यये परे / कुर्यात्, कुर्वीत / क्रियात्, कृषीष्ट / अकार्षीत्, अकृत / अकरिष्यत्, अकरिष्यत //

सम्परिभ्यां करोतौ भूषणे // लसक_६८४ = पा_६,१.१३७ //

समवाये च // लसक_६८५ = पा_६,१.१३८ //
सम्परिपूर्वस्य करोतेः सुट् स्याद् भूषणे संघाते चार्थे / संस्करोति / अलङ्करोतीत्यर्थः / संस्कुर्वन्ति / सङ्घीभवन्तीत्यर्थः / सम्पूर्वस्य क्वचिदभूषणे ऽपि सुट् / संस्कृतं भक्षा इति ज्ञापकात् //

उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु च // लसक_६८६ = पा_६,१.१३९ //
उपात्कृञः सुट् स्यादेष्वर्थेषु चात्प्रागुक्तयोरर्थयोः / प्रतियत्नो गुणाधानम् / विकृतमेव वैकृतं विकारः / वाक्याध्याहार आकाङ्क्षितैकदेशपूरणम् / उपस्कृता कन्या / उपस्कृता ब्राह्मणाः / एधोदकस्योपस्करोति / उपस्कृतं भुङ्क्ते / उपस्कृतं ब्रूते // वनु याचने // ७ // वनुते / ववने // मनु अवबोधने // ८ // मनुते / मेने / मनिष्यते / मनुताम् / अमनुत / मन्वीत / मनिषीष्ट / अमत, अमनिष्ट / अमनिष्यत //

इति तनादयः // ८ //

अथ क्र्यादयः

डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये // १ //

क्र्यादिभ्यः श्ना // लसक_६८७ = पा_३,१.८१ //
शपो ऽपवादः / क्रीणाति / ई हल्यघोः / क्रीणीतः / श्नाभ्यस्तयोरातः / क्रीणन्ति / क्रीणासि / क्रीणीथः / क्रीणीथ / क्रीणामि / क्रीणीवः / क्रीणीमः / क्रीणीते / क्रीणाते / क्रीणते / क्रीणीषे / क्रीणाथे / क्रीणीध्वे / क्रीणे / क्रीणीवहे / क्रीणीमहे / चिक्राय / चिक्रियतुः / चिक्रियुः / चिक्रयिथ, चिक्रेथ / चिक्रिय / चिक्रिये / क्रेता / क्रेष्यति, क्रेष्यते / क्रीणातु, क्रीणीतात् / क्रीणीताम् / अक्रीणात्, अक्रीणीत / क्रीणीयात्, क्रीणीत / क्रीयात्, क्रेषीष्ट / अक्रैषीत्, अक्रेष्यत // प्रीञ् तर्पणे कान्तौ च // २ // प्रीणाति, प्रीणीते // श्रीञ् पाके // ३ // श्रीणाति, श्रीणीते // मीञ् हिंसायाम् // ४ //

हिनुमीना // लसक_६८८ = पा_८,४.१५ //
उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्यैतयोर्नस्य णः स्यात् / प्रमीणाति, प्रमीणीते / मीनातीत्यात्वम् / ममौ / मिम्यतुः / ममिथ, ममाथ / मिम्ये / माता / मास्यति / मीयात्, मासीष्ट / अमासीत् / अमासिष्टाम् / अमास्त // षिञ् बन्धने // ५ // सिनाति, सिनीते / सिषाय, सिष्ये / सेता // स्कुञ् आप्लवने // ६ //

स्तन्भुस्तुन्भुस्कन्भुस्कुन्भुस्कुञ्भ्यः श्नुश्च // लसक_६८९ = पा_३,१.८२ //
चात् श्ना / स्कुनोति, स्कुनाति / स्कुनुते, स्कुनीते / चुस्काव, चुस्कुवे / स्कोता / अस्कौषीत्, अस्कोष्ट // स्तन्भ्वादयश्चत्वारः सौत्राः / सर्वे रोधनार्थाः परस्मैपदिनः //

हलः श्नः शानज्झौ // लसक_६९० = पा_३,१.८३ //
हलः परस्य श्नः शानजादेशः स्याद्धौ परे / स्तभान //

जॄस्तन्भुम्रुचुम्लुचुग्रुचुग्लुचुग्लुञ्चुश्विभ्यश्च // लसक_६९१ = पा_३,१.५८ //
च्लेरङ् वा स्यात् //

स्तन्भेः // लसक_६९२ = पा_८,३.६७ //
स्तन्भेः सौत्रस्य सस्य षः स्यात् / व्यष्टभत् / अस्तम्भीत् // युञ् बन्धने // ७ // युनाति, युनीते / योता // क्नूञ् शब्दे // ८ // क्नूनाति, क्नूनीते // द्रूञ् हिंसायाम् // ९ // द्रूणाति, द्रूणीते // दॄ विदारणे // १० // दृणाति, दृणीते // पूञ् पवने // ११ //

प्वादीनां ह्रस्वः // लसक_६९३ = पा_७,३.८० //
पूञ् लूञ् स्तॄञ् कॄञ् वॄञ् धूञ् शॄ पॄ वॄ भॄ मॄ दॄ जॄ झॄ धॄ नॄ कॄ ॠ गॄ ज्या री ली व्ली प्लीनां चतुर्विंशतेः शिति ह्रस्वः / पुनाति, पुनीते / पविता // लूञ् छेदने // १२ // लुनाति, लुनीते // स्तॄञ् आच्छादने // १३ // स्तृणाति / शर्पूर्वाः खयः / तस्तार / तस्तरतुः / तस्तरे / स्तरीता / स्तरिता / स्तृणीयात्, स्तृणीत / स्तीर्यात् //

लिङ्सिचोरात्मनेपदेषु // लसक_६९४ = पा_७,२.४२ //
वृङ्वृञ्भ्यामॄदन्ताच्च परयोर्लिङ्सिचोरिड् वा स्यात्तङि //

न लिङि // लसक_६९५ = पा_७,२.३९ //
वॄत इटो लिङि न दीर्घः / स्तरिषीष्ट / उश्चेति कित्त्वम् / स्तीर्षीष्ट / सिचि च परस्मैपदेषु / अस्तारीत् / अस्तारिष्टाम् / अस्तारिषुः / अस्तरीष्ट, अस्तरिष्ट, अस्तीर्ष्ट // कृञ् हिंसायाम् // १४ // कृणाति, कृणीते / चकार, चकरे // वृञ् वरणे // १५ // वृणाति, वृणीते / ववार, ववरे / वरिता, वरीता / उदोष्ठ्येत्युत्त्वम् / वूर्यात् / वरिषीष्ट, वूर्षीष्ट / अवारीत् / अवारिष्टाम् / अवरिष्ट, अवरीष्ट, अवूर्ष्ट // धूञ् कम्पने // १६ // धुनाति, धुनीते / धविता, धोता / अधावीत् / अधविष्ट, अधोष्ट // ग्रह उपादाने // १७ // गृह्णाति, गृह्णीते / जग्राह, जगृहे //

ग्रहो ऽलिटि दीर्घः // लसक_६९६ = पा_७,२.३७ //
एकाचो ग्रहेर्विहितस्येटो दीर्घो न तु लिटि / ग्रहीता / गृह्णातु / हलः श्नः शानज्झाविति श्नः शानजादेशः / गृहाण / गृह्यात्, ग्रहीषीष्ट / ह्म्यन्तेति न वृद्धिः / अग्रहीत् / अग्रहीष्टाम् / अग्रहीष्ट / अग्रहीषाताम् // कुष्अ निष्कर्षे // १८ // कुष्णाति / कोषिता // अश भोजने // १९ // अश्नाति / आश / अशिता / अशिष्यति / अश्नातु / अशान // मुष स्तेये // २० // मोषिता / मुषाण // ज्ञा अवबोधने // २१ // जज्ञौ // वृङ् संभक्तौ // २२ // वृणीते / ववृषे // ववृढ्वे / वरिता, वरीता / अवरीष्ट, अवरिष्ट, अवृत //

इति क्र्यादयः // ९ //

अथ चुरादयः

चुर स्तेये // १ //

सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्वचवर्मवर्णचूर्ण चुरादिभ्यो णिच् // लसक_६९७ = पा_२,१.२५ //
एभ्यो णिच् स्यात् / चूर्णान्तेभ्यः ऽप्रातिपदिकाद्धात्वर्थे&८२१७॑ इत्येव सिद्धे तेषामिह ग्रहणं प्रपञ्चार्थम् / चुरादिभ्यस्तु स्वार्थे / पुगन्तेति गुणः / सनाद्यन्ता इति धातुत्वम् / तिप्शबादि / गुणायादेशौ / चोरयति //

णिचश्च // लसक_६९८ = पा_१,३.७४ //
णिजन्तादात्मनेपदं स्यात्कर्तृगामिनि क्रियाफले / चोरयते / चोरयामास / चोरयिता / चोर्यात्, चोरयिषीष्ट / णिश्रीति चङ् / णौ चङीति ह्रस्वः / चङीति द्वित्वम् / हलादिः शेषः / दीर्घो लघोरित्यभ्यासस्य दीर्घः / अचूचुरत्, अचूचुरत // कथ वाक्यप्रबन्धे // २ // अल्लोपः //

अचः परस्मिन्पूर्वविधौ // लसक_६९९ = पा_१,१.५७ //
अल्विध्यर्थमिदम् / परनिमित्तो ऽजादेशः स्थानिवत् स्यात्स्थानि भूतादचः पूर्वत्वेन दृष्टस्य विधौ कर्तव्ये / इति स्थानिवत्वान्नोपधावृद्धिः / कथयति / अग्लोपित्वाद्दीर्घसन्वद्भावौ न / अचकथत् // गण संख्याने // ३ // गणयति //

ई च गणः // लसक_७०० = पा_७,४.९७ //
गणयतेरभ्यासस्य ई स्याच्चङ्परे णौ चादत् / अजीगणत्, अजगणत् //

इति चुरादयः //

अथ ण्यन्तप्रक्रिया

स्वतन्त्रः कर्ता // लसक_७०१ = पा_१,४.५४ //
क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोर्ऽथः कर्ता स्यात् //

तत्प्रयोजको हेतुश्च // लसक_७०२ = पा_१,४.५५ //
कर्तुः प्रयोजको हेतुसंज्ञः कर्तृसंज्ञश्च स्यात् //

हेतुमति च // लसक_७०३ = पा_३,१.२६ //
प्रयोजकव्यापारे प्रेषणादौ वाच्ये धातोर्णिच् स्यात् / भवन्तं प्रेरयति भावयति //

ओः पुयण्ज्यपरे // लसक_७०४ = पा_७,४.८० //
सनि परे यदङ्गं तदवयवाभ्यासोकारस्य इत्स्यात् पवर्गयण्जकारेष्ववर्णपरेषु परतः // अबीभवत् // ष्ठा गतिनिवृत्तौ //

अर्तिह्रीव्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां पुङ् णौ // लसक_७०५ = पा_७,३.३६ //
स्थापयति //

तिष्ठतेरित् // लसक_७०६ = पा_७,४.५ //
उपधाया इदादेशः स्याच्चङ्परे णौ / अतिष्ठिपत् // घट चेष्टायाम् //

मितां ह्रस्वः // लसक_७०७ = पा_६,४.९२ //
घटादीनां ज्ञपादीनां चोपधाया ह्रस्वः स्याण्णौ / घटयति // ज्ञप ज्ञाने ज्ञापने च // ज्ञपयति / अजिज्ञपत् //

इति ण्यन्तप्रक्रिया

अथ सन्नन्तप्रक्रिया

धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा // लसक_७०८ = पा_३,१.७ //
इषिकर्मण इषिणैककर्तृकाद्धातोः सन्प्रत्ययो वा स्यादिच्छायाम् // पठ व्यक्तायां वाचि //

सन्यङोः // लसक_७०९ = पा_६,१.९ //
सन्नन्तस्य यङन्तस्य च धातोरनभ्यासस्य प्रथमस्यैकाचो द्वे स्तो ऽजादेस्तु द्वितीयस्य / सन्यतः / पठितुमिच्छति पिपठिषति / कर्मणः किम् ? गमनेनेच्छति / समान कर्तृकात् किम् ? शिष्याः पठन्त्वितीच्छति गुरुः / वा ग्रहणाद्वाक्यमपि // लुङ्सनोर्घसॢ //

सः स्यार्धधातुके // लसक_७१० = पा_७,४.४९ //
सस्य तः स्यात्सादावार्धधातुके / अत्तुमिच्छति जिघत्सति / एकाच इति नेट् //

अज्झनगमां सनि // लसक_७११ = पा_६,४.१६ //
अजन्तानां हन्तेरजादेशगमेश्च दीर्घो झलादौ सनि //

इको झल् // लसक_७१२ = पा_१,२.९ //
इगन्ताज्झलादिः सन् कित् स्यात् / ॠत इद्धातोः / कर्तुमिच्छति चिकीर्षति //

सनि ग्रहगुहोश्च // लसक_७१३ = पा_७,२.१२ //
ग्रहेर्गुहेरुगन्ताच्च सन इण् न स्यात् / बुभूषति //

इति सन्नन्तप्रक्रिया //

अथ यङन्तप्रक्रिया

धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् // लसक_७१४ = पा_३,१.२२ //
पौनःपुन्ये भृशार्थे च द्योत्ये धातोरेकाचो हलादेर्यङ् स्यात् //

गुणो यङ्लुकोः // लसक_७१५ = पा_७,४.८२ //
अभ्यासस्य गुणो यङि यङ्लुकि च परतः / ङिदन्तत्वादात्मनेपदम् / पुनः पुनरतिशयेन वा भवति बोभूयते / बोभूयाञ्चक्रे / अबोभूयिष्ट //

नित्यं कौटिल्ये गतौ // लसक_७१६ = पा_३,१.२३ //
गत्यर्थात्कौटिल्य एव यङ् स्यान्न तु क्रियासमभिहारे //

दीर्घो ऽकितः // लसक_७१७ = पा_७,४.८३ //
अकितो ऽभ्यासस्य दीर्घो यङ्यङ्लुकोः / कुटिलं व्रजति वाव्रज्यते //

यस्य हलः // लसक_७१८ = पा_६,४.४९ //
यस्येति संघातग्रहणम् / हलः परस्य यशब्दस्य लोप आर्धधातुके / आदेः परस्य / अतो लोपः / वाव्रजाञ्चक्रे / वाव्रजिता //

रीगृदुपधस्य च // लसक_७१९ = पा_७,४.९० //
ऋदुपधस्य धातोरभ्यासस्य रीगागमो यङ्यङ्लुकोः / वरीवृत्यते / वरीवृताञ्चक्रे / वरीवर्तिता //

क्षुभ्नादिषु च // लसक_७२० = पा_८,४.३९ //
णत्वं न / नरीनृत्यते / जरीगृह्यते //

इति यङन्त प्रक्रिया //

अथ यङ्लुक् प्रक्रिया

यङोऽचि च // लसक_७२१ = पा_२,४.७४ //
यङोऽचि प्रत्यये लुक् स्यात्, चकारात्तं विनापि क्वचित् / अनैमित्तिको ऽय मन्तरङ्गत्वादादौ भवति / ततः प्रत्ययलक्षणेन यङन्तत्वाद्द्वित्वम् / अभ्यासकार्यम् / धातुत्वाल्लडादयः / शेषात्कर्तरीति परस्मैपदम् / चर्करीतं चेत्यदादौ पाठाच्छपो लुक् //

यङो वा // लसक_७२२ = पा_७,३.९४ //
यङ्लुगन्तात्परस्य हलादेः पितः सार्वधातुकस्येड् वा स्यात् / भूसुवोरिति गुणनिषेधो यङ्लुकि भाषायां न, बोभोतु, तेतिक्ते इति छन्दसि निपातनात् / बोभवीति, बोभोति / बोभूतः / अदभ्यस्तात् / बोभुवति / बोभवाञ्चकार, बोभवामास / बोभविता / बोभविष्यति / बोभवीतु, बोभोतु, बोभूतात् / बोभूताम् / बोभुवतु / बोभूहि / बोभवानि / अबोभवीत्, अबोभोत् / अबोभूताम् / अबोभवुः / बोभूयात् / बोभूयाताम् / बोभूयुः / बोभूयात् / बोभूयास्ताम् / बोभूयासुः / गातिस्थेति सिचो लुक् / यङो वेतीट्पक्षे गुणं बाधित्वा नित्यत्वाद्वुक् / अबोभूवीत्, अबोभोत् / अबोभूताम् / अबोभूवुः / अबोभविष्यत् // &न्ब्स्प्॑.

इति यङ्लुक् प्रक्रिया //

अथ नामधातवः

सुप आत्मनः क्यच् // लसक_७२३ = पा_३,१.८ //
इषिकर्मण एषितुः संबन्धिनः सुबन्तादिच्छायामर्थे क्यच् प्रत्ययो वा स्यात् //

सुपो धातुप्रातिपदिकयोः // लसक_७२४ = पा_२,४.७१ //
एतयोरवयवस्य सुपो लुक् //

क्यचि च // लसक_७२५ = पा_७,४.३३ //
अवर्णस्य ईः / आत्मनः पुत्रमिच्छति पुत्रीयति //

नः क्ये // लसक_७२६ = पा_१,४.१५ //
क्यचि क्यङि च नान्तमेव पदं नान्यत् / नलोपः / राजीयति / नान्तमेवेति किम्? वाच्यति / हलि च / गीर्यति / पूर्यति / धातोरित्येव / नेह - दिवमिच्छति दिव्यति //

क्यस्य विभाषा // लसक_७२७ = पा_६,४.५० //
हलः परयोः क्यच्क्यङारेलोपो वार्धधातुके / आदेः परस्य / अतो लोपः / तस्य स्थानिवत्त्वाल्लघूपधगुणो न / समिधिता, समिध्यिता //

काम्यच्च // लसक_७२८ = पा_३,१.९ //
उक्तविषये काम्यच् स्यात् / पुत्रमात्मन इच्छति पुत्रकाम्यति / पुत्रकाम्यिता //

उपमानादाचारे // लसक_७२९ = पा_३,१.१० //
उपमानात्कर्मणः सुबन्तादाचारेर्ऽथे क्यच् / पुत्रमिवाचरति पुत्रीयति छात्रम् / विष्णूयति द्विजम् // (सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विब्वा वक्तव्यः) / अतो गुणे / कृष्ण इवाचरति कृष्णति / स्व इवाचरति स्वति / सस्वौ //

अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति // लसक_७३० = पा_६,४.१५ //
अनुनासिकान्तस्योपधाया दीर्घः स्यात्क्वौ झलादौ च क्ङिति / इदमिवाचरति इदामति / राजेव राजानति / पन्था इव पथीनति //

कष्टाय क्रमणे // लसक_७३१ = पा_२,१.१४ //
चतुर्थ्यन्तात् कष्टशब्दादुत्साहेर्ऽथे क्यङ् स्यात् / कष्टाय क्रमते कष्टायते / पापं कर्तुमुत्सहत इत्यर्थः //

शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः करणे // लसक_७३२ = पा_३,१.१७ //
एभ्यः कर्मभ्यः करोत्यर्थे क्यङ् स्यात् / शब्दं करोति शब्दायते // (ग.सू) तत्करोति तदाचष्टे॑ इति णिच् // (ग.सू) प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्च / प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे णिच् स्यात्, इष्ठे यथा प्रातिपदिकस्य पुंवद्भाव-रभाव-टिलोप- विन्मतुब्लोप-यणादिलोप-प्रस्थस्फाद्यादेश-भसंज्ञास्तद्वण्णावपि स्युः / इत्यल्लोपः / घटं करोत्याचष्टे वा घटयति //

इति नामधातवः

अथ कण्ड्वादयः //

कण्ड्वादिभ्यो यक् // लसक_७३३ = पा_३,१.२७ //
एभ्यो धातुभ्यो नित्यं यक् स्यात्स्वार्थे / कण्डूञ् गात्रविघर्षणे // १ // कण्डूयति / कण्डूयत इत्यादि //

इति कण्ड्वादयः //

अथात्मनेपदप्रक्रिया

कर्तरि कर्मव्यतिहारे // लसक_७३४ = पा_१,३.१४ //
क्रियाविनिमये द्योत्ये कर्तर्यात्मनेपदम् / व्यतिलुनीते / अन्यस्य योग्यं लवनं करोतीत्यर्थः //

न गतिहिंसार्थेभ्यः // लसक_७३५ = पा_१,३.१५ //
व्यतिगच्छन्ति / व्यतिघ्नन्ति //

नेर्विशः // लसक_७३६ = पा_१,३.१७ //
निविशते //

परिव्यवेभ्यः क्रियः // लसक_७३७ = पा_१,३.१८ //
परिक्रीणीते / विक्रीणीते / अवक्रीणीते //

विपराभ्यां जेः // लसक_७३८ = पा_१,३.१९ //
विजयते / पराजयते //

समवप्रविभ्यः स्थः // लसक_७३९ = पा_१,३.२२ //
संतिष्ठते / अवतिष्ठते / प्रतिष्ठते / वितिष्ठते //

अपह्नवे ज्ञः // लसक_७४० = पा_१,३.४४ //
शतमपजानीते / अपलपतीत्यर्थः //

अकर्मकाच्च // लसक_७४१ = पा_१,३.४५ //
सर्पिषो जानीते / सर्पिषोपायेन प्रवर्तत इत्यर्थः //

उदश्चरः सकर्मकात् // लसक_७४२ = पा_१,३.५३ //
धर्ममुच्चरते / उल्लङ्घ्य गच्छतीत्यर्थः //

समस्तृतीयायुक्तात् // लसक_७४३ = पा_१,३.५४ //
रथेन सञ्चरते //

दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे // लसक_७४४ = पा_१,३.५५ //
सम्पूर्वाद्दाणस्तृतीयान्तेन युक्तादुक्तं स्यात् तृतीया चेच्चतुर्थ्यर्थे / दास्या संयच्छते कामी //

पूर्ववत्सनः // लसक_७४५ = पा_१,२.६२ //
सनः पूर्वो यो धातुस्तेन तुल्यं सन्नन्तादप्यात्मनेपदं स्यात् / एदिधिष्यते //

हलन्ताच्च // लसक_७४६ = पा_१,२.१० //
इक्समीपाद्धलः परो झलादिः सन् कित् / निविविक्षते //

गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु // लसक_७४७ = पा_१,३.३२ // कृञः
गन्धनं सूचनम् / उत्कुरुते / सूचयतीत्यर्थः / अवक्षेपणं भर्त्सनम् / श्येनो वर्तिकामुत्कुरुते / भर्त्सयतीत्यर्थः / हरिमुपकुरुते / सेवत इत्यर्थः / परदारान् प्रकुरुते / तेषु सहसा प्रवर्तते / एधोदकस्योपस्कुरुते / गुणमाधत्ते / कथाः प्रकुरुते / प्रकथयतीत्यर्थः / शतं प्रकुरुते / धर्मार्थं विनियुङ्क्ते / एषु किम् ? कटं करोति //

भुजो ऽनवने // लसक_७४८ = पा_१,३.६६ //
ओदनं भुङ्क्ते / अनवने किम् ? महीं भुनक्ति //

इत्यात्मनेपदप्रक्रिया //

अथ परस्मैपदप्रक्रिया

अनुपराभ्यां कृञः // लसक_७४८अ = पा_१,३.७९ //
कर्तृगे च फले गन्धनादौ च परस्मैपदं स्यात् / अनुकरोति / पराकरोति //

अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः // लसक_७४९ = पा_१,३.८० //
क्षिप प्रेरणे स्वरितेत् / अभिक्षिपति //

प्राद्वहः // लसक_७५० = पा_१,३.८१ //
प्रवहति //

परेर्मृषः // लसक_७५१ = पा_१,३.८२ //
परिमृष्यति //

व्याङ्परिभ्यो रमः // लसक_७५२ = पा_१,३.८३ //
रमु क्रीडायाम् // विरमति //

उपाच्च // लसक_७५३ = पा_१,३.८४ //
यज्ञदत्तमुपरमति / उपरमयतीत्यर्थः / अन्तर्भावितण्यर्थो ऽयम् //

इति परस्मैपदप्रक्रिया //
इति पदव्यवस्था //

अथ भावकर्मप्रक्रिया

भावकर्मणोः // लसक_७५४ = पा_१,३.१३ //
लस्यात्मनेपदम् //

सार्वधातुके यक् // लसक_७५५ = पा_३,१.६७ //
धातोर्यक् भावकर्मवाचिनि सार्वधातुके / भावः क्रिया / सा च भावार्थकलकारेणानूद्यते / युष्मदस्मद्भ्यां सामानाधिकरण्याभावात्प्रथमः पुरुषः / तिङ्वाच्यक्रियाया अद्रव्य रूपत्वेन द्वित्वाद्यप्रतीतेर्न द्विवचनादि किंत्वेकवचनमेवोत्सर्गतः /
त्वया मया अन्यैश्च भूयते / बभूवे //

स्यसिच्सीयुट्तासिषु भावकर्मणोरुपदेशे ऽज्झनग्रहदृशां वा चिण्वदिट् च // लसक_७५६ = पा_६,४.६२ //
उपदेशे यो ऽच् तदन्तानां हनादीनां च चिणीवाङ्गकार्यं वा स्यात्स्यादिषु भावकर्मणोर्गम्यमानयोः स्यादीनामिडागमश्च / चिण्वद्भावपक्षे ऽयमिट् / चिण्वद्भावाद् वृद्धिः / भाविता, भविता / भाविष्यते, भविष्यते / भूयताम् / अभूयत / भाविषीष्ट, भविषीष्ट //

चिण् भावकर्मणोः // लसक_७५७ = पा_३,१.६६ //
च्लेश्चिण्स्याद्भावकर्मवाचिनि तशब्दे परे / अभावि / अभाविष्यत, अभविष्यत / अकर्मको ऽप्युपसर्गवशात्सकर्मकः / अनुभूयते आनन्दश्चैत्रेण त्वया मया च / अनुभूयेते / अनुभूयन्ते / त्वमनुभूयसे / अहमनुभूये / अन्वभावि / अन्वभाविषाताम्, अन्वभविषाताम् / णिलोपः / भाव्यते / भावयाञ्चक्रे, भावयाम्बभूवे, भावयामासे / चिण्वदिट् / आभीयत्वेना सिद्धत्वाण्णिलोपः / भाविता, भावयिता / भाविष्यते, भावयिष्यते / अभाव्यत / भाव्येत / भाविषीष्ट, भावयिषीष्ट / अभावि / अभाविषाताम्, अभावयिषाताम् // बुभूष्यते // अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः / स्तूयते विष्णुः / स्ताविता, स्तोता / स्ताविष्यते, स्तोष्यते / अस्तावि / अस्ताविषाताम्, अस्तोषाताम् // गतौ / गुणोर्ऽतीति गुणः / अर्यते // स्मृ स्मरणे / स्मर्यते / सस्मरे / उपदेशग्रहणाच्चिण्वदिट् / आरिता, अर्ता / स्मारिता, स्मर्ता / अनिदितामिति नलोपः / त्रस्यते / इदितस्तु नन्द्यते / संप्रसारणम् / इज्यते //

तनोतेर्यकि // लसक_७५८ = पा_६,४.४४ //
आकारो ऽन्तादेशो वा स्यात् / तायते, तन्यते //

तपो ऽनुतापे च // लसक_७५९ = पा_३,१.६५ //
तपश्च्लेश्चिण् न स्यात् कर्मकर्तर्यनुतापे च / अन्वतप्त पापेन / घुमास्थेतीत्त्वम् / दीयते / धीयते / ददे //

आतो युक् चिण्कृतोः // लसक_७६० = पा_७,३.३३ //
आदन्तानां युगागमः स्याच्चिणि ञ्णिति कृति च / दायिता, दाता / दायिषीष्ट, दासीष्ट / अदायि / अदायिषाताम् // भज्यते //

भञ्जेश्च चिणि // लसक_७६१ = पा_६,४.३३ //
नलोपो वा स्यात् / अभाजि, अभञ्जि // लभ्यते //

विभाषा चिण्णमुलोः // लसक_७६२ = पा_७,१.६९ //
लभेर्नुमागमो वा स्यात् / अलम्भि, अलाभि //

इति भावप्रक्रिया //

अथ कर्मकर्तृप्रक्रिया

यदा कर्मैव कर्तृत्वेन विवक्षितं तदा सकर्मकाणामप्यकर्मकत्वात्कर्तरि भावे च लकारः //

कर्मवत्कर्मणा तुल्यक्रियः // लसक_७६३ = पा_३,१.८७ //
कर्मस्थया क्रियया तुल्यक्रियः कर्ता कर्मवत्स्यात् / कार्यातिदेशो ऽयम् / तेन यगात्मनेपदचिण्वदिटः स्युः / पच्यते फलम् / भिद्यते काष्ठम् / अभेदि / भावे, भिद्यते काष्ठेन //

इति कर्मकर्तृप्रक्रिया //

अथ लकारार्थप्रक्रिया

अभिज्ञावचने ऌट् // लसक_७६४ = पा_३,१.११२ //
स्मृतिबोधिन्युपपदे भूतानद्यतने धातोरॢट् / लङोऽपवादः // वस निवासे // स्मरसि कृष्ण गोकुले वत्स्यामः / एवं बुध्यसे, चेतयसे, इत्यादिप्रयोगे ऽपि //

न यदि // लसक_७६५ = पा_३,१.११३ //
यद्योगे उक्तं न / अभिजानासि कृष्ण यद्वने अभुञ्ज्महि //

लट् स्मे // लसक_७६६ = पा_३,२.११८ //
लिटो ऽपवादः / यजति स्म युधिष्ठिरः //

वर्तमानसमीप्ये वर्तमानवद्वा // लसक_७६७ = पा_३,३.१३१ //
वर्तमाने ये प्रत्यया उक्तास्ते वर्तमानसामीप्ये भूते भविष्यति च वा स्युः / कदागतो ऽसि / अयमागच्छामि, अयमागमं वा / कदा गमिष्यसि / एष गच्छामि, गमिष्यामि वा //

हेतुहेतुमतोर्लिङ् // लसक_७६८ = पा_३,३.१५६ //
वा स्यात् / कृष्णं नमेच्चेत्सुखं यायात् / कृष्णं नंस्यति चेत्सुखं यास्यति / (भविष्यत्येवेष्यते) / नेह / हन्तीति पलायते // विधिनिमन्त्रणेति लिङ् / विधिः प्रेरणं भृत्यादेर्निकृष्टस्य प्रवर्तनम् / यजेत // निमन्त्रणं नियोगकरणम्, आवश्यके श्राद्धभोजनादौ दौहित्रादेः प्रवर्तनम् / इह भुञ्जीत // आमन्त्रणं कामचारानुज्ञा / इहासीत // अधीष्टं सत्कारपूर्वको व्यापारः / पुत्रमध्यापयेद् भवान् // संप्रश्नः संप्रधारणम् / किं भो वेदमधीयीय उत तर्कम् // प्रार्थनं याच्ञा / भो भोजनं लभेय / एवं लोट् //

इति लकारार्थप्रक्रिया //
इति तिङन्तं समाप्तम् //

अथ कृदन्ते कृत्प्रक्रिया

धातोः // लसक_७६९ = पा_३,१.९१ //
आतृतीयाध्यायसमाप्तेर्ये प्रत्ययास्ते धातोः परे स्युः / कृदतिङिति कृत्संज्ञा //

वासरूपो ऽस्त्रियाम् // लसक_७७० = पा_३,१.९४ //
अस्मिन्धात्वधिकारे ऽसरूपो ऽपवादप्रत्यय उत्सर्गस्य बाधको वा स्यात् स्त्र्यधिकारोक्तं विना //

कृत्याः // लसक_७७१ = पा_३,१.९५ //
ण्वुल्तृचावित्यतः प्राक् कृत्यसंज्ञाः स्युः //

कर्तरि कृत् // लसक_७७२ = पा_३,४.६७ //
कृत्प्रत्ययः कर्तरि स्यात् / इति प्राप्ते --.

तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः // लसक_७७३ = पा_३,४.७० //
एते भावकर्मणोरेव स्युः //

तव्यत्तव्यानीयरः // लसक_७७४ = पा_३,१.९३ //
धातोरेते प्रत्ययाः स्युः / एधितव्यम्, एधनीयं त्वया / भावे औत्सर्गिकमेकवचनं क्लीबत्वं च / चेतव्यश्चयनीयो वा धर्मस्त्वया (केलिमर उपसंख्यानम्) पचेलिमा माषाः / पक्तव्या इत्यर्थः / भिदेलिमाः सरलाः / भेत्तव्या इत्यर्थः / कर्मणि प्रत्ययः //

कृत्यल्युटो बहुलम् // लसक_७७५ = पा_३,३.११३ //
क्वचित्प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः क्वचिद्विभाषा क्वचिदन्यदेव /
विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति // १ //
स्नात्यनेनेति स्नानीयं चूर्णम् / दीयते ऽस्मै दानीयो विप्रः //

अचो यत् // लसक_७७६ = पा_३,१.९७ //
अजन्ताद्धातोर्यत् स्यात् / चेयम् //

ईद्यति // लसक_७७७ = पा_६,४.६५ //
यति परे आत ईत्स्यात् / देयम् / ग्लेयम् //

पोरदुपधात् // लसक_७७८ = पा_३,१.९८ //
पवर्गान्ताददुपधाद्यत्स्यात् / ण्यतो ऽपवादः / शप्यम् / लभ्यम् //

एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप् // लसक_७७९ = पा_३,१.१०९ //
एभ्यः क्यप् स्यात् //

ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् // लसक_७८० = पा_६,१.७१ //
इत्यः / स्तुत्यः / शासु अनुशिष्टौ //

शास इदङ्हलोः // लसक_७८१ = पा_६,४.३४ //
शास उपधाया इत्स्यादङि हलादौ क्ङिति / शिष्यः / वृत्यः / आदृत्यः / जुष्यः //

मृजेर्विभाषा // लसक_७८२ = पा_३,१.११३ //
मृजेः क्यब्वा / मृज्यः //

ऋहलोर्ण्यत् // लसक_७८३ = पा_३,१.१२४ //
ऋवर्णान्ताद्धलन्ताच्च धातोर्ण्यत् / कार्यम् / हार्यम् / धार्यम् //

चजोः कु घिण्ण्यतोः // लसक_७८४ = पा_७,३.५२ //
चजोः कुत्वं स्यात् घिति ण्यति च परे //

मृजेर्वृद्धिः // लसक_७८५ = पा_७,२.११४ //
मृजेरिको वृद्धिः सार्वधातुकार्धधातुकयोः / मार्ग्यः //

भोज्यं भक्ष्ये // लसक_७८६ = पा_७,६.६९ //
भोग्यमन्यत् //

इति कृत्यप्रक्रिया //

अथ पूर्वकृदन्तम्

ण्वुल्तृचौ // लसक_७८७ = पा_३,१.१३३ //
धातोरेतौ स्तः / कर्तरि कृदिति कर्त्रर्थे //

युवोरनाकौ // लसक_७८८ = पा_७,१.१ //
यु वु एतयोरनाकौ स्तः / कारकः / कर्ता //

नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः // लसक_७८९ = पा_३,१.१३४ //
नन्द्यादेर्ल्युः, ग्रह्यादेर्णिनिः, पचादेरच् स्यात् / नन्दयतीति नन्दनः / जनमर्दयतीति जनार्दनः / लवणः / ग्राही / स्थायी / मन्त्री / पचादिराकृतिगणः //

इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः // लसक_७९० = पा_३,१.१३५ //
एभ्यः कः स्यात् / बुधः / कृशः / ज्ञः / प्रियः / किरः //

आतश्चोपसर्गे // लसक_७९१ = पा_३,१.१३६ //
प्रज्ञः / सुग्लः //

गेहे कः // लसक_७९२ = पा_३,१.१४४ //
गेहे कर्तरि ग्रहेः कः स्यात् / गृहम् //

कर्मण्यण् // लसक_७९३ = पा_३,२.१ //
कर्मण्युपपदे धातोरण् प्रत्ययः स्यात् / कुम्भं करोतीति कुम्भकारः //

आतो ऽनुपसर्गे कः // लसक_७९४ = पा_३,२.३ //
आदन्ताद्धातोरनुपसर्गात्कर्मण्युपपदे कः स्यात् / अणो ऽपवादः / आतो लोप इटि च / गोदः / धनदः / कम्बलदः / अनुपसर्गे किम् ? गोसन्दायः / (वा.) मूलविभुजादिभ्यः कः / मूलानि विभुजति मूलविभुजो रथः / आकृतिगणो ऽयम् / महीध्रः / कुध्रः //

चरेष्टः // लसक_७९५ = पा_३,२.१६ //
अधिकरणे उपपदे / कुरुचरः //

भिक्षा सेनादायेषु च // लसक_७९६ = पा_३,२.१७ //
&न्ब्स्प्॑भिक्षाचारः / सेनाचारः / आदायेति ल्यबन्तम् / आदायचरः //

कृञो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु // लसक_७९७ = पा_३,२.२० //
एषु द्योत्येषु करोतेष्टः स्यात् //

अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य // लसक_७९८ = पा_८,३.४६ //
आदुत्तरस्यानव्ययस्य विसर्गस्य समासे नित्यं सादेशः करोत्यादिषु परेषु / यशस्करी विद्या / श्राद्धकरः / वचनकरः //

एजेः खश् // लसक_७९९ = पा_३,२.२८ //
ण्यन्तादेजेः खश् स्यात् //

अरुर्द्विषदजन्तस्य मुम् // लसक_८०० = पा_६,३.६७ //
अरुषो द्विषतो ऽजन्तस्य च मुमागमः स्यात्खिदन्ते परे न त्वव्ययस्य / शित्त्वाच्छबादिः / जनमेजयतीति जनमेजयः //

प्रियवशे वदः खच् // लसक_८०१ = पा_३,२.३८ //
प्रियंवदः / वशंवदः //

अन्येभ्यो ऽपि दृश्यन्ते // लसक_८०२ = पा_३,२.७५ //
मनिन् क्वनिप् वनिप् विच् एते प्रत्यया धातोः स्युः //

नेड्वशि कृति // लसक_८०३ = पा_७,२.८ //
वशादेः कृत इण् न स्यात् // शॄ हिंसायाम् // सुशर्मा प्रातरित्वा //

विड्वनोरनुनासिकस्याऽत् // लसक_८०४ = पा_६,४.४१ //
अनुनासिकस्याऽत्स्यात् / विजायत इति विजावा // ओणृ अपनयने // अवावा / विच् // रुष रिष हिंसायाम् // रोट् / रेट् / सुगण् //

क्विप् च // लसक_८०५ = पा_३,२.७६ //
अयमपि दृश्यते / उखास्रत् / पर्णध्वत् / बाहभ्रट् //

सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये // लसक_८०६ = पा_३,२.७८ //
अजात्यर्थे सुपि धातोर्णिनिस्ताच्छील्ये द्योत्ये / उष्णभोजी //

मनः // लसक_८०७ = पा_३,२.८२ //
सुपि मन्यतेर्णिनिः स्यात् / दर्शनीयमानी //

आत्ममाने खश्च // लसक_८०८ = पा_३,२.८३ //
स्वकर्मके मनने वर्त्तमानान्मन्यतेः सुपि खश् स्यात् चाण्णिनिः / पण्डितमात्मानं मन्यते पण्डितंमन्यः / पण्डितमानी //

खित्यनव्ययस्य // लसक_८०९ = पा_६,३.६६ //
खिदन्ते परे पूर्वपदस्य ह्रस्वः / ततो मुम् / कालिम्मन्या //

करणे यजः // लसक_८१० = पा_३,२.८५ //
करणे उपपदे भूतार्थे यजेर्णिनिः कर्तरि / सोमेनेष्टवान् सोमयाजी / अग्निष्टोमयाजी //

दृशेः क्वनिप् // लसक_८११ = पा_३,२.९४ //
कर्मणि भूते / पारं दृष्टवान् पारदृश्वा //

राजनि युधि कृञ // लसक_८१२ = पा_३,२.९५ //
क्वनिप्स्यात् / युधिरन्तर्भावितण्यर्थः / राजानं योधितवान् राजयुध्वा / राजकृत्वा //

सहे च // लसक_८१३ = पा_३,२.९६ //
कर्मणीति निवृत्तम् / सह योधितवान् सहयुध्वा / सहकृत्वा //

सप्तम्यां जनेर्डः // लसक_८१४ = पा_३,२.९७ //

तत्पुरुषे कृति बहुलम् // लसक_८१५ = पा_६,३.१४ //
ङेरलुक् / सरसिजम्, सरोजम् //

उपसर्गे च संज्ञायाम् // लसक_८१६ = पा_३,२.९९ //
प्रजा स्यात्संततौ जने //

क्तक्तवतू निष्ठा // लसक_८१७ = पा_१,१.२६ //
एतौ निष्ठासंज्ञौ स्तः //

निष्ठा // लसक_८१८ = पा_३,२.१०२ //
भूतार्थवृत्तेर्धातोर्निष्ठा स्यात् / तत्र तयोरेवेति भावकर्मणोः क्तः / कर्तरि कृदिति कर्तरि क्तवतुः / उकावितौ / स्नातं मया / स्तुतस्त्वया विष्णुः / विश्वं कृतवान् विष्णुः //

रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः // लसक_८१९ = पा_८,२.४२ //
&न्ब्स्प्॑रदाभ्यां परस्य निष्ठातस्य नः स्यात् निष्ठापेक्षया पूर्वस्य धातोर्दस्य च // शृ हिंसायाम् // ऋत इत् / रपरः / णत्वम् / शीर्णः / भिन्नः / छिन्नः //

संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः // लसक_८२० = पा_८,२.४३ //
निष्ठातस्य नः स्यात् / द्राणः / ग्लानः //

ल्वादिभ्यः // लसक_८२१ = पा_८,२.४४ //
एकविंशतेर्लूञादिभ्यः प्राग्वत् / लूनः // ज्या धातुः // ग्रहिज्येति संप्रसारणम् //

हलः // लसक_८२२ = पा_६,४.२ //
अङ्गावयवाद्धलः परं यत्संप्रसारणं तदन्तस्य दीर्घः / जीनः //

ओदितश्च // लसक_८२३ = पा_८,२.४५ //
भुजो भुग्नः / टुओश्वि, उच्छूनः //

शुषः कः // लसक_८२४ = पा_८,२.५१ //
निष्ठातस्य कः // शुष्कः //

पचो वः // लसक_८२५ = पा_८,२.५२ //
पक्वः // क्षै क्षये //

क्षायो मः // लसक_८२६ = पा_८,२.५३ //
क्षामः //

निष्ठायां सेटि // लसक_८२७ = पा_६,४.५२ //
णेर्लोपः / भावितः / भावितवान् / दृह हिंसायाम् //

दृढः स्थूलबलयोः // लसक_८२८ = पा_७,२.२० //
स्थूले बलवति च निपात्यते //

दधातेर्हिः // लसक_८२९ = पा_७,४.४२ //
&न्ब्स्प्॑तादौ किति / हितम् //

दो दद् घोः // लसक_८३० = पा_७,४.४६ //
घुसंज्ञकस्य दा इत्यस्य दथ् स्यात् तादौ किति / चर्त्वंम् / दत्तः //

लिटः कानज्वा // लसक_८३१ = पा_३,२.१०६ //

क्वसुश्च // लसक_८३२ = पा_३,२.१०७ //
लिटः कानच् क्वसुश्च वा स्तः / तङानावात्मनेपदम् / चक्राणः //

म्वोश्च // लसक_८३३ = पा_८,२.६५ //
मान्तस्य धातोर्नत्वं म्वोः परतः / जगन्वान् //

लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे // लसक_८३४ = पा_३,२.१२४ //
अप्रथमान्तेन समानाधिकरणे लट एतौ वा स्तः / शबादि / पचन्तं चैत्रं पश्य //

आने मुक् // लसक_८३५ = पा_७,२.८२ //
अदन्ताङ्गस्य मुगागमः स्यादाने परे / पचमानं चैत्रं पश्य / लडित्यनुवर्तमाने पुनर्लड्ग्रहणात् प्रथमासामानाधिकरण्ये ऽपि क्वचित् / सन् द्विजः //

विदेः शतुर्वसुः // लसक_८३६ = पा_७,१.३६ //
वेत्तेः परस्य शतुर्वसुरादेशो वा / विदन् / विद्वान् //

तौ सत् // लसक_८३७ = पा_३,२.१२७ //
तौ शतृशानचौ सत्संज्ञौ स्तः //

ऌटः सद्वा // लसक_८३८ = पा_३,३.१४ //
व्यवस्थितविभाषेयम् / तेनाप्रथमासामानाधिकरण्ये प्रत्योत्तरपदयोः संबोधने लक्षणहेत्वोश्च नित्यम् / करिष्यन्तं करिष्यमाणं पश्य //

आक्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु // लसक_८३९ = पा_३,२.१३४ //
क्विपमभिव्याप्य वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तच्छीलादिषु कर्तृषु बोध्याः //

तृन् // लसक_८४० = पा_३,२.१३४ //
कर्ता कटान् //

जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः षाकन् // लसक_८४१ = पा_३,२.१५५ //

षः प्रत्ययस्य // लसक_८४२ = पा_१,३.६ //
प्रत्ययस्यादिः ष इत्संज्ञः स्यात् / जल्पाकः / भिक्षाकः / कुट्टाकः / लुण्टाकः / वराकः / वराकी //

सनाशंसभिक्ष उः // लसक_८४३ = पा_३,२.१६८ //
चिकीर्षुः / आशंसुः / भिक्षुः //

भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपॄजुग्रावस्तुवः क्विप् // लसक_८४४ = पा_३,२.१७७ //
विभ्राट् / भाः //

राल्लोपः // लसक_८४५ = पा_६,४.२१ //
रेफाच्छ्वोर्लोपः क्वौ झलादौ क्ङिति / धूः / विद्युत् / ऊर्क / पूः / दृशिग्रहणस्यापकर्षाज्जवतेर्दीर्घः / जूः / ग्रावस्तुत् / (क्विब्वचिप्रच्छ्यायतस्तुकटप्रुजुश्रीणां दीर्घो ऽसम्प्रसारणं च) / वक्तीति वाक् //

च्छ्वोः शूडनुनासिके च // लसक_८४६ = पा_६,४.१९ //
सतुक्कस्य छस्य वस्य च क्रामात् श् ऊठ् इत्यादेशौ स्तो ऽनुनासिके क्वौ झलादौ च क्ङिति / पृच्छतीति प्राट् / आयतं स्तौतीति आयतस्तूः / कटं प्रवते कटप्रूः / जूरुक्तः / श्रयति हरिं श्रीः //

दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे // लसक_८४७ = पा_३,२.१८२ //
दाबादेः ष्ट्रन् स्यात्करणेर्ऽथे / दात्यनेन दात्रम् / नेत्रम् //

तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च // लसक_८४८ = पा_७,२.९ //
एषां दशानां कृत्प्रत्ययानामिण् न/ शस्त्रम् / योत्रम् / योक्त्रम् / स्तोत्रम् / तोत्त्रम् / सेत्रम् / सेक्त्रम् / मेढ्रम् / पत्रम् / दंष्ट्रा / नद्ध्री //

अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः // लसक_८४९ = पा_६,२.१८४ //
अरित्रम् / लवित्रम् / धुवित्रम् / सवित्रम् / खनित्रम् / सहित्रम् / चरित्रम् //

पुवः संज्ञायाम् // लसक_८५० = पा_३,२.१८५ // ॡEईट्Eऋ ष्. १३९
पवित्रम् //

इति पूर्वकृदन्तम् //


अथोणादयः

कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण् // १ //
करोतीति कारुः / वातीति वायुः / पायुर्गुदम् / जायुरौषधम् / मायुः पित्तम् / स्वादुः / साध्नोति परकार्यमिति साधुः / आशु शीघ्रम् //

उणादयो बहुलम् // लसक_८५१ = पा_३,३.१ //
&न्ब्स्प्॑ेते वर्तमाने संज्ञायाम् च बहुलं स्युः / केचिदविहिता अप्यूह्याः //
&न्ब्स्प्॑संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे /
&न्ब्स्प्॑कार्याद्विद्यादनूबन्धमेतच्छास्त्रमुणादिषु //

इत्युणादयः //

अथोत्तरकृदन्तम्

तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम् // लसक_८५२ = पा_३,३.१० //
क्रियार्थायां क्रियायामुपपदे भविष्यत्यर्थे धातोरेतौ स्तः / मान्तत्वादव्ययत्वम् / कृष्णं द्रष्टुं याति / कृष्णं दर्शको याति //

कालसमयवेलासु तुमुन् // लसक_८५३ = पा_३,३.१६७ //
कालार्थेषूपपदेषु तुमुन् / कालः समयो वेला वा भोक्तुम् //

भावे // लसक_८५४ = पा_३,३.१८ //
सिद्धावस्थापन्ने धात्वर्थे वाच्ये धातोर्घञ् / पाकः //

अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् // लसक_८५५ = पा_३,३.१९ //
कर्तृभिन्ने कारके घञ् स्यात् //

घञि च भावकरणयोः // लसक_८५६ = पा_६,४.२७ //
रञ्जेर्नलोपः स्यात् / रागः / अनयोः किम्? रज्यत्यस्मिन्निति रङ्गः //

निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च कः // लसक_८५७ = पा_३,३.४१ //
एषु चिनोतेर्घञ् आदेश्च ककारः / उपसमाधानं राशीकरणम् / निकायः / कायः/ गोमयनिकायः //

एरच् // लसक_८५८ = पा_३,३.४६ //
इवर्णान्तादच् / चयः / जयः //

ॠदोरप् // लसक_८५९ = पा_३,३.५७ //
ॠवर्णान्तादुवर्णान्ताच्चाप् / करः / गरः / यवः / लवः / स्तवः / पवः / (घञर्थे कविधानम्) / प्रस्थः / विघ्नः //

ड्वितः क्त्रिः // लसक_८६० = पा_३,३.८८ //

क्त्रेर्मम्नित्यम् // लसक_८६१ = पा_४,४.२० //
क्त्रिप्रत्ययान्तात्मप् निर्वृत्तेर्ऽथे / पाकेन निर्वृत्तं पक्त्रिमम् / डुवप् उप्त्रिमम् //

ट्वितो ऽथुच् // लसक_८६२ = पा_३,३.८९ //
टुवेपृ कम्पने, वेपथुः //

यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ् // लसक_८६३ = पा_३,३.९० //
यज्ञः / याच्ञा / यत्नः / विश्नः / प्रश्नः / रक्ष्णः //

स्वपो नन् // लसक_८६४ = पा_३,३.९१ //
स्वप्नः //

उपसर्गे घोः किः // लसक_८६५ = पा_३,३.९२ //
प्रधिः / उपधिः //

स्त्रियां क्तिन् // लसक_८६६ = पा_३,३.९४ //
स्त्रीलिङ्गे भावे क्तिन् स्यात् / घञो ऽपवादः / कृतिः / स्तुतिः / (ॠल्वादिभ्यः क्तिन्निष्ठावद्वाच्यः) / तेन नत्वम् / कीर्णिः / लूनिः / धूनिः / पूनिः / (संपदादिभ्यः क्विप्) / संपत् / विपत् / आपत् / (क्तिन्नपीष्यते) / संपत्तिः / विपत्तिः / आपत्तिः //

ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च // लसक_८६७ = पा_३,३.९७ //
एते निपात्यन्ते ///

ज्वरत्वरस्रिव्यविमवामुपधायाश्च // लसक_८६८ = पा_६,४.२० //
एषामुपधावकारयोरूठ् अनुनासिके क्वौ झलादौ क्ङिति // अतः क्विप् / जूः / तूः / स्रूः / ऊः / मूः //

इच्छा // लसक_८६९ = पा_३,३.१०१ //
इषेर्निपातो ऽयम् //

अ प्रत्ययात् // लसक_८७० = पा_३,३.१०२ //
प्रत्ययान्तेभ्यो धातुभ्यः स्त्रियामकारः प्रत्ययः स्यात् / चिकीर्षा / पुत्रकाम्या //

गुरोश्च हलः // लसक_८७१ = पा_३,३.१०३ //
गुरुमतो हलन्तात्स्त्रियामकारः प्रत्ययः स्यात् / ईहा //

ण्यासश्रन्थो युच् // लसक_८७२ = पा_३,३.१०७ //
अकारस्यापवादः / कारणा / हारणा //

नपुंसके भावे क्तः // लसक_८७३ = पा_३,३.११ //

ल्युट् च // लसक_८७४ = पा_३,३.११५ //
हसितम्, हसनम् //

पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण // लसक_८७५ = पा_३,३.१८८ //

छादेर्घे ऽद्व्युपसर्गस्य // लसक_८७६ = पा_६,४.९६ //
द्विप्रभृत्युपसर्गहीनस्य छादेर्ह्रस्वो घे परे / दन्ताश्छाद्यन्ते ऽनेनेति दन्तच्छदः / आकुर्वन्त्यस्मिन्नित्याकरः //

अवे तॄस्त्रोर्घञ् // लसक_८७७ = पा_३,३.१२० //
अवतारः कूपादेः / अवस्तारो जवनिका //

हलश्च // लसक_८७८ = पा_३,३.१२१ //
हलन्ताद्घञ् / घापवादः / रमन्ते योगिनो ऽस्मिन्निति रामः / अपमृज्यते ऽनेन व्याध्यादिरित्यपामार्गः //

ईषद्दुस्सुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् // लसक_८७९ = पा_३,३.१२६ //
करणाधिकरणयोरिति निवृत्तम् / एषु दुःखसुखार्थेषूपपदेषु खल् तयोरेवेति भावे कर्मणि च / कृच्छ्रे - दुष्करः कटो भवता / अकृच्छ्रे - ईषत्करः / सुकरः //

आतो युच् // लसक_८८० = पा_३,३.१२८ //
खलो ऽपवादः / ईषत्पानः सोमो भवता / दुष्पानः / सुपानः //

अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा // लसक_८८१ = पा_३,४.१८ //
प्रतिषेधार्थेयोरलंखल्वोरुपपदयोः क्त्वा स्यात् / प्राचां ग्रहणं पूजार्थम् / अमैवाव्ययेनेति नियमान्नोपपदसमासः / दो दद्घोः / अलं दत्त्वा / घुमास्थेतीत्त्वम् / पीत्वा खलु / अलंखल्वोः किम्? मा कार्षीत् / प्रतिषेधयोः किम्? अलंकारः //

समानकर्तृकयोः पूर्वकाले // लसक_८८२ = पा_३,४.२१ //
समानकर्तृकयोर्धात्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानाद्धातोः क्त्वा स्यात् / भुक्त्वा व्रजति / द्वित्वमतन्त्रम् / भुक्त्वा पीत्वा व्रजति //

न क्त्वा सेट् // लसक_८८३ = पा_१,२.१८ //
सेट् क्त्वा किन्न स्यात् / शयित्वा / सेट् किम् ? कृत्वा //

रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च // लसक_८८४ = पा_२,२.२६ //
इवर्णोवर्णोपधाद्धलादेः रलन्तात्परौ क्त्वासनौ सेटौ वा कितौ स्तः / द्युतित्वा, द्योतित्वा / लिखित्वा, लेखित्वा / व्युपधात्किम् ? वर्तित्वा / रलः किम् ? एषित्वा / सेट् किम् ? भुक्त्वा //

उदितो वा // लसक_८८५ = पा_७,२.५६ //
उदितः परस्य क्तव इड्वा / शमित्वा, शान्त्वा / देवित्वा, द्यूत्वा / दधातेर्हिः / हित्वा //

जहातेश्च क्त्वि // लसक_८८६ = पा_७,४.४३ //
हित्वा / हाङस्तु - हात्वा //

समासे ऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् // लसक_८८७ = पा_७,१.३७ //
अव्ययपूर्वपदे ऽनञ्समासे क्त्वो ल्यबादेशः स्यात् / तुक् / प्रकृत्य / अनञ् किम् ? अकृत्वा //

आभीक्ष्ण्ये णमुल् च // लसक_८८८ = पा_३,४.२२ //
आभीक्ष्ण्ये द्योत्ये पूर्वविषये णमुल् स्यात् क्त्वा च //

नित्यवीप्सयोः // लसक_८८९ = पा_८,१.४ //
आभीक्ष्ण्ये वीप्सायां च द्योत्ये पदस्य द्वित्वं स्यात् / आभीक्ष्ण्यं तिङन्तेष्वव्ययसंज्ञकेषु च कृदन्तेषु च / स्मारंस्मारं नमति शिवम् / स्मृत्वास्मृत्वा / पायम्पायम् / भोजम्भोजम् / श्रावंश्रावम् //

अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत् // लसक_८९० = पा_३,४.२७ //
एषु कृञो णमुल् स्यात् / सिद्धो ऽप्रयोगो ऽस्य एवम्भूतश्चेत् कृञ् / व्यर्थत्वात्प्रयोगानर्ह इत्यर्थः / अन्यथाकारम् / एवङ्कारम् / कथङ्कारम् / इत्थङ्कारं भुङ्क्ते / सिद्धेति किम् ? शिरो ऽन्यथा कृत्वा भुङ्क्ते //

इत्युत्तरकृदन्तम् //
इति कृदन्तम् //


अथ विभक्तयर्थाः


प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा // लसक_८९१ = पा_२,३.४६ //
नियतोपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः / मात्रशब्दस्य प्रत्येकं योगः / प्रातिपदिकार्थमात्रे लिङ्गमात्राद्याधिक्ये परिमाणमात्रे संख्यामात्रे च प्रथमा स्यात् / प्रातिपदिकार्थमात्रे - उच्चैः / नीचैः / कृष्णः / श्रीः / ज्ञानम् / लिङ्गमात्रे - तटः, तटी, तटम् / परिमाणमात्रे - द्रोणो व्रीहिः / वचनं संख्या / एकः, द्वौ, बहवः //

सम्बोधने च // लसक_८९२ = पा_२,३.४७ //
प्रथमा स्यात् / हे राम /
&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑िति प्रथमा /

कर्तुरीप्सिततमं कर्म // लसक_८९३ = पा_१,४.४९ //
कर्तुः क्रियया आप्तुमिष्टतमं कारकं कर्मसंज्ञं स्यात् //

कर्मणि द्वितीया // लसक_८९४ = पा_२,३.२ //
अनुक्ते कर्मणि द्वितीया स्यात् / हरिं भजति / अभिहिते तु कर्मादौ प्रथमा - हरिः सेव्यते / लक्ष्म्या सेवितः //

अकथितं च // लसक_८९५ = पा_१,४.५१ //
अपादानादिविशेषैरविवक्षितं कारकं कर्मसंज्ञं स्यात् /
&न्ब्स्प्॑दुह्याच्पच्दण्ड् रुधिप्रच्छिचिब्रूशासुजिमथ्मुषाम् /
&न्ब्स्प्॑कर्मयुक् स्यादकथितं तथा स्यान्नीहृकृष्वहाम् // १ //
गां दोग्धि पयः / बलिं याचते वसुधाम् / तण्डुलानोदनं पचति / गर्गान् शतं दण्डयति / व्रजमवरुणद्धि गाम् / माणवकं पन्थानं पृच्छति / वृक्षमवचिनोति फलानि / माणवकं धर्मं ब्रूते शास्ति वा / शतं जयति देवदत्तम् / सुधां क्षीरनिधिं मथ्नाति / देवदत्तं शतं मुष्णाति / ग्राममजां नयति हरति कर्षति वहति वा / अर्थनिबन्धनेयं संज्ञा / बलिं भिक्षते वसुधाम् / माणवकं धर्मं भाषते अभिवत्ते वक्तीत्यादि //
&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑िति द्वितीया /

स्वतन्त्रः कर्ता // लसक_८९६ = पा_१,४.५४ //
क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोर्ऽथः कर्ता स्यात् //

साधकतमं करणम् // लसक_८९७ = पा_१,४.४२ //
क्रियासिद्धौ प्रकृष्टोपकारकं करणसंज्ञं स्यात् //

कर्तृकरणयोस्तृतीया // लसक_८९८ = पा_२,३.२८ //
अनभिहिते कर्तरि करणे च तृतीया स्यात् / रामेण बाणेन हतो वाली//
&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑िति तृतीया /

कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् // लसक_८९९ = पा_१,४.३२ //
दानस्य कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानसंज्ञः स्यात् //

चतुर्थी सम्प्रदाने // लसक_९०० = पा_२,३.१३ //
विप्राय गां ददाति //

नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च // लसक_९०१ = पा_२,३.१६ //
एभिर्योगे चतुर्थी / हरये नमः / प्रजाभ्यः स्वस्ति / अग्नये स्वाहा / पितृभ्यः स्वधा / अलमिति पर्याप्त्यर्थग्रहणम् / तेन दैत्येभ्यो हरिरलं प्रभुः समर्थः शक्त इत्यादि //
&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑िति चतुर्थी /

ध्रुवमपाये ऽपादानम् // लसक_९०२ = पा_१,४.२४ //
अपायो विश्लेषस्तस्मिन्साध्ये यद् ध्रुवमवधिभूतं कारकं तदपादानं स्यात् //

अपादाने पञ्चमी // लसक_९०३ = पा_२,३.२८ //
ग्रामादायाति / धावतो ऽश्वात्पततीत्यादि //
&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑िति पञ्चमी /

षष्ठी शेषे // लसक_९०४ = पा_२,३.५० //
कारकप्रातिपदिकार्थव्यतिरिक्तः स्वस्वामिभावादिः संबन्धः शेषस्तत्र षष्ठी / राज्ञः पुरुषः / कर्मादीनापि संबन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव / सतां गतम् / सर्पिषो जानीते / मातुः स्मरति / एधोदकस्योपस्कुरुते / भजे शम्भोश्चरणयोः //
&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑िति षष्ठी /

आधारो ऽधिकरणम् // लसक_९०५ = पा_१,४.४५ //
कर्तृकर्मद्वारा तन्निष्ठक्रियाया आधारः कारकमधिकरणं स्यात् //

सप्तम्यधिकरणे च // लसक_९०६ = पा_२,३.३६ //
अधिकरणे सप्तमी स्यात्, चकाराद्दूरान्तिकार्थेभ्यः / औपश्लेषिको वैषयिको &८२१७॑ भिव्यापकश्चेत्याधारस्त्रिधा / कटे आस्ते / स्थाल्यां पचति / मोक्षे इच्छास्ति / सर्वस्मिन्नात्मास्ति / वनस्य दूरे अन्तिके वा //
&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑&न्ब्स्प्॑िति सप्तमी /
इति विभक्त्यर्थाः //

अथ समासाः

तत्रादौ केवलसमासः / समासः पञ्चधा / तत्र समसनं समासः / स च विशेषसंज्ञा विनिर्मुक्तः केवलसमासः प्रथमः // १ // प्रायेण पूर्वपदार्थप्रधानो ऽव्ययीभावो द्वितीयः // २ // प्रायेणोत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषस्तृतीयः // तत्पुरुषभेदः कर्मधारयः / कर्मधारयभेदो द्विगुः // ३ // प्रायेणान्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिश्चतुर्थः // ४ // प्रायेणोभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः पञ्चमः // ५ //

समर्थः पदविधिः // लसक_९०७ = पा_२,१.१ //
पदसंबन्धी यो विधिः स समर्थाश्रितो बोध्यः //

प्राक्कडारात्समासः // लसक_९०८ = पा_२,१.३ //
कडाराः कर्मधारय इत्यतः प्राक् समास इत्यधिक्रियते //

सह सुपा // लसक_९०९ = पा_२,१.४ //
सुप् सुपा सह वा समस्यते // समासत्वात्प्रातिपदिकत्वेन सुपो लुक् / परार्थाभिधानं वृत्तिः / कृत्तद्धितसमासैकशेषसनाद्यन्तधातुरूपाः पञ्च वृत्तयः / वृत्त्यर्थावबोधकं वाक्यं विग्रहः / सच लौकिको ऽलौकिकश्चेति द्विधा / तत्र पूर्वं भूत इति लौकिकः "पूर्व अम् भूत सु&८२१७॑ इत्यलौकिकः / भूतपूर्वः / भूतपूर्वे चरडिति निर्देशात्पूर्वनिपातः / (इवेन समासो विभक्त्यलोपश्च) / वागर्थौ इव वागर्थाविव //

इति केवलसमासः // १ //

अथाव्ययीभावः

अव्ययीभावः // लसक_९१० = पा_२,१.५ //
अधिकारो ऽयं प्राक् तत्पुरुषात् //

अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासंप्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथानुपूर्व्ययौगपद्यसादृश्यसम्पत्तिसाकल्यान्त वचनेषु // लसक_९११ = पा_२,१.६ //
विभक्त्यर्थादिषु वर्तमानमव्ययं सुबन्तेन सह नित्यं समस्यते सो ऽव्ययीभावः / प्रायेणाविग्रहो नित्यसमासः, प्रायेणास्वपदविग्रहो वा / विभक्तौ, हरि ङि अधि इति स्थिते //

प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् // लसक_९१२ = पा_१,२.४३ //
समासशास्त्रे प्रथमानिर्दिष्टमुपसर्जनसंज्ञं स्यात् //

उपसर्जनं पूर्वम् // लसक_९१३ = पा_२,२.३० //
समासे उपसर्जनं प्राक्प्रयोज्यम् / इत्यधेः प्राक् प्रयोगः / सुपो लुक् / एकदेशविकृतस्यानन्यत्वात्प्रातिपदिकसंज्ञायां स्वाद्युत्पत्तिः / अव्ययीभावश्चेत्य व्ययत्वात्सुपो लुक् / अधिहरि //

अव्ययीभावश्च // लसक_९१४ = पा_२,४.१८ //
अयं नपुंसकं स्यात् //

नाव्ययीभावादतो ऽम्त्वपञ्चम्याः // लसक_९१५ = पा_२,४.८३ //
अदन्तादव्ययीभावात्सुपो न लुक्, तस्य पञ्चमी विना अमादेशश्च स्यात् // गाः पातीति गोपास्तस्मिन्नित्यधिगोपम् //

तृतीयासप्तम्योर्बहुलम् // लसक_९१६ = पा_२,४.५४ //
अदन्तादव्ययीभावात्तृतीयासप्तम्योर्बहुलमम्भावः स्यात् / अधिगोपम्, अधिगोपेन, अधिगोपे वा / कृष्णस्य समीपम् उपकृष्णम् / मद्राणां समृद्धिः सुमद्रम् / यवनानां व्यृद्धिर्दुर्यवनम् / मक्षिकाणामभावो निर्मक्षिकम् / हिमस्यात्ययो ऽतिहिमम् / निद्रा संप्रति न युज्यत इत्यतिनिद्रम् / हरिशब्दस्य प्रकाश इतिहरि / विष्णोः पश्चादनुविष्णु / योग्यतावीप्सापदार्थानतिवृत्तिसादृश्यानि यथार्थाः / रूपस्य योग्यमनुरूपम् / अर्थमर्थं प्रति प्रर्त्षथम् / शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति //

अव्ययीभावे चाकाले // लसक_९१७ = पा_६,३.८१ //
सहस्य सः स्यादव्ययीभावे न तु काले / हरेः सादृश्यं सहरि / ज्येष्ठस्यानु पूर्व्येणेत्यनुज्येष्ठम् / चक्रेण युगपत् सचक्रम् / सदृशः सख्या ससखि / क्षत्राणां संपत्तिः सक्षत्रम् / तृणमप्यपरित्यज्य सतृणमत्ति / अग्निग्रन्थपर्यन्तमधीते साग्नि //

नदीभिश्च // लसक_९१८ = पा_२,१.२० //
नदीभिः सह संख्या समस्यते / (समाहारे चायमिष्यते) / पञ्चगङ्गम् / द्वियमुनम् //

तद्धिताः // लसक_९१९ = पा_४,१.७६ //
आपञ्चमसमाप्तेरधिकारो ऽयम् //

अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः // लसक_९२० = पा_५,४.१०७ //
शरदादिभ्यष्टच् स्यात्समासान्तो ऽव्ययीभावे / शरदः समीपमुपशरदम् / प्रतिविपाशम् / (जराया जरश्च) / उपजरसमित्यादि //

अनश्च // लसक_९२१ = पा_५,४.१०८ //
अन्नन्तादव्ययीभावाट्टच् स्यात् //

नस्तद्धिते // लसक_९२२ = पा_६,४.१४४ //
नान्तस्य भस्य टेर्लोपस्तद्धिते / उपराजम् / अध्यात्मम् //

नपुंसकादन्यतरस्याम् // लसक_९२३ = पा_५,४.१०९ //
अन्नन्तं यत् क्लीबं तदन्तादव्ययीभावाट्टज्वा स्यात् / उपचर्मम् / उपचर्म //

झयः // लसक_९२४ = पा_५,४.१११ //
झयन्तादव्ययीभावाट्टज्वा&न्ब्स्प्॑स्यात् / उपसमिधम् / उपसमित् //

इत्यव्ययीभावः // २ //

अथ तत्पुरुषः

तत्पुरुषः // लसक_९२५ = पा_२,१.२२ //
अधिकारो ऽयं प्राग्बहुव्रीहेः //

द्विगुश्च // लसक_९२६ = पा_२,१.२३ //
द्विगुरपि तत्पुरुषसंज्ञकः स्यात् //

द्वितीयाश्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः // लसक_९२७ = पा_२,१.२४ //
द्वितीयान्तं श्रितादिप्रकृतिकैः सुबन्तैः सह वा समस्यते स च तत्पुरुषः / कृष्णं श्रितः कृष्णश्रित इत्यादि //

तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन // लसक_९२८ = पा_२,१.३० //
तृतीयान्तं तृतीयान्तार्थकृतगुणवचनेनार्थेन च सह वा प्राग्वत् / शङ्कुलया खण्डः / धान्येनार्थो धान्यार्थः / तत्कृतेति किम् ? अक्ष्णा काणः //

कर्तृकरणे कृता बहुलम् // लसक_९२९ = पा_२,१.३२ //
कर्तरि करणे च तृतीया कृदन्तेन बहुलं प्राग्वत् / हरिणा त्रातो हरित्रातः / नखैर्भिन्नः नखभिन्नः / (प.) कृद्ग्रहणे गतिकारकपूर्वस्यापि ग्रहणम् / नखनिर्भिन्नः //

चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः // लसक_९३० = पा_२,१.३६ //
चतुर्थ्यन्तार्थाय यत् तद्वाचिना अर्थादिभिश्च चतुर्थ्यंन्तं वा प्राग्वत् / यूपाय दारु यूपदारु / (तदर्थेन प्रकृतिविकृतिभाव एवेष्टः) / तेनेह न - रन्धनाय स्थाली / (अर्थेन नित्यसमासो विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्यम्) / द्विजार्थः सूपः / द्विजार्था यवागूः / द्विजार्थं पयः / भूतबलिः / गोहितम् / गोसुखम् / गोरक्षितम् //

पञ्चमी भयेन // लसक_९३१ = पा_२,१.३७ //
चोराद्भयं चोरभयम् //

स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन // लसक_९३२ = पा_२,१.३९ //

पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः // लसक_९३३ = पा_६,३.२ //
अलुगुत्तरपदे / स्तोकान्मुक्तः / अन्तिकादागतः / अभ्याशादागतः / दूरादागतः / कृच्छ्रादागतः //

षष्ठी // लसक_९३४ = पा_२,२.८ //
सुबन्तेन प्राग्वत् / राजपुरुषः //

पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे // लसक_९३५ = पा_२,२.१ //
अवयविना सह पूर्वादयः समस्यन्ते एकत्वसंख्याविशिष्टश्चेदवयवी / षष्ठीसमासापवादः / पूर्वं कायस्य पूर्वकायः / अपरकायः / एकाधिकरणे किम् ? पूर्वश्छात्राणाम् //

अर्धं नपुंसकम् // लसक_९३६ = पा_२,२.२ //
समांशवाच्यर्धशब्दो नित्यं क्लीबे, स प्राग्वत् / अर्धं पिप्पल्याः अर्धपिप्पली /

सप्तमी शौण्डैः // लसक_९३७ = पा_२,१.४० //
सप्तम्यन्तं शौण्डादिभिः प्राग्वत् / अक्षेषु शौण्डः अक्षशोण्ड इत्यादि / द्वितीयातृतीयेत्यादियोगविभागादन्यत्रापि तृतीयादिविभक्तीनां प्रयोगवशात्समासो ज्ञेयः //

दिक्संख्ये संज्ञायाम् // लसक_९३८ = पा_२,१.५० //
संज्ञायामेवेति नियमार्थं सूत्रम् / पूर्वेषुकामशमी / सप्तर्षयः / तेनेह न - उत्तरा वृक्षाः / पञ्च ब्राह्मणाः //

तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च // लसक_९३९ = पा_२,१.५१ //
तद्धितार्थे विषये उत्तरपदे च परतः समाहारे च वाच्ये दिक्संख्ये प्राग्वत् / पूर्वस्यां शालायां भवः - पूर्वा शाला इति समासे जाते (सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भावः) //

दिक्पूर्वपदादसंज्ञायां ञः // लसक_९४० = पा_४,२.१०७ //
अस्माद्भवाद्यर्थे ञः स्यादसंज्ञायाम् //

तद्धितेष्वचामादेः // लसक_९४१ = पा_७,२.११७ //
ञिति णिति च तद्धितेष्वचामादेरचो वृद्धिः स्यात् / यस्येति च / पौर्वशालः / पञ्च गावो धनं यस्येति त्रिपदे बहुव्रीहौ / (द्वन्द्वतत्पुरुषयोरुत्तरपदे नित्य समासवचनम्) //

गोरतद्धितलुकि // लसक_९४२ = पा_५,४.९२ //
गो ऽन्तात्तत्पुरुषाट्टच् स्यात् समासान्तो न तु तद्धितलुकि / पञ्चगवधनः //

तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः // लसक_९४३ = पा_१,२.४२ //

संख्यापूर्वो द्विगुः // लसक_९४४ = पा_२,१.५२ //
तद्धितार्थेत्यत्रोक्तस्त्रिविधः संख्यापूर्वो द्विगुसंज्ञः स्यात् //

द्विगुरेकवचनम् // लसक_९४५ = पा_२,४.१ //
द्विग्वर्थः समाहार एकवत्स्यात् //

स नपुंसकम् // लसक_९४६ = पा_२,४.१७ //
समाहारे द्विगुर्द्वन्द्वश्च नपुंसकं स्यात् / पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम् /

विशेषणं विशेष्येण बहुलम् // लसक_९४७ = पा_२,१.५७ //
भेदकं भेद्येन समानाधिकरणेन बहुलं प्राग्वत् / नीलमुत्पलं नीलोत्पलम् / बहुलग्रहणात्क्वचिन्नित्यम् - कृष्णसर्पः / क्वचिन्न - रामो जामदग्न्यः //

उपमानानि सामान्यवचनैः // लसक_९४८ = पा_२,१.५५ //
घन इव श्यामो घनश्यामः / (शाकपार्थिवादीनां सिद्धये उत्तरपदलोपस्योपसंख्यानम्) / शाकप्रियः पार्थिवः शाकपार्थिवः / देवपूजको ब्राह्मणो देवब्राह्मणः //

नञ् // लसक_९४९ = पा_२,१.६ //
नञ् सुपा सह समस्यते //

नलोपो नञः // लसक_९५० = पा_६,३.७३ //
नञो नस्य लोप उत्तरपदे / न ब्राह्मणः अब्राह्मणः //

तस्मान्नुडचि // लसक_९५१ = पा_६,३.७४ //
लुप्तनकारान्नञ उत्तरपदस्याजादेर्नुडागमः स्यात् / अनश्वः / नैकधेत्यादौ तु नशब्देन सह सुप्सुपेति समासः //

कुगतिप्रादयः // लसक_९५२ = पा_२,२.१८ //
एते समर्थेन नित्यं समस्यन्ते / कुत्सितः पुरुषः कुपुरुषः //

ऊर्यादिच्विडाचश्च // लसक_९५३ = पा_१,४.६१ //
ऊर्यादयश्च्व्यन्ता डाजन्ताश्च क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः / ऊरीकृत्य / शुक्लीकृत्य / पटपटाकृत्य / सुपुरुषः // (प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया) / प्रगत आचार्यः प्राचार्यः / (अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया) / अतिक्रान्तो मालामिति विग्रहे - .

एकविभक्ति चापूर्वनिपाते // लसक_९५४ = पा_१,२.४४ //
विग्रहे यन्नियतविभक्तिकं तदुपसर्जनसंज्ञं स्यान्न तु तस्य पूर्वनिपातः //

गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य // लसक_९५५ = पा_१,२.४८ //
उपसर्जनं यो गोशब्दः स्त्रीप्रत्ययान्तं च तदन्तस्य प्रातिपदिकस्य ह्रस्वः स्यात् / अतिमालः / (अवादयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया) / अवक्रुष्टः कोकिलया - अवकोकिलः / (पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्या) / परिग्लानो ऽध्ययनाय पर्यध्ययनः / (निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या) / निष्क्रान्तः कौशाम्ब्याः - निष्कौशाम्बिः //

तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् // लसक_९५६ = पा_३,१.९२ //
सप्तम्यन्ते पदे कर्मणीत्यादौ वाच्यत्वेन स्थितं यत्कुम्भादि तद्वाचकं पदमुपपदसंज्ञं स्यात् //

उपपदमदिङ् // लसक_९५७ = पा_२,२.१९ //
उपपदं सुबन्तं समर्थेन नित्यं समस्यते / अतिङन्तश्चायं समासः / कुम्भम् करोति कुम्भकारः / अतिङ् किम् ? मा भवान् भूत् / माङि लुङिति सप्तमीनिर्देशान्माङुपपदम् / (प.) गतिकारकोपपदानां कृद्भिः सह समासवचनं प्राक् सुबुत्पत्तेः / व्याघ्री / अश्वक्रीती / कच्छपीत्यादि //

तत्पुरुषस्याङ्गुलेः संख्याव्ययादेः // लसक_९५८ = पा_५,४.८६ //
संख्याव्ययादेरङ्गुल्यन्तस्य समासान्तो ऽच् स्यात् / द्वे अङ्गुली प्रमाणमस्य द्व्यङ्गुलम् / निर्गतमङ्गुल्यो निरङ्गुलम् //

अहःसर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः // लसक_९५९ = पा_५,४.८७ //
एभ्यो रात्रेरच् स्याच्चात्संख्याव्ययादेः / अहर्ग्रहणं द्वन्द्वार्थम् //

रात्राह्नाहाः पुंसि // लसक_९६० = पा_२,४.२९ //
एतदन्तौ द्वन्द्वतत्पुरुषौ पुंस्येव / अहश्च रात्रिश्चाहोरात्रः / सर्वरात्रः / संख्यातरात्रः / (संख्यापूर्वं रात्रं क्लीबम्) / द्विरात्रम् / त्रिरात्रम् //

राजाहः सखिभ्यष्टच् // लसक_९६१ = पा_५,४.९१ //
एतदन्तात्तत्पुरुषाट्टच् स्यात् / परमराजः //

आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः // लसक_९६२ = पा_६,३.४६ //
महत आकारो ऽन्तादेशः स्यात्समानाधिकरणे उत्तरपदे जातीये च परे / महाराजः / प्रकारवचने जातीयर् / महाप्रकारो महाजातीयः //

द्व्यष्टनः संख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः // लसक_९६३ = पा_६,३.४७ //
आत्स्यात् / द्वौ च दश च द्वादश / अष्टाविंशतिः //

त्रेस्त्रयः // लसक_९६४ = पा_६,३.४८ //
त्रयोदश / त्रयोविंशतिः / त्रयस्त्रिंशत् //

परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः // लसक_९६५ = पा_२,४.२६ //
एतयोः परपदस्येव लिङ्गं स्यात् / कुक्कुटमयूर्याविमे / मयूरीकुक्कुटाविमौ / (द्विगुप्राप्तापन्नालम्पूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः) / पञ्चसु कपालेषु संस्कृतः पञ्चकपालः पुरोडाशः //

प्राप्तापन्ने च द्वितीयया // लसक_९६६ = पा_२,२.४ //
समस्येते / अकारश्चानयोरन्तादेशः / प्राप्तो जीविकां प्राप्तजीविकः / आपन्नजीविकः / अलं कुमार्यै - अलंकुमारिः / अत एव ज्ञापकात्समासः / निष्कौशाम्बिः //

अर्धर्चाः पुंसि च // लसक_९६७ = पा_२,४.३१ //
&न्ब्स्प्॑र्धर्चादयः शब्दाः पुंसि क्लीबे च स्युः / अर्धर्चः / अर्धर्चम् / एवं ध्वजतीर्थशरीरमण्डपयूपदेहाङ्कुशपात्रसूत्रादयः / सामान्ये नपुंसकम् / मृदु पचति / प्रातः कमनीयम् //

इति तत्पुरुषः // ३ //

अथ बहुव्रीहिः

शेषो बहुव्रीहिः // लसक_९६८ = पा_२,२.२३ //
अधिकारो ऽयं प्राग्द्वन्द्वात् //

अनेकमन्यपदार्थे // लसक_९६९ = पा_२,२.२४ //
अनेकं प्रथमान्तमन्यस्य पदस्यार्थे वर्तमानं वा समस्यते स बहुव्रीहिः //

सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ // लसक_९७० = पा_२,२.३५ //
सप्तम्यन्तं विशेषणं च बहुव्रीहौ पूर्वं स्यात् / अत एव ज्ञापकाद्व्यधिकरणपदो बहुव्रीहिः //

हलन्तात्सप्तम्याः संज्ञायाम् // लसक_९७१ = पा_६,३.९ //
हलन्ताददन्ताच्च सप्तम्या अलुक् / कण्ठेकालः / प्राप्तमुदकं यं स प्राप्तोदको ग्रामः / ऊढरथो ऽनड्वान् / उपहृतपशू रुद्रः / उद्धृतौदना स्थाली / पीताम्बरो हरिः / वीरपुरुषको ग्रामः / (प्रादिभ्यो धातुजस्य वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः) / प्रपतितपर्णः, प्रपर्णः / (नञो ऽस्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः) अविद्यमानपुत्रः, अपुत्रः //

स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ्समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु // लसक_९७२ = पा_६,३.३४ //
उक्तपुंस्कादनूङ् ऊङोऽभावो ऽस्यामिति बहुव्रीहिः / निपातनात्पञ्चम्या अलुक् षष्ठ्याश्च लुक् / तुल्ये प्रवृत्तिनिमित्ते यदुक्तपुंस्कं तस्मात्पर ऊङोऽभावो यत्र तथाभूतस्य स्त्रीवाचकशब्दस्य पुंवाचकस्येव रूपं स्यात् समानाधिकरणे स्त्रीलिङ्गे उत्तरपदे न तु पूरण्यां प्रियादौ च परतः / गोस्त्रियोरिति ह्रस्वः / चित्रगुः / रूपवद्भार्यः / अनूङ् किम् ? वामोरूभार्यः // पूरण्यां तु - .

अप्पूरणीप्रमाण्योः // लसक_९७३ = पा_५,४.११६ //
पूरणार्थप्रत्ययान्तं यत्स्त्रीलिङ्गं तदन्तात्प्रमाण्यन्ताच्च बहुव्रीहे रप्स्यात् / कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणां ताः कल्याणी पञ्चमा रात्रयः / स्त्री प्रमाणी यस्य स स्त्रीप्रमाणः / अप्रियादिषु किम् ? कल्याणीप्रिय इत्यादि //

बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात्षच् // लसक_९७४ = पा_५,४.११३ //
स्वाङ्गवाचिसक्थ्यक्ष्यन्ताद्बहुव्रीहेः षच् स्यात् / दीर्घसक्थः / जलजाक्षी / स्वाङ्गात्किम् ? दीर्घसक्थि शकटम् / स्थूलाक्षा वेणुयष्टिः / अक्ष्णो ऽदर्शनादिति वक्ष्यमाणो ऽच् //

द्वित्रिभ्यां ष मूर्ध्नः // लसक_९७५ = पा_५,४.११५ //
आभ्यां मूर्ध्नः षः स्याद्बहुव्रीहौ / द्विमूर्धः / त्रिमूर्धः //

अन्तर्बहिभ्यां च लोम्नः // लसक_९७६ = पा_५,४.११७ //
आभ्यां लोम्नो ऽप्स्याद्बहुव्रीहौ / अन्तर्लोमः / बहिर्लोमः //

पादस्य लोपो ऽहस्त्यादिभ्यः // लसक_९७७ = पा_५,४.१३८ //
हस्त्यादिवर्जितादुपमानात्परस्य पादशब्दस्य लोपः स्याद्बहुव्रीहौ / व्याघ्रस्येव पादावस्य व्याघ्रपात् / अहस्त्यादिभ्यः किम् ? हस्तिपादः / कुसूलपादः //

संख्यासुपूर्वस्य // लसक_९७८ = पा_५,४.१४० //
पादस्य लोपः स्यात्समासान्तो बहुव्रीहौ / द्विपात् / सुपात् //

उद्विभ्यां काकुदस्य // लसक_९७९ = पा_५,४.१४८ //
लोपः स्यात् / उत्काकुत् / विकाकुत् //

पूर्णाद्विभाषा // लसक_९८० = पा_५,४.१४९ //
पूर्णकाकुत् / पूर्णकाकुदः //

सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः // लसक_९८१ = पा_५,४.१५० //
सुदुर्भ्यां हृदयस्य हृद्भावो निपात्यते / सुहृन्मित्रम् / दुर्हृदमित्रः //

उरः प्रभृतिभ्यः कप् // लसक_९८२ = पा_५,४.१५१ //

सो ऽपदादौ // लसक_९८३ = पा_८,३.३८ //
पाशकल्पककाम्येषु विसर्गस्य सः //

कस्कादिषु च // लसक_९८४ = पा_८,३.४८ //
एष्विण उत्तरस्य विसर्गस्य षो ऽन्यस्य तु सः / इति सः / व्यूढोरस्कः //

इणः षः // लसक_९८५ = पा_८,३.३९ //
इण उत्तरस्य विसर्गस्य षः पाशकल्पककाम्येषु परेषु / प्रियसर्पिष्कः //

निष्ठा // लसक_९८६ = पा_२,२.३६ //
निष्ठान्तं बहुव्रीहौ पूर्वं स्यात् / युक्तयोगः //

शेषाद्विभाषा // लसक_९८७ = पा_५,४.१५४ //
अनुक्तसमासान्ताद्बहुव्रीहेः कब्वा / महायशस्कः, महायशाः //

इति बहुव्रीहिः // ४ //

अथ द्वन्द्वः

चार्थे द्वन्द्वः // लसक_९८८ = पा_२,२.२९ //
अनेकं सुबन्तं चार्थे वर्तमानं वा समस्यते स द्वन्द्वः / समुच्चयान्वाचयेत रेतरयोगसमाहाराश्चार्थाः / तत्र "ईश्वरं गुरुं च भजस्व&८२१७॑ इति परस्परनिरपेक्षस्यानेक स्यैकस्मिन्नन्वयः समुच्चयः / "भिक्षामट गां चानय&८२१७॑ इत्यन्यतरस्यानुषङ्गिकत्वेन अन्वयो ऽन्वाचयः / अनयोरसामर्थ्यात्समासो न / "धवखदिरौ छिन्धि&८२१७॑ इति मिलितानामन्वय इतरेतरयोगः / "संज्ञापरिभाषम्&८२१७॑ इति समूहः समाहारः //

राजदन्तादिषु परम् // लसक_९८९ = पा_२,२.३१ //
एषु पूर्वप्रयोगार्हं परं स्यात् / दन्तानां राजानो राजदन्ताः / (धर्मादिष्वनियमः) / अर्थधर्मौ / धर्मार्थावित्यादि //

द्वन्द्वे घि // लसक_९९० = पा_२,२.३२ //
द्वन्द्वे घिसंज्ञं पूर्वं स्यात् / हरिश्च हरश्च हरिहरौ //

अजाद्यदन्तम् // लसक_९९१ = पा_२,२.३३ //
द्वन्द्वे पूर्वं स्यात् / ईशकृष्णौ //

अल्पाच्तरम् // लसक_९९२ = पा_२,२.३४ //
शिवकेशवौ //

पिता मात्रा // लसक_९९३ = पा_१,२.७० //
मात्रा सहोक्तौ पिता वा शिष्यते / माता च पिता च पितरौ, मातापितरौ वा //

द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् // लसक_९९४ = पा_२,४.२ //
एषां द्वन्द्व एकवत् / पाणिपादम् / मार्दङ्गिकवैणविकम् / रथिकाश्वारोहम् //

द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात्समाहारे // लसक_९९५ = पा_५,४.१०६ //
चवर्गान्ताद्दषहान्ताच्च द्वन्द्वाट्टच् स्यात्समाहारे / वाक् च त्वक् च वाक्त्वचम् / त्वक्स्रजम् / शमीदृषदम् / वाक्त्विषम् / छत्रोपानहम् / समाहारे किम् ? प्रावृट्शरदौ //

इति द्वन्द्वः // ५ //

अथ समासान्ताः

ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे // लसक_९९६ = पा_५,४.७४ //
अ अनक्षे इतिच्छेदः / ऋगाद्यन्तस्य समासस्य अप्रत्ययो ऽन्तावयवो ऽक्षे या धूस्तदन्तस्य तु न / अर्धर्चः / विष्णुपुरम् / विमलापं सरः / राजधुरा / अक्षे तु अक्षधूः / दृढधूरक्षः / सखिपथः / रम्यपथो देशः //

अक्ष्णो ऽदर्शनात् // लसक_९९७ = पा_५,४.७६ //
अचक्षुःपर्यायादक्ष्णो ऽच् स्यात्समासान्तः / "गवामक्षीव गवाक्षः&८२१७॑ //

उपसर्गादध्वनः // लसक_९९८ = पा_५,४.८५ //
प्रगतो ऽध्वानं प्राध्वो रथः //

न पूजनात् // लसक_९९९ = पा_५,४.६९ //
पूजनार्थात्परेभ्यः समासान्ता न स्युः / सुराजा / अतिराजा //

इति समासान्ताः //

अथ तद्धिताः, तत्रादौ साधारणप्रत्ययाः

समर्थानां प्रथमाद्वा // लसक_१००० = पा_४,१.८२ //
इदं पदत्रयमधिक्रियते प्राग्दिश इति यावत् //

अश्वपत्यादिभ्यश्च // लसक_१००१ = पा_४,१.८४ //
एभ्यो ऽण् स्यात्प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु / अश्वपतेरपत्यादि आश्वपतम् / गाणपतम् //

दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्ण्यः // लसक_१००२ = पा_७,२.११७ //
दित्यादिभ्यः पत्युततरपदाच्च प्राग्दीव्यतियेष्वर्थेषु ण्यः स्यात् / अणो ऽपवादः / दितेरपत्यं दैत्यः / अदितेरादित्यस्य वा //

हलो यमां यमि लोपः // लसक_१००३ = पा_४,१.८५ //
हलः परस्य यमो लोपः स्याद् वा यमि / इति यलोपः / आदित्यः / प्राजापत्यः / (देवाद्यञञौ) / दैव्यम्/ दैवम् / (बहिषष्टिलोपो यञ्च) / बाह्यः (ईकक्च) //

किति च // लसक_१००४ = पा_७,२.११८ //
किति तद्धिते चाचामादेरचो वृद्धिः स्यात् / वाहीकः / (गोरजादिप्रसङ्गे यत्) / गोरपत्यादि गव्यम् //

उत्सादिभ्यो ऽञ् // लसक_१००५ = पा_४,१.८६ //
औत्सः //

इत्यपत्यादिविकारान्तार्थ साधारणप्रत्ययाः // १ //

अथापत्याधिकारः

स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात् // लसक_१००६ = पा_४,१.८७ //
धान्यानां भवन इत्यतः प्रागर्थेषु स्त्रीपुंसाभ्यां क्रमान्नञ्स्नञौ स्तः / स्त्रैणः / पैंस्नः //

तस्यापत्यम् // लसक_१००७ = पा_४,१.९२ //
षष्ठ्यन्तात्कृतसन्धेः समर्थादपत्येर्ऽथे उक्ता वक्ष्यमाणाश्च प्रत्यया वा स्युः //

ओर्गुणः // लसक_१००८ = पा_६,४.१४६ //
उवर्णान्तस्य भस्य गुणस्तद्धिते / उपगोरपत्यमौपगवः / आश्वपतः / दैत्यः / औत्सः / स्त्रैणः / पैंस्नः //

अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् // लसक_१००९ = पा_४,१.१६२ //
अपत्यत्वेन विवक्षितं पौत्रादि गोत्रसंज्ञं स्यात् //

एको गोत्रे // लसक_१०१० = पा_४,१.९३ //
गोत्रे एक एवापत्यप्रत्ययः स्यात् / उपगोर्गोत्रापत्यमौपगवः //

गर्गादिभ्यो यञ् // लसक_१०११ = पा_४,१.१०५ //
गोत्रापत्ये / गर्गस्य गोत्रापत्यं गार्ग्यः / वात्स्यः //

यञञोश्च // लसक_१०१२ = पा_२,४.६४ //
गोत्रे यद्यञन्तमञन्तं च तदवयवयोरेतयोर्लुक् स्यात्तत्कृते बहुत्वे न तु स्त्रियाम् / गर्गाः / वत्साः //

जीवति तु वंश्ये युवा // लसक_१०१३ = पा_४,१.१६३ //
वंश्ये पित्रादौ जीवति पौत्रादेर्यदपत्यं चतुर्थादि तद्युवसंज्ञमेव स्यात् //

गोत्राद्यून्यस्त्रियाम् // लसक_१०१४ = पा_४,१.९४ //
यून्यपत्ये गोत्रप्रत्ययान्तादेव प्रत्ययः स्यात्, स्त्रियां तु न युवसंज्ञा //

यञिञोश्च // लसक_१०१५ = पा_४,१.१०१ //
गोत्रे यौ यञिञौ तदन्तात्फक् स्यात् //

आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् // लसक_१०१६ = पा_७,१.२ //
प्रत्ययादेः फस्य आयन्, ढस्य एय्, खस्य ईन्, छस्य ईय्, घस्य इय् एते स्युः/ गर्गस्य युवापत्यं गार्ग्यायणः / दाक्षायणः //

अत इञ् // लसक_१०१७ = पा_४,१.९५ //
अपत्येर्ऽथे / दाक्षिः //

बाह्वादिभ्यश्च // लसक_१०१८ = पा_४,१.९६ //
बाहविः / औडुलोमिः / (लोम्नो ऽपत्येषु बहुष्वकारो वक्तव्यः) / उडुलोमाः / आकृतिगणो ऽयम् //

अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्यो ऽञ् // लसक_१०१९ = पा_४,१.१०४ //
एभ्यो ऽञ् गोत्रे / ये त्वत्रानृषयस्तेभ्यो ऽपत्ये ऽन्यत्र तु गोत्रे / बिदस्य गोत्रं बैदः / बैदौ / बिदाः / पुत्रस्यापत्यं पौत्रः / पौत्रौ / पौत्राः / एवं दौहित्रादयः //

शिवादिभ्यो ऽण् // लसक_१०२० = पा_४,१.११२ //
अपत्ये / शैवः / गाङ्गः //

ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च // लसक_१०२१ = पा_४,१.११४ //
ऋषिभ्यः - वासिष्ठः / वैश्वामित्रः / अन्धकेभ्यः - श्वाफल्कः / वृष्णिभ्यः - वासुदेवः / कुरुभ्यः - नाकुलः / साहदेवः //

मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः // लसक_१०२२ = पा_४,१.११५ //
संख्यादिपूर्वस्य मातृशब्दस्योदादेशः स्यादण् प्रत्ययश्च / द्वैमातुरः / षाण्मातुरः / सांमातुरः / भाद्रमातुरः //

स्त्रीभ्यो ढक् // लसक_१०२३ = पा_४,१.१२० //
स्त्रीप्रत्ययान्तेभ्यो ढक् / वैनतेयः //

कन्यायाः कनीन च // लसक_१०२४ = पा_४,१.११६ //
चादण् / कानीनो व्यासः कर्णश्च //

राजश्वशुराद्यत् // लसक_१०२५ = पा_४,१.१३७ //
(राज्ञो जातावेवेति वाच्यम्) //

ये चाभावकर्मणोः // लसक_१०२६ = पा_६,४.१६८ //
यादौ तद्धिते परे ऽन् प्रकृत्या स्यान्न तु भावकर्मणोः / राजन्यः / जातावेवेति किम् ? - .

अन् // लसक_१०२७ = पा_६,४.१६७ //
अन् प्रकृत्या स्यादणि परे / राजनः / श्वशुर्यः //

क्षत्त्राद् घः // लसक_१०२८ = पा_४,१.१३८ //
क्षत्त्रियः / जातावित्येव/ क्षात्त्रिरन्यत्र //

रेवत्यादिभ्यष्ठक् // लसक_१०२९ = पा_४,१.१४६ //

ठस्येकः // लसक_१०३० = पा_७,३.५० //
अङ्गात्परस्य ठस्येकादेशः स्यात् / रैवतिकः //

जनपदशब्दात्क्षत्त्रियादञ् // लसक_१०३१ = पा_४,१.१६८ //
जनपदक्षत्त्रियवाचकाच्छब्दादञ् स्यादपत्ये / पाञ्चालः / (क्षत्त्रियसमान शब्दाज्जनपदात्तस्य राजन्यपत्यवत्) / पञ्चालानां राजा पाञ्चालः / (पूरोरण् वक्तव्यः) / पौरवः / (पाण्डोर्ड्यण्) / पाण्ड्यः //

कुरुनादिभ्यो ण्यः // लसक_१०३२ = पा_४,१.१७२ //
कौरव्यः / नैषध्यः //

ते तद्राजाः // लसक_१०३३ = पा_४,१.१७४ //
अञादयस्तद्राजसंज्ञाः स्युः //

तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम् // लसक_१०३४ = पा_२,४.६२ //
बहुष्वर्थेषु तद्राजस्य लुक् तदर्थकृते बहुत्वे न तु स्त्रियाम् / इक्ष्वाकवः / पञ्चालाः इत्यादि //

कम्बोजाल्लुक् // लसक_१०३५ = पा_४,१.१७५ //
अस्मात्तद्राजस्य लुक् / कम्बोजः / कम्बोजौ / (कम्बोजादिभ्य इति वक्तव्यम्) / चोलः / शकः / केरलः / यवनः //

इत्यपत्याधिकारः // २ //

अथ रक्ताद्यर्थकाः

तेन रक्तं रागात् // लसक_१०३६ = पा_४,२.१ //
अण् स्यात् / रज्यते ऽनेनेति रागः / काषायेण रक्तं वस्त्रं काषायम् //

नक्षत्रेण युक्तः कालः // लसक_१०३७ = पा_४,२.३ //
अण् स्यात् / (तिष्यपुष्ययोर्नक्षत्राणि यलोप इति वाच्यम्) / पुष्येण युक्तं पौषमहः //

लुबविशेषे // लसक_१०३८ = पा_४,२.४ //
पूर्वेण विहितस्य लुप् स्यात् षष्टिदण्डात्मकस्य कालस्यावान्तरविशेषश्चेन्न गम्यते / अद्य पुष्यः //

दृष्टं साम // लसक_१०३९ = पा_४,२.७ //
तेनेत्येव / वसिष्ठेन दृष्टं वासिष्ठं साम //

वामदेवाड्ड्यड्ड्यौ // लसक_१०४० = पा_४,२.९ //
वामदेवेन दृष्टं साम वामदेव्यम् //

परिवृतो रथः // लसक_१०४१ = पा_४,२.१० //
अस्मिन्नर्थे ऽण् प्रत्ययो भवति / वस्त्रेण परिवृतो वास्त्रो रथः //

तत्रोद्धृतममत्रेभ्यः // लसक_१०४२ = पा_४,२.१४ //
शरावे उद्धृतः शाराव ओदनः //

संस्कृतं भक्षाः // लसक_१०४३ = पा_४,२.१६ //
सप्तम्यन्तादण् स्यात्संस्कृतेर्ऽथे यत्संस्कृतं भक्षाश्चेत्ते स्युः / भ्राष्ट्रेषु संस्कृता भ्राष्ट्रा यवाः //

सास्य देवता // लसक_१०४४ = पा_४,२.२४ //
इन्द्रो देवतास्येति ऐन्द्रं हविः / पाशुपतम् / बार्हस्पत्यम् //

शुक्राद्घन् // लसक_१०४५ = पा_४,२.२६ //
शुक्रियम् //

सोमाट्ट्यण् // लसक_१०४६ = पा_४,२.३० //
सौम्यम् //

वाय्वृतुपित्रुषसो यत् // लसक_१०४७ = पा_४,२.३१ //
वायव्यम् / ऋतव्यम् //

रीङ् ऋतः // लसक_१०४८ = पा_७,४.२७ //
अकृद्यकारे असार्वधातुके यकारे च्वौ च परे ऋदन्ताङ्गस्य रीङादेशः / यस्येति च / पित्र्यम् / उषस्यम् //

पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः // लसक_१०४९ = पा_४,२.३६ //
एते निपात्यन्ते / पितुर्भ्राता पितृव्यः / मातुर्भ्राता मातुलः / मातुः पिता मातामहः / पितुः पिता पितामहः //

तस्य समूहः // लसक_१०५० = पा_४,२.३७ //
काकानां समूहः काकम् //

भिक्षादिभ्यो ऽण् // लसक_१०५१ = पा_६,४.१४६ //
भिक्षाणां समूहो भैक्षम् / गर्भिणीनां समूहो गार्भिणम् / इह (भस्याढे तद्धिते) / इति पुंवद्भावे कृते - .

इनण्यनपत्ये // लसक_१०५२ = पा_४,२.३७ //
अनपत्यार्थे ऽणि परे इन् प्रकृत्या स्यात् / तेन नस्तद्धित इति टिलोपो न / युवतीनां समूहो यौवनम् //

ग्रामजनबन्धुभ्यस्तल् // लसक_१०५३ = पा_४,२.४३ //
तलन्तं स्त्रियाम् / ग्रमता / जनता / बन्धुता / (गजसहायाभ्यां चेति वक्तव्यम्) / गजता / सहायता / (अह्नः खः क्रतौ) / अहीनः //

अचित्तहस्तिधेनोष्ठक् // लसक_१०५४ = पा_४,२.४७ //

इसुसुक्तान्तात्कः // लसक_१०५५ = पा_७,३.५१ //
इस् उस् उक्तान्तात्परस्य ठस्य कः / साक्तुकम् / हास्तिकम् / धैनुकम् //

तदधीते तद्वेद // लसक_१०५६ = पा_४,२.५९ //

न य्वाभ्याम् पदान्ताभ्यां पूर्वौ तु ताभ्यामैच् // लसक_१०५७ = पा_७,३.३ //
पदान्ताभ्यां यकारवकाराभ्यां परस्य न वृद्धिः किंतु ताभ्यां पूर्वौ क्रमादैजावागमौ स्तः/ व्याकरणमधीते वेद वा वैयाकरणः //

क्रमादिभ्यो वुन् // लसक_१०५८ = पा_४,२.६१ //
क्रमकः / पदकः / शिक्षकः / मीमांसकः //

इति रक्ताद्यर्थकाः // ३ //

अथ चातुरर्थिकाः

तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि // लसक_१०५९ = पा_४,२.६७ //
उदुम्बराः सन्त्यस्मिन्देशे औदुम्बरो देशः //

तेन निर्वृत्तम् // लसक_१०६० = पा_४,२.६८ //
कुशाम्बेन निर्वृत्ता नगरी कौशाम्बी //

तस्य निवासः // लसक_१०६१ = पा_४,२.६९ //
शिबीनां निवासो देशः शैबः //

अदूरभवश्च // लसक_१०६२ = पा_४,२.७० //
विदिशाया अदूरभवं नगरं वैदिशम् //

जनपदे लुप् // लसक_१०६३ = पा_१,२.५१ //
जनपदे वाच्ये चातुरर्थिकस्य लुप् //

लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने // लसक_१०६४ = पा_१,२.५१ //
लुपि सति प्रकृतिवल्लिङ्गवचने स्तः / पञ्चालानां निवासो जनपदः पञ्चालाः/ कुरवः / अङ्गाः/ वङ्गाः / कलिङ्गाः //

वरणादिभ्यश्च // लसक_१०६५ = पा_४,२.८२ //
अजनपदार्थ आरम्भः / वरणानामदूरभवं नगरं वरणाः //

कुमुदनडवेतसेभ्यो ड्मतुप् // लसक_१०६६ = पा_४,२.८७ //

झयः // लसक_१०६७ = पा_८,२.१० //
झयन्तान्मतोर्मस्य वः / कुमुद्वान् / नड्वान् //

मादुपधायाश्च मतोर्वो ऽयवादिभ्यः // लसक_१०६८ = पा_८,२.९ //
मवर्णावर्णान्तान्मवर्णावर्णोपधाच्च यवादिवर्जितात्परस्य मतोर्मस्य वः / वेतस्वान् //

नडशादाड्ड्वलच् // लसक_१०६९ = पा_४,२.८८ //
नड्वलः / शाद्वलः //

शिखाया वलच् // लसक_१०७० = पा_४,२.८९ //
शिखावलः //

इति चातुरर्थिकाः // ४ //

अथ शैषिकाः

शेषे // लसक_१०७१ = पा_४,१.९२ //
अपत्यादिचतुरर्थ्यन्तादन्योर्ऽथः शेषस्तत्राणादयः स्युः / चक्षुषा गृह्यते चाक्षुषं रूपम् / श्रावणः शब्दः / औपनिषदः पुरुषः / दृषदि पिष्टा दार्षदाः सक्तवः / चतुर्भिरुह्यं चातुरं शकटम् / चतुर्दश्यां दृश्यते चातुर्दशं रक्षः / "तस्य विकारः&८२१७॑ इत्यतः प्राक् शेषाधिकारः //

राष्ट्रावारपाराद्घखौ // लसक_१०७२ = पा_४,२.९३ //
आभ्यां क्रमाद् घखौ स्तः शेषे / राष्ट्रे जातादिः राष्ट्रियः/ अवारपारीणः/ (अवारपाराद्विगृहीतादपि विपरीताच्चेति वक्तव्यम्) / अवारीणः/ पारीणः/ पारावारीणः/ इह प्रकृतिविशेषाद् घादयष्ट्युट्युलन्ताः प्रत्यया उच्यन्ते तेषां जातादयोर्ऽथविशेषाः समर्थ विभक्तयश्च वक्ष्यन्ते //

ग्रामाद्यखञौ // लसक_१०७३ = पा_४,२.९४ //
ग्राम्यः / ग्रामीणः //

नद्यादिभ्यो ढक् // लसक_१०७४ = पा_४,२.९७ //
नादेयम् / माहेयम् / वाराणसेयम् //

दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक् // लसक_१०७५ = पा_४,२.९८ //
दाक्षिणात्यः / पाश्चात्यः / पौरस्त्यः //

द्युप्रागपागुदक्प्रतीचो यत् // लसक_१०७६ = पा_४,२.१०१ //
दिव्यम् / प्राच्यम् / अपाच्यम् / उदीच्यम् / प्रतीच्यम् //

अव्ययात्त्यप् // लसक_१०७७ = पा_४,२.१०४ //
(अमेहक्वतसित्रेभ्य एव) / अमात्यः / इहत्यः / क्वत्यः / ततस्त्यः / तत्रत्यः / (त्यब्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्) / नित्यः //

वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद्वृद्धम् // लसक_१०७८ = पा_१,१.७३ //
यस्य समुदायस्याचां मध्ये आदिर्वृद्धिस्तद्वृद्धसंज्ञं स्यात् //

त्यदादीनि च // लसक_१०७९ = पा_१,१.७४ //
वृद्धसंज्ञानि स्युः //

वृद्धाच्छः // लसक_१०८० = पा_४,२.११४ //
शालीयः / मालीयः / तदीयः / (वा नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा वक्तव्या) / देवदत्तीयः, दैवदत्तः //

गहादिभ्यश्च // लसक_१०८१ = पा_४,२.१३८ //
गहीयः //

युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ् च // लसक_१०८२ = पा_४,३.१ //
चाच्छः / पक्षे ऽण् / युवयोर्युष्माकं युष्मदीयः, अस्मदीयः //

तस्मिन्नणि च युष्माकास्माकौ // लसक_१०८३ = पा_४,३.२ //
युष्मदस्मदोरेतावादेशौ स्तः खञ्यणि च / यौष्माकीणः / आस्माकीनः / यौष्माकः / आस्माकः //

तवकममकावेकवचने // लसक_१०८४ = पा_४,३.३ //
एकार्थवाचिनोर्युष्मदस्मदोस्तवकममकौ स्तः खञि अणि च / तावकीनः / तावकः / मामकीनः / मामकः / छे तु - .

प्रत्ययोत्तरपदयोश्च // लसक_१०८५ = पा_७,२.९८ //
मपर्यन्तयोरेतयोरेकार्थवाचिनोस्त्वमौ स्तः प्रत्यये उत्तरपदे च परतः / त्वदीयः / मदीयः / त्वत्पुत्रः / मत्पुत्रः //

मध्यान्मः // लसक_१०८६ = पा_४,३.८ //
मध्यमः //

कालाट्ठञ् // लसक_१०८७ = पा_४,३.११ //
कालवाचिभ्यष्ठञ् स्यात् / कालिकम् / मासिकम् / सांवत्सरिकम् / (अव्ययानां भमात्रे टिलोपः) / सायम्प्रातिकः / पौनः पुनिकः //

प्रावृष एण्यः // लसक_१०८८ = पा_४,३.१७ //
प्रावृषेण्यः //

सायञ्चिरम्प्राह्णेप्रगे ऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च // लसक_१०८९ = पा_४,३.२३ //
सायमित्यादिभ्यश्चतुर्भ्यो ऽव्ययेभ्यश्च कालवाचिभ्यष्ट्युट्युलौ स्तस्तयोस्तुट् च / सायन्तनम् / चिरन्तनम् / प्राह्णे प्रगे अनयोरेदन्तत्वं निपात्यते / प्राह्णेतनम् / प्रगेतनम् / दोषातनम् //

तत्र जातः // लसक_१०९० = पा_४,३.२५ //
सप्तमीसमर्थाज्जात इत्यर्थे ऽणादयो घादयश्च स्युः / स्रुग्घ्ने जातः स्रौग्घ्नः / उत्से जात औत्सः / राष्ट्रे जातो राष्ट्रियः / अवारपारे जातः अवारपारीणः, इत्यादि//

प्रावृषष्ठप् // लसक_१०९१ = पा_४,३.२६ //
एण्यापवादः / प्रावृषिकः //

प्रायभवः // लसक_१०९२ = पा_४,३.३९ //
तत्रेत्येव / स्रुग्घ्ने प्रायेण बाहुल्येन भवति स्रौग्घ्नः //

सम्भूते // लसक_१०९३ = पा_४,३.४१ //
स्रुग्घ्ने संभवति स्रौग्घ्नः //

कोशाड्ढञ् // लसक_१०९४ = पा_४,३.४२ //
कौशेयम् वस्त्रम् //

तत्र भवः // लसक_१०९५ = पा_४,३.५३ //
स्रुग्घ्ने भवः स्रौग्घ्नः / औत्सः / राष्ट्रियः //

दिगादिभ्यो यत् // लसक_१०९६ = पा_४,३.५४ //
दिश्यम् / वर्ग्यम् //

शरीरावयवाच्च // लसक_१०९७ = पा_४,३.५५ //
दन्त्यम् / कण्ठ्यम् / (अध्यात्मादेष्ठञिष्यते) अध्यात्मं भवमाध्यात्मिकम् //

अनुशतिकादीनां च // लसक_१०९८ = पा_७,३.२० //
एषामुभयपदवृद्धिर्ञिति णिति किति च/ आधिदैविकम्/ आधिभौतिकम्/ ऐहलौकिकम्/ पारलोकिकम्/ आकृतिगणो ऽयम् //

जिह्वामूलाङ्गुलेश्छः // लसक_१०९९ = पा_४,३.६२ //
जिह्वामूलीयम् / अङ्गुलीयम् //

वर्गान्ताच्च // लसक_११०० = पा_४,३.६३ //
कवर्गीयम् //

तत आगतः // लसक_११०१ = पा_४,३.७४ //
स्रुग्घ्नादागतः स्रौग्घ्नः //

ठगायस्थानेभ्यः // लसक_११०२ = पा_४,३.७५ //
शुल्कशालाया आगतः शौल्कशालिकः //

विद्यायोनिसंबन्धेभ्यो वुञ् // लसक_११०३ = पा_४,३.७७ //
औपाध्यायकः / पैतामहकः //

हेतुमनुष्येभ्यो ऽन्यतरस्यां रूप्यः // लसक_११०४ = पा_४,३.८१ //
समादागतं समरूप्यम् / पक्षे - गहादित्वाच्छः / समीयम् / विषमीयम् / देवदत्तरूप्यम् / दैवदत्तम् //

मयट् च // लसक_११०५ = पा_४,३.८२ //
सममयम् / देवदत्तमयम् //

प्रभवति // लसक_११०६ = पा_४,३.८३ //
हिमवतः प्रभवति हैमवती गङ्गा //

तद्गच्छति पथिदूतयोः // लसक_११०७ = पा_४,३.८५ //
स्रुग्घ्नं गच्छति स्रौग्ध्नः पन्था दूतो वा //

अभिनिष्क्रामति द्वारम् // लसक_११०८ = पा_४,३.८६ //
स्रुग्घ्नमभिनिष्क्रामति स्रौग्घ्नं कान्यकुब्जद्वारम् //

अधिकृत्य कृते ग्रन्थे // लसक_११०९ = पा_४,३.८७ //
शारीरकमधिकृत्य कृतो ग्रन्थः शारीरकीयः //

सो ऽस्य निवासः // लसक_१११० = पा_४,३.८९ //
स्रुग्घ्नो निवासो ऽस्य स्रौग्घ्नः //

तेन प्रोक्तम् // लसक_११११ = पा_४,३.१०१ //
पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम् //

तस्येदम् // लसक_१११२ = पा_४,३.१२० //
उपगोरिदम् औपगवम् //

इति शैषिकाः // ५ //

अथ विकारार्थकाः

तस्य विकारः // लसक_१११३ = पा_४,३.१३४ //
(अश्मनो विकारे टिलोपो वक्तव्यः) / अश्मनो विकारः आश्मः / भास्मनः / मार्त्तिकः //

अवयवे च प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः // लसक_१११४ = पा_४,३.१३५ //
चाद्विकारे / मयूरस्यावयवो विकारो वा मायूरः / मौर्वं काण्डं भस्म वा / पैप्पलम् //

मयड्वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः // लसक_१११५ = पा_४,३.१४३ //
प्रकृतिमात्रान्मयड्वा स्यात् विकारावयवयोः/ अश्ममयम्, आश्मनम्/ अभक्ष्येत्यादि किम्? मौद्गः सूपः/ कार्पासमाच्छादनम् //

नित्यं वृद्धशरादिभ्यः // लसक_१११६ = पा_४,३.१४४ //
आम्रमयम् / शरमयम् //

गोश्च पुरीषे // लसक_१११७ = पा_४,३.१४५ //
गोः पुरीषं गोमयम् //

गोपयसोर्यत् // लसक_१११८ = पा_४,३.१६० //
गव्यम् / पयस्यम् //

इति विकारार्थाः / (प्राग्दीव्यतीयाः) // ६ //

अथ ठगधिकारः

प्राग्वहतेष्ठक् // लसक_१११९ = पा_४,४.१ //
तद्वहतीत्यतः प्राक् ठगधिक्रियते //

तेन दीव्यति खनति जयति जितम् // लसक_११२० = पा_४,४.२ //
अक्षैर्दीव्यति खनति जयति जितो वा आक्षिकः //

संस्कृतम् // लसक_११२१ = पा_४,४.३ //
दध्ना संस्कृतम् दाधिकम् / मारीचिकम् //

तरति // लसक_११२२ = पा_४,४.५ //
तेनेत्येव / उडुपेन तरति औडुपिकः //

चरति // लसक_११२३ = पा_४,४.८ //
तृतीयान्ताद्गच्छति भक्षयतीत्यर्थयोष्ठक् स्यात् / हस्तिना चरति हास्तिकः / दध्ना चरति दाधिकः //

संसृष्टे // लसक_११२४ = पा_४,४.२२ //
दध्ना संसृष्टं दाधिकम् //

उञ्छति // लसक_११२५ = पा_४,४.३२ //
बदराण्युञ्छति बादरिकः //

रक्षति // लसक_११२६ = पा_४,४.३३ //
समाजं रक्षति सामाजिकः //

शब्ददर्दुरं करोति // लसक_११२७ = पा_४,४.३४ //
शब्दं करोति शाब्दिकः / दर्दुरं करोति दार्दुरिकः //

धर्मं चरति // लसक_११२८ = पा_४,४.४१ //
धार्मिकः (अधर्माच्चेति वक्तव्यम्) / आधर्मिकः //

शिल्पम् // लसक_११२९ = पा_४,४.५५ //
मृदङ्गवादनं शिल्पमस्य मार्दङ्गिकः //

प्रहरणम् // लसक_११३० = पा_४,४.५७ //
तदस्येत्येव / असिः प्रहरणमस्य आसिकः / धानुष्कः //

शीलम् // लसक_११३१ = पा_४,४.६१ //
अपूपभक्षणं शीलमस्य आपूपिकः //

निकटे वसति // लसक_११३२ = पा_४,४.७३ //
नैकटिको भिक्षुकः //

इति ठगधिकारः / (प्राग्वहतीयाः) // ७ //

अथ यदधिकारः

प्राग्घिताद्यत् // लसक_११३३ = पा_४,४.७५ //
तस्मै हितमित्यतः प्राग् यदधिक्रियते //

तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् // लसक_११३४ = पा_४,४.७६ //
रथं वहति रथ्यः / युग्यः / प्रासङ्ग्यः //

धुरो यड्ढकौ // लसक_११३५ = पा_४,४.७७ //
हलि चेति दीर्घे प्राप्ते - .

न भकुर्छुराम् // लसक_११३६ = पा_८,२.७९ //
भस्य कुर्छुरोश्चोपधाया इको दीर्घो न स्यात् / धुर्यः / धौरेयः //

नौवयोधर्मविषमूलमूलसीतातुलाभ्यस्तार्यतुल्यप्राप्यवध्यानाम्यसमसमितसंमितेषु // लसक_११३७ = पा_४,४.९१ //
नावा तार्यं नाव्यं जलम् / वयसा तुल्यो वयस्यः / धर्मेण प्राप्यं धर्म्यम् / विषेण वध्यो विष्यः / मूलेन आनाम्यं मूल्यम् / मूलेन समो मूल्यः / सीतया समितं सीत्यं क्षेत्रम् / तुलया संमितम् तुल्यम् //

तत्र साधुः // लसक_११३७ = पा_४,४.९८ //
अग्रे साधुः - अग्र्यः / सामसु साधुः सामन्यः / ये चाभावकर्मणोरिति प्रकृति भावः / कर्मण्यः / शरण्यः //

सभाया यः // लसक_११३९ = पा_४,४.१०५ //
सभ्यः //

इति यतो ऽवधिः / (प्राग्घितीयाः) // ८ //

अथ छयतोरधिकारः

प्राक् क्रीताच्छः // लसक_११४० = पा_५,१.१ //
तेन क्रीतमित्यतः प्राक् छो ऽधिक्रियते //

उगवादिभ्यो यत् // लसक_११४१ = पा_५,१.२ //
प्राक् क्रीतादित्येव / उवर्णान्ताद्गवादिभ्यश्च यत् स्यात् / छस्यापवादः / शङ्कवे हितं शङ्कव्यं दारु / गव्यम् / (नाभि नभं च) / नभ्यो ऽक्षः / नभ्यमञ्जनम् //
तस्मै हितम् // लसक_११४२ = पा_५,१.५ //
वत्सेभ्यो हितो वत्सीयो गोधुक् //

शरीरावयवाद्यत् // लसक_११४३ = पा_५,१.६ //
दन्त्यम् / कण्ठ्यम् / नस्यम् //

आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात्खः // लसक_११४४ = पा_५,१.९ //

आत्माध्वानौ खे // लसक_११४५ = पा_६,४.१६९ //
एतौ खे प्रकृत्या स्तः / आत्मने हितम् आत्मनीनम् / विश्वजनीनम् / मातृभोगीणः //

इति छयतोरवधिः / (प्राक्क्रीतीयाः) // ९ //

अथ ठञधिकारः

प्राग्वतेष्ठञ् // लसक_११४६ = पा_५,१.१८ //
तेन तुल्यमिति वतिं वक्ष्यति, ततः प्राक् ठञधिक्रियते //

तेन क्रीतम् // लसक_११४७ = पा_५,१.३७ //
सप्तत्या क्रीतं साप्ततिकम् / प्रास्थिकम् //

सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ // लसक_११४८ = पा_५,१.४१ //

तस्येश्वरः // लसक_११४९ = पा_५,१.४२ //
सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ स्तः / अनुशतिकादीनां च / सर्वभूमेरीश्वरः सार्वभौमः / पार्थिवः //

पङ्क्तिविंशतित्रिंशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम् // लसक_११५० = पा_५,१.५९ //
एते रूढिशब्दा निपात्यन्ते //

तदर्हति // लसक_११५१ = पा_५,१.६३ //
लब्धुं योग्यो भवतीत्यर्थे द्वितीयान्ताट्ठञादयः स्युः / श्वेतच्छत्रमर्हति श्वैतच्छत्रिकः //

दण्डादिभ्यो यत् // लसक_११५२ = पा_५,१.६६ //
एभ्यो यत् स्यात् / दण्डमर्हति दण्ड्यः / अर्घ्यः / वध्यः //

तेन निर्वृत्तम् // लसक_११५३ = पा_५,१.७९ //
अह्ना निर्वृत्तम् आह्निकम् //

इति ठञो ऽवधिः / (प्राग्वतीयाः) // १० //

अथ त्वतलोरधिकारः

तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः // लसक_११५४ = पा_५,१.११५ //
ब्राह्मणेन तुल्यं ब्राह्मणवत् अधीते / क्रिया चेदिति किम् ? गुणतुल्ये मा भूत् / पुत्रेण तुल्यः स्थूलः //

तत्र तस्येव // लसक_११५५ = पा_५,१.११६ //
मथुरायामिव मथुरावत् स्रुग्ध्ने प्रकारः / चैत्रस्येव चैत्रवन्मैत्रस्य गावः //

तस्य भावस्त्वतलौ // लसक_११५६ = पा_५,१.११९ //
प्रकृतिजन्यबोधे प्रकारो भावः / गोर्भावो गोत्वम् / गोता / त्वान्तं क्लीबम् //

आ च त्वात् // लसक_११५७ = पा_५,१.१२० //
ब्रह्मणस्त्व इत्यतः प्राक् त्वतलावधिक्रियेते / अपवादैः सह समावेशार्थमिदम् / चकारो नञ्स्नञ्भ्यामपि समावेशार्थः / स्त्रिया भावः - स्त्रैणम् / स्त्रीत्वम् / स्त्रीता / पौस्नम् / पुंस्त्वम् / पुंस्ता //

पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा // लसक_११५८ = पा_५,१.१२२ //
वावचनमणादिसमावेशार्थम् //

र ऋतो हलादेर्लघोः // लसक_११५९ = पा_६,४.१६१ //
हलादेर्लघोरृकारस्य रः स्यादिष्ठेयस्सु परतः / पृथुमृदुभृशकृशदृढपरिवृढा नामेव रत्वम् //

टेः // लसक_११६० = पा_६,४.१५५ //
भस्य टेर्लोप इष्ठेमेयस्सु / पृथोर्भावः प्रथिमा - .

इगन्ताच्च लघुपूर्वात् // लसक_११६१ = पा_५,१.१३१ //
इगन्ताल्लघुपूर्वात् प्रातिपदिकाद्भावे ऽण् प्रत्ययः / पार्थवम् / म्रदिमा, मार्दवम् //

वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ्च // लसक_११६२ = पा_५,१.१२३ //
चादिमनिच् / शौक्ल्यम् / शुक्लिमा / दार्ढ्यम् / द्रढिमा //

गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च // लसक_११६३ = पा_५,१.१२४ //
चाद्भावे / जडस्य भावः कर्म वा जाड्यम् / मूढस्य भावः कर्म वा मौढ्यम् / ब्राह्मण्यम् / आकृतिगणो ऽयम् //

सख्युर्यः // लसक_११६४ = पा_५,१.१२६ //
सख्युर्भावः कर्म वा सख्यम् //

कपिज्ञात्योर्ढक् // लसक_११६५ = पा_५,१.१२७ //
कापेयम् / ज्ञातेयम् /

पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक् // लसक_११६६ = पा_५,१.१२८ //
सैनापत्यम् / पौरोहित्यम् //

इति त्वतलोरधिकारः // ११ //

अथ भवनाद्यर्थकाः

धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् // लसक_११६७ = पा_५,२.१ //
भवत्यस्मिन्निति भवनम् / मुद्गानां भवनं क्षेत्रं मौद्गीनम् //

व्रीहिशाल्योर्ढक् // लसक_११६८ = पा_५,२.२ //
व्रैहेयम् / शालेयम् //

हैयङ्गवीनं संज्ञायाम् // लसक_११६९ = पा_५,२.२३ //
ह्योगोदोहशब्दस्य हियङ्गुरादेशः विकारार्थे खञ्च निपात्यते / दुह्यत इति दोहः क्षीरम् / ह्योगोदोहस्य विकारः - हैयङ्गवीनं नवनीतम् //

तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच् // लसक_११७० = पा_५,२.३६ //
तारकाः संजाता अस्य तारकितं नभः / पण्डितः / आकृतिगणो ऽयम् //

प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रचः // लसक_११७१ = पा_५,२.३७ //
तदस्येत्यनुवर्तते / ऊरू प्रमाणमस्य - ऊरुद्वयसम् / ऊरुदघ्नम् / ऊरुमात्रम् //

यत्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप् // लसक_११७२ = पा_५,२.३९ //
यत्परिमाणमस्य यावान् / तावान् / एतावान् //

किमिदंभ्यां वो घः // लसक_११७३ = पा_५,२.४० //
आभ्यां वतुप् स्याद् वकारस्य घश्च //

इदंकिमोरीश्की // लसक_११७४ = पा_६,३.९० //
दृग्दृशवतुषु इदम ईश् किमः किः / कियान् / इयान् //

संख्याया अवयवे तयप् // लसक_११७५ = पा_५,२.३९ //
पञ्च अवयवा अस्य पञ्चतयम् //

द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा // लसक_११७६ = पा_५,२.४३ //
द्वयम् / द्वितयम् / त्रयम् / त्रितयम् //

उभादुदात्तो नित्यम् // लसक_११७७ = पा_५,२.४४ //
उभशब्दात्तयपो ऽयच् स्यात् स चाद्युदात्तः / उभयम् //

तस्य पूरणे डट् // लसक_११७८ = पा_५,२.४८ //
एकादशानां पूरणः एकादशः //

नान्तादसंख्यादेर्मट् // लसक_११७९ = पा_५,२.४९ //
डटो मडागमः / पञ्चानां पूरणः पञ्चमः / नान्तात्किम् ? .

ति विंशतेर्डिति // लसक_११८० = पा_६,४.१४२ //
विंशतेर्भस्य तिशब्दस्य लोपो डिति परे / विंशः / असंख्यादेः किम् ? एकादशः //

षट्कतिकतिपयचतुरां थुक् // लसक_११८१ = पा_५,२.५१ //
एषां थुगागमः स्याड्डटि/ षण्णां षष्ठः/ कतिथः/ कतिपयशब्दस्यासंख्यात्वे ऽप्यत एव ज्ञापकाड्डट्/ कतिपयथः/ चतुर्थः //

द्वेस्तीयः // लसक_११८२ = पा_५,२.५४ //
डटो ऽपवादः / द्वयोः पूरणो द्वितीयः //

त्रेः संप्रसारणं च // लसक_११८३ = पा_५,२.५५ //
तृतीयः //

श्रोत्रियंश्छन्दो ऽधीते // लसक_११८४ = पा_५,२.८४ //
श्रोत्रियः / वेत्यनुवृत्तेश्छान्दसः //

पूर्वादिनिः // लसक_११८५ = पा_५,२.८६ //
पूर्वं कृतमनेन पूर्वी //

सपूर्वाच्च // लसक_११८६ = पा_५,२.८७ //
कृतपूर्वा //

इष्टादिभ्यश्च // लसक_११८७ = पा_५,२.८८ //
इष्टमनेन इष्टी / अधीती //

इति भवनाद्यर्थकाः // १२ //

अथ मत्वर्थीयाः

तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् // लसक_११८८ = पा_५,२.९४ //
गावो ऽस्यास्मिन्वा सन्ति गोमान् //

तसौ मत्वर्थे // लसक_११८९ = पा_१,४.१९ //
तान्तसान्तौ भसंज्ञौ स्तो मत्वर्थे प्रत्यये परे / गरुत्मान् / वसोः संप्रसारणं / विदुष्मान् / (गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः) / शुक्लो गुणो ऽस्यास्तीति शुक्लः पटः / कृष्णः //

प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् // लसक_११९० = पा_५,२.९६ //
चूडालः / चूडावान् / प्राणिस्थात्किम् ? शिखावान्दीपः / प्राण्यङ्गादेव / मेधावान् //

लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः // लसक_११९१ = पा_५,२.१०० //
लोमादिभ्यः शः / लोमशः / लोमवान् / रोमशः / रोमवान् / पामादिभ्यो नः / पामनः / (ग. सू.) अङ्गात्कल्याणे / अङ्गना / (ग. सू.) लक्ष्म्या अच्च / लक्ष्मणः / पिच्छादिभ्य इलच् / पिच्छिलः / पिच्छवान् //

दन्त उन्नत उरच् // लसक_११९२ = पा_५,२.१०६ //
उन्नता दन्ताः सन्त्यस्य दन्तुरः //

केशाद्वो ऽन्यतरस्याम् // लसक_११९३ = पा_५,२.१०९ //
केशवः / केशी / केशिकः / केशवान् / (अन्येभ्यो ऽपि दृश्यते) / मणिवः / (अर्णसो लोपश्च) / अर्णवः //

अत इनिठनौ // लसक_११९४ = पा_५,२.११५ //
दण्डी / दण्डिकः //

व्रीह्यादिभ्यश्च // लसक_११९५ = पा_५,२.११६ //
व्रीही / व्रीहिकः //

अस्मायामेधास्रजो विनिः // लसक_११९६ = पा_५,२.१२१ //
यशस्वी / यशस्वान् / मायावी / मेधावी / स्रग्वी //

वचो ग्मिनिः // लसक_११९७ = पा_५,२.१२४ //
वाग्ग्मी //

अर्शआदिभ्यो ऽच् // लसक_११९८ = पा_५,२.१२७ //
अर्शो ऽस्य विद्यते अर्शसः / आकृतिगणो ऽयम् //

अहंशुभमोर्युस् // लसक_११९९ = पा_५,२.१४० //
अहंयुः अहङ्कारवान् / शुभंयुस्तु शुभान्वितः //

इति मत्वर्थीयाः // १३ //

अथ प्राग्दिशीयाः

प्राग्दिशो विभक्तिः // लसक_१२०० = पा_५,३.१ //
दिक्छब्देभ्य इत्यतः प्राग्वक्ष्यमाणाः प्रत्यया विभक्तिसंज्ञाः स्युः //

किंसर्वनामबहुभ्यो ऽद्व्यादिभ्यः // लसक_१२०१ = पा_५,३.२ //
किमः सर्वनाम्नो बहुशब्दाच्चेति प्राग्दिशो ऽधिक्रियते //

पञ्चम्यास्तसिल् // लसक_१२०२ = पा_५,३.७ //
पञ्चम्यन्तेभ्यः किमादिभ्यस्तसिल् वा स्यात् //

कु तिहोः // लसक_१२०३ = पा_७,२.१०४ //
किमः कुः स्यात्तादौ हादौ च विभक्तौ परतः / कुतः, कस्मात् //

इदम इश् // लसक_१२०४ = पा_५,३.२ //
प्राग्दिशीये परे / इतः //

अन् // लसक_१२०५ = पा_६,४.१६७ //
एतदः प्राग्दिशीये / अनेकाल्त्वात्सर्वादेशः / अतः / अमुतः / यतः / ततः / बहुतः / द्व्यादेस्तु द्वाभ्याम् //

पर्यभिभ्यां च // लसक_१२०६ = पा_५,३.९ //
आभ्यां तसिल् स्यात् / परितः / सर्वत इत्यर्थः / अभितः / उभयत इत्यर्थः //

सप्तम्यास्त्रल् // लसक_१२०७ = पा_५,३.१० //
कुत्र / यत्र / तत्र / बहुत्र //

इदमो हः // लसक_१२०८ = पा_५,३.११ //
त्रलो ऽपवादः / इह //

किमो ऽत् // लसक_१२०९ = पा_५,३.१२ //
वाग्रहणमपकृष्यते / सप्तम्यन्तात्किमो ऽद्वा स्यात् पक्षे त्रल् //

क्वाति // लसक_१२१० = पा_७,२.१०५ //
किमः क्वादेशः स्यादति / क्व / कुत्र //

इतराभ्यो ऽपि दृश्यन्ते // लसक_१२११ = पा_५,३.१४ //
पञ्चमीसप्तमीतरविभक्त्यन्तादपि तसिलादयो दृश्यन्ते / दृशिग्रहणाद्भवदादियोग एव / स भवान् / ततो भवान् / तत्र भवान् / तम्भवन्तम् / ततो भवन्तम् / तत्र भवन्तम् / एवं दीर्घायुः, देवानाम्प्रियः, आयुष्मान् //

सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा // लसक_१२१२ = पा_५,३.१५ //
सप्तम्यन्तेभ्यः कालार्थेभ्यः स्वार्थे दा स्यात् //

सर्वस्य सो ऽन्यतरस्यां दि // लसक_१२१३ = पा_५,३.६ //
दादौ प्राग्दिशीये सर्वस्य सो वा स्यात् / सर्वस्मिन् काले सदा सर्वदा / अन्यदा / कदा / यदा / तदा / काले किम् ? सर्वत्र देशे //

इदमो र्हिल् // लसक_१२१४ = पा_५,३.१६ //
सप्तम्यन्तात् काल इत्येव //

एतेतौ रथोः // लसक_१२१५ = पा_५,३.४ //
इदम्शब्दस्य एत इत् इत्यादेशौ स्तौ रेफादौ थकारादौ च प्राग्दिशीये परे/ अस्मिन् काले एतर्हि/ काले किम्? इह देशे //

अनद्यतने र्हिलन्यतरस्याम् // लसक_१२१६ = पा_५,३.२१ //
कर्हि, कदा / यर्हि, यदा / तर्हि, तदा //

एतदः // लसक_१२१७ = पा_५,३.५ //
एत इत् एतौ स्तौ रेफादौ थादौ च प्राग्दिशीये / एतस्मिन् काले एतर्हि //

प्रकारवचने थाल् // लसक_१२१८ = पा_५,३.२३ //
प्रकारवृत्तिभ्यः किमादिभ्यस्थाल् स्यात् स्वार्थे / तेन प्रकारेण तथा / यथा //

इदमस्थमुः // लसक_१२१९ = पा_५,३.२४ //
थालो ऽपवादः / (एतदो ऽपि वाच्यः) / अनेन एतेन वा प्रकारेण इत्थम् //

किमश्च // लसक_१२२० = पा_५,३.२५ //
केन प्रकारेण कथम् //

इति प्राग्दिशीयाः // १४ //

अथ प्रागिवीयाः

अतिशायने तमबिष्ठनौ // लसक_१२२१ = पा_५,३.५५ //
अतिशयविशिष्टार्थवृत्तेः स्वार्थ एतौ स्तः / अयमेषामतिशयेनाढ्यः आढ्यतमः / लघुतमः, लघिष्ठः //

तिङश्च // लसक_१२२२ = पा_५,३.५६ //
तिङन्तादतिशये द्योत्ये तमप् स्यात् //

तरप्तमपौ घः // लसक_१२२३ = पा_१,१.२२ //
एतौ घसंज्ञौ स्तः //

किमेत्तिङव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे // लसक_१२२४ = पा_५,४.११ //
किम एदन्तात्तिङोऽव्ययाच्च यो घस्तदन्तादामुः स्यान्न तु द्रव्यप्रकर्षे / किन्तमाम् / प्राह्णेतमाम् / पचतिमाम् / उच्चैस्तमाम् / द्रव्यप्रकर्षे तु उच्चैस्तमस्तरुः //

द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ // लसक_१२२५ = पा_५,३.५७ //
द्वयोरेकस्यातिशये विभक्तव्ये चोपपदे सुप्तिङन्तादेतौ स्तः / पूर्वयोरपवादः / अयमनयोरतिशयेन लघुः लघुतरो लघीयान् / उदीच्याः प्राच्येभ्यः पटुतराः पटीयांसः //

प्रशस्यस्य श्रः // लसक_१२२६ = पा_५,३.६० //
अस्य श्रादेशः स्यादजाद्योः परतः //

प्रकृत्यैकाच् // लसक_१२२७ = पा_६,४.१६३ //
इष्ठादिष्वेकाच् प्रकृत्या स्यात् / श्रेष्ठः, श्रेयान् //

ज्य च // लसक_१२२८ = पा_५,३.६१ //
प्रशस्यस्य ज्यादेशः स्यादिष्ठेयसोः / ज्येष्ठः //

ज्यादादीयसः // लसक_१२२९ = पा_६,४.१६० //
आदेः परस्य / ज्यायान् //

बहोर्लोपो भू च बहोः // लसक_१२३० = पा_६,४.१५८ //
बहोः परयोरिमेयसोर्लोपः स्याद्बहोश्च भूरादेशः / भूमा / भूयान् //

इष्ठस्य यिट् च // लसक_१२३१ = पा_६,४.१५९ //
बहोः परस्य इष्ठस्य लोपः स्याद् यिडागमश्च / भूयिष्ठः //

विन्मतोर्लुक् // लसक_१२३२ = पा_५,३.६५ //
विनो मतुपश्च लुक् स्यादिष्ठेयसोः / अतिशयेन स्रग्वी स्रजिष्ठः / स्रजीयान् / अतिशयेन त्वग्वान् त्वचिष्ठः / त्वचीयान् //

ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः // लसक_१२३३ = पा_५,३.६७ //
ईषदूनो विद्वान् विद्वत्कल्पः / विद्वद्देश्यः / विद्वद्देशीयः / पचतिकल्पम् //

विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात्तु // लसक_१२३४ = पा_५,३.६८ //
ईषदसमाप्तिविशिष्टेर्ऽथे सुबन्ताद्बहुज्वा स्यात्स च प्रागेव न तु परतः / ईषदूनः पटुर्बहुपटुः / पटुकल्पः / सुपः किम् ? जयति कल्पम् //

प्रगिवात्कः // लसक_१२३५ = पा_५,३.७० //
इवे प्रतिकृतावित्यतः प्राक्काधिकारः //

अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः // लसक_१२३६ = पा_५,३.७१ //
कापवादः / तिङश्चेत्यनुवर्तते //

अज्ञाते // लसक_१२३७ = पा_५,३.७३ //
कस्यायमश्वो ऽश्वकः/ उच्चकैः/ नीचकैः/ सर्वके / (ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टेः प्रागकच्, अन्यत्र सुबन्तस्य)/ युष्मकाभिः / युवकयोः / त्वयका //

कुत्सिते // लसक_१२३८ = पा_५,३.७४ //
कुत्सितो ऽश्वो ऽश्वकः //

किंयत्तदो निर्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच् // लसक_१२३९ = पा_५,३.९२ //
अनयोः कतरो वैष्णवः / यतरः / ततरः //

वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् // लसक_१२४० = पा_५,३.९३ //
जातिपरिप्रश्न इति प्रत्याख्यातमाकरे / बहूनां मध्ये एकस्य निर्धारणे डतमज्वा स्यात् / कतमो भवतां कठः / यतमः / ततमः / वाग्रहणमकजर्थम् / यकः / सकः //

इति प्रागिवीयाः // १५ //

अथ स्वार्थिकाः

इवे प्रतिकृतौ // लसक_१२४१ = पा_५,३.९६ //
कन् स्यात् / अश्व इव प्रतिकृतिरश्वकः / (सर्वप्रातिपदिकेभ्यः स्वार्थे कन्) / अश्वकः //

तत्प्रकृतवचने मयट् // लसक_१२४२ = पा_५,४.२१ //
प्राचुर्येण प्रस्तुतं प्रकृतम्, तस्य वचनं प्रतिपादनम् / भावे अधिकरणे वा ल्युट् / आद्ये प्रकृतमन्नमन्नमयम् / अपूपमयम् / द्वितीये तु अन्नमयो यज्ञः / अपूपमयं पर्व //

प्रज्ञादिभ्यश्च // लसक_१२४३ = पा_५,४.३८ //
अण् स्यात् / प्रज्ञ एव प्राज्ञः / प्राज्ञी स्त्री / दैवतः / बान्धवः //

बह्वल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम् // लसक_१२४४ = पा_५,४.४२ //
बहूनि ददाति बहुशः / अल्पशः / (आद्यादिभ्यस्तसेरुपसंख्यानम्) / आदौ आदितः / मध्यतः / अन्ततः / पृष्ठतः / पार्श्वतः / आकृतिगणो ऽयम् / स्वरेण, स्वरतः / वर्णतः //

कृभ्वस्तियोगे संपद्यकर्तरि च्विः // लसक_१२४५ = पा_५,४.५० //
(अभूततद्भाव इति वक्तव्यम्)/ विकारात्मतां प्राप्नुवत्यां प्रकृतौ वर्तमानाद्विकारशब्दात् स्वार्थे च्विर्वा स्यात्करोत्यादिभिर्योगे//

अस्य च्वौ // लसक_१२४६ = पा_७,३.३२ //
अवर्णस्य ईत्स्यात् च्वौ / वेर्लोपे च्व्यन्तत्वादव्ययत्वम् / अकृष्णः कृष्णः संपद्यते तं करोति कृष्णीकरोति / ब्रह्मीभवति / गङ्गीस्यात् / (अव्ययस्य च्वावीत्वं नेति वाच्यम्) / दोषाभूतमहः / दिवाभूता रात्रिः //

विभाषा साति कार्त्स्न्ये // लसक_१२४७ = पा_५,४,५२ //
च्विविषये सातिर्वा स्यात्साकल्ये //

सात्पदाद्योः // लसक_१२४८ = पा_८,३.१११ //
सस्य षत्वं न स्यात् / कृत्स्नं शस्त्रमग्निः संपद्यते ऽग्निसाद्भवति / दधि सिञ्चति //

च्वौ च // लसक_१२४९ = पा_७,४.२६ //
च्वौ परे पूर्वस्य दीर्घः स्यात् / अग्नीभवति //

अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच् // लसक_१२५० = पा_५,४.५७ //
द्व्यजेवावरं न्यूनं न तु ततो न्यूनमनेकाजिति यावत् / तादृशमर्धं यस्य तस्माड्डाच् स्यात् कृभ्वस्तिभिर्योगे / (डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम्) / इति डाचि विवक्षिते द्वित्वम् / (नित्यमाम्रेडिते डाचीति वक्तव्यम्) / डाच्परं यदाम्रेडितं तस्मिन्परे पूर्वपरयोर्वर्णयोः पररूपं स्यात् / इति तकारपकारयोः पकारः / पटपटाकरोति / अव्यक्तानुकरणात्किम् ? ईषत्करोति / द्व्यजवरार्धात्किम् ? श्रत्करोति / अवरेति किम् ? खरटखरटाकरोति / अनितौ किम् ? पटिति करोति //

इति स्वार्थिकाः // १६ //
// इति तद्धिताः //

अथ स्त्रीप्रत्ययाः

स्त्रियाम् // लसक_१२५१ = पा_४,१.३ //
अधिकारो ऽयम् / समर्थानामिति यावत् //

अजाद्यतष्टाप् // लसक_१२५२ = पा_४,१.४ //
अजादीनामकारान्तस्य च वाच्यं यत् स्त्रीत्वं तत्र द्योत्ये टाप् स्यात् / अजा / एडका / अश्वा / चटका / मूषिका / बाला / वत्सा / होडा / मन्दा / विलाता / इत्यादि // मेधा / गङ्गा / सर्वा //

उगितश्य // लसक_१२५३ = पा_४,१.६ //
उगिदन्तात्प्रातिपदिकात्स्त्रियां ङीप्स्यात् / भवती / भवन्ती / पचन्ती / दीव्यन्ती //

टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः // लसक_१२५४ = पा_४,१.१५ //
अनुपसर्दनं यट्टिदादि तदन्तं यददन्तं प्रातिपदिकं ततः स्त्रियां ङीप्स्यात् / कुरुचरी / नदट् नदी / देवट् देवी / सौपर्णेयी / ऐन्द्री / औत्सी / ऊरुद्वयसी / ऊरुदघ्नी / ऊरुमात्री / पञ्चतयी / आक्षिकी / लावणिकी / यादृशी / इत्वरी / (नञ्स्नञीकक्ख्युंस्तरुणतलुनानामुपसंख्यानम्) / स्त्रैणी / पैंस्नी / शाक्तीकी / याष्टीकी / आढ्यङ्करणी / तरुणी / तलुनी //

यञश्च // लसक_१२५५ = पा_४,१.१६ //
यञन्तात् स्त्रियां ङीप्स्यात् / अकारलोपे कृते - .

हलस्तद्धितस्य // लसक_१२५६ = पा_६,१.१५० //
हलः परस्य तद्धितयकारस्योपधाभूतस्य सोप ईति परे / गार्गी //

प्राचां ष्फ तद्धितः // लसक_१२५७ = पा_४,१.१७ //
यञन्तात् ष्फो वा स्यात्स च तद्धितः //

षिद्गौरादिभ्यश्च // लसक_१२५८ = पा_४,१.४१ //
षिद्भ्यो गौरादिभ्यश्च स्त्रियां ङीष् स्यात् / गार्ग्यायणी / नर्तकी / गौरी / अनुडुही / अनड्वाही / आकृतिगणो ऽयम् //

वयसि प्रथमे // लसक_१२५९ = पा_४,१.२० //
प्रथमवयोवाचिनो ऽदन्तात् स्त्रियां ङीप्स्यात् / कुमारी //

द्विगोः // लसक_१२६० = पा_४,१.४१ //
अदन्ताद् द्विगोर्ङीप्स्यात् / त्रिलोकी / अजादित्वात्त्रिफला / त्र्यनीका सेना //

वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः // लसक_१२६१ = पा_४,१.३९ //
वर्णवाची यो ऽनुदात्तान्तस्तोपधस्तदन्तादनुपसर्जनात्प्रातिपदिकाद्वा ङीप् तकारस्य नकारादेशश्च / एनी, एता / रोहिणी, रोहिता //

वोतो गुणवचनात् // लसक_१२६२ = पा_४,१.४४ //
उदन्ताद् गुणवाचिनो वा ङीष् स्यात् / मृद्वी, मृदुः //

बह्वादिभ्यश्च // लसक_१२६३ = पा_४,१.४५ //
एभ्यो वा ङीष् स्यात् / बह्वी, बहुः / (कृदिकारादक्तिनः)/ रात्री, रात्रिः / (सर्वतो ऽक्तिन्नर्थादित्येके)/ शकटी / शकटिः //

पुंयोगादाख्यायाम् // लसक_१२६४ = पा_४,१.४८ //
या पुमाख्या पुंयोगात् स्त्रियां वर्तते ततो ङीष् / गोपस्य स्त्री गोपी / (पालकान्तान्न) - .

प्रत्ययस्थात्कात्पूर्वस्यात इदाप्यसुपः // लसक_१२६५ = पा_७,३.४४ //
प्रत्ययस्थात्कात्पूर्वस्याकारस्येकारः स्यादापि स आप्सुपः परो न चेत् / गोपालिका / अश्वपालिका / सर्विका / कारिका / अतः किम् ? नौका / प्रत्ययस्थात्किम् ? शक्नोतीति शका / असुपः किम् ? बहुपरिव्राजका नगरी / (सूर्याद्देवतायां चाब्वाच्यः) / सूर्यस्य स्त्री देवता सूर्या / देवतायां किम् ? (सूर्यागस्त्ययोश्छे च ङ्यां च) / यलोपः / सूरी - कुन्ती॑ मानुषीयम् //

इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलचार्याणामानुक् लसक_१२६६ = पा_४,१.४९ //
एषामानुगागमः स्यात् ङीष् च / इन्द्रस्य स्त्री - इन्द्राणी / वरुणानी / भवानी / शर्वाणी / रुद्राणी / मृडानी / (हिमारण्ययोर्महत्त्वे) / महद्धिमं हिमानी / महदरण्यमरण्यानी / (यवाद्दोषे) / दुष्टो यवो यवानी / (यवनाल्लिप्याम्) / यवनानां लिपिर्यवनानी / (मातुलोपाध्याययोरानुग्वा) / मातुलानी, मातुली / उपाध्यायानी, उपाध्यायी / (आचार्यादणत्वं च) / आचार्यस्य स्त्री आचार्यानी / (अर्यक्षत्रियाभ्यां वा स्वार्थे), अर्याणी, अर्या / क्षत्रियाणी, क्षत्रिया //

क्रीतात्करणपूर्वात् // लसक_१२६७ = पा_४,१.५० //
क्रीतान्ताददन्तात् करणादेः स्त्रियां ङीष्स्यात् / वस्त्रक्रीती / क्वचिन्न / धनक्रीता //

स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् // लसक_१२६८ = पा_४,१.५४ //
असंयोगोपधमुपसर्जनं यत् स्वाङ्गं तदन्ताददन्तान् ङीष्वा स्यात् / केशानतिक्रान्ता - अतिकेशी, अतिकेशा / चन्द्रमुखी चन्द्रमुखा / असंयोगोपधात्किम् ? सुगुल्फा / उपसर्जनात्किम् ? शिखा //

न क्रोडादिबह्वचः // लसक_१२६९ = पा_४,१.५६ //
क्रोडादेर्बह्वचश्च स्वाङ्गान्न ङीष् / कल्याणक्रोडा / आकृतिगणो ऽयम् / सुजघना //

नखमुखात्संज्ञायाम् // लसक_१२७० = पा_४,१.५८ //
न ङीष् //

पूर्वपदात्संज्ञायामगः // लसक_१२७१ = पा_८,४.३ //
पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य नस्य णः स्यात् संज्ञायां न तु गकारव्यवधाने / शूर्पणखा / गौरमुखा / संज्ञायां किम् ? ताम्रमुखी कन्या //

जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् // लसक_१२७२ = पा_४,१.६३ //
जातिवाचि यन्न च स्त्रियां नियतमयोपधं ततः स्त्रियां ङीष् स्यात् / तटी / वृषली / कठी / बह्वृची / जातेः किम् ? मुण्डा / अस्त्रीविषयात्किम् ? बलाका / अयोपधात्किम् ? क्षत्रिया / (योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रतिषेधः) / हयी / गवयी / मुकयी / हलस्तद्धितस्येति यलोपः / मनुषी / (मत्स्यस्य ङ्याम्) / यलोपः / मत्सी //

इतो मनुष्यजातेः // लसक_१२७३ = पा_४,१.६५ //
ङीष् / दाक्षी //

ऊङुतः // लसक_१२७४ = पा_४,१.६६ //
उदन्तादयोपधान्मनुष्यजातिवाचिनः स्त्रियामूङ् स्यात् / कुरूः / अयोपधात्किम् ? अध्वर्युर्ब्राह्मणी //

पङ्गोश्च // लसक_१२७५ = पा_४,१.६८ //
पङ्गूः / (श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च) / श्वश्रूः //

ऊरूत्तरपदादौपम्ये // लसक_१२७६ = पा_४,१.६९ //
उपमानवाची पूर्वपदमूरूत्तरपदं यत्प्रातिपदिकं तस्मादूङ् स्यात् / करभोरूः //

संहिताशफलक्षणवामादेश्च // लसक_१२७७ = पा_४,१.७० //
अनौपम्यार्थं सूत्रम् / संहितोरूः / शफोरूः / लक्षणोरूः / वामोरूः //

शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन् // लसक_१२७८ = पा_४,१.७३ //
शार्ङ्गरवादेरञो यो ऽकारस्तदन्ताच्च जातिवाचिनो ङीन् स्यात्/ शार्ङ्गरवी/ बैदी / ब्राह्मणी / (नृनरयोर्वृद्धिश्च)/ नारी //

यूनस्तिः // लसक_१२७९ = पा_४,१.७७ //
युवञ्छब्दात् स्त्रियां तिः प्रत्ययः स्यात् / युवतिः //

[संपादयतु] वाह्य सूत्राणि

  • यहाँ से रोमन यूनिकोड में प्राप्त करके उसे DiCrunch की सहायता से देवनागरी में परिवर्तित करके यहाँ रखा।

श्रेणी:व्याकरण

वैयक्तिक उपकरणानि